scriptUP Assembly Elections Result 2022 PM Modi proved to be better trend setter | UP Assembly Elections Result 2022: बेहतर ट्रेंड सेटर साबित हुए PM मोदी | Patrika News

UP Assembly Elections Result 2022: बेहतर ट्रेंड सेटर साबित हुए PM मोदी

UP Assembly Elections Result 2022: एक बार फिर से यूपी में बीजेपी अकेले दम पर सरकार बनाती नजर आती दिख रही है। इस बार के चुनाव नतीजों ने ये दर्शा दिया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बेहतर ट्रेंड सेटर हैं। विपक्ष के तमाम मुद्दों को दरकिनार करते हुए पीएम का लाभार्थी कार्ड काम करता नजर आ रहा है। वहीं उनका समाजवादी पार्टी को परिवारवादी और कानून व्यवस्था के लिए खतरा बता कर खुद को आगे कर लिया।

वाराणसी

Published: March 10, 2022 03:33:57 pm

वाराणसी. UP Assembly Elections Result 2022: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद को भारतीय राजनीति का सबसे बेहतर ट्रेंड सेटर साबित कर दिया है। उन्होंने विपक्ष के सारे मुद्दों को एक तरफ कर जो लाभार्थी कार्ड खेला वो अब तक के रुझानों से कामयाब होता साफ दिख रहा है। पीएम मोदी का लाभार्थी कार्ड बीजेपी को लगातार दूसरी बार यूपी में सत्ता के सिंहासन तक पहुंचता नजर आ रहा है।
पीएम नरेंद्र मोदी
पीएम नरेंद्र मोदी
बीजेपी की ग्रासरूट पर मौजूदगी ने पहुंचाया लाभ
बता दें कि बीजेपी में खास बात ये है कि उसकी पहुंच ग्रास रूट तक है। पीएम मोदी खुद पन्ना प्रमुख रह चुके हैं तो उन्हें वो सारे समीकरण भली भांति पता हैं कि चुनाव जीता कैसे जाता है। यही वजह है कि मोदी और अमित शाह सहित अन्य दिग्गज हमेशा बूथ जीतने की बात करते हैं।
24 X 7 लोगों से जुड़ाव बीजेपी को अन्य दलों से करता है अलग
दूसरी सबसे खास बात ये कि बीजेपी का वर्षपर्यंत यानी 24 X 7 आमजन से जुड़ाव बड़ा काम करता है। पार्टी लगातार कोई न कोई आयोजन करती रहती है। ऐसे काम जिनसे जनता से जुड़ाव बना रहे। ये उसे अन्य से अलग करता नजर आता है। वो ही चुनाव में जीत-हार के बीच का अंतर पैदा करता है। बीजेपी के ही जो लोग जमीन से कटे होते हैं उन्हें ही हार का सामना करना होता है।
अखिलेश ने शुरूआती दौर में चुनाव का ट्रेंड जरूर बदला पर
इस बार के विधानसभा चुनाव की शुरूआत समाजवादी पार्टी ने बड़े तेवर के साथ की थी। बीजेपी के 2017 के आइडिया पर काम करते हुए पहले बीजेपी के असंतुष्टों को अपनी तरफ मिलाया। सामाजिक समीकरण साधने के लिए जाति आधारित क्षत्रपों पर भरोसा किया। छोटे-छोटे दलो को मिला कर सबसे बड़ा गठबंधन किया। बीजेपी की कार्यशैली पर लगातार आक्रामक रहे। गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई, महिला उत्पीड़न जैसे मुद्दों को धार दी। राज्यकर्मचारियों और शिक्षकों के हित में पुरानी पेंशन योजना बहाल करने, वित्त विहीन शिक्षको के लिए सम्मानजनक मानदेय देने की घोषणा हो या 300 यूनिट तक फ्री बिजिली का मुद्दा, सबसे आमजन को रिझान की भरपूर कोशिश की।
अखिलेश ने चुनावी फिजा में बीजेपी के कमंडल पर मंडल को भारी करने की भरपूर कोशिश की
सबसे बड़ी बात कि बीजेपी के कमंडल (धार्मिक एजेंडे) को नेपथ्य में डाल कर मंडल (जाति आधारित सामाजिक समीकरण) को हवा दी। लेकिन उनके जातीय आधारित क्षत्रपों में से एकाध को छोड़ बाकी खुद ही अपनी सीट पर जूझते नजर आए। यहां किसान आंदोलन भी उन्हें कुछ खास लाभ नहीं पहुंचा सका।
सपा का जमीन से कटना पिछड़ने का बड़ा कारण
दरअसल मुलायम सिंह और शिवपाल की समाजवादी पार्टी जमीन से जुड़ी रही। जमीनी कार्यकर्ताओं को हमेशा तवज्जो मिलती रही। इसके चलते ही वो यूपी की सियासत में अपनी मजबूत पकड़़ बनाते रहे। अब वो स्थिति नहीं रही। अखिलेश का बाहरियों को ज्यादा तवज्जो देना भारी पड़ता दिख रहा है। वैसे भी अखिलेश ने अब तक जिससे भी गठबंधन किया उन्हें कोई लाभ नहीं दिला सका। चाहे वो कांग्रेस हो या बीएसपी अथवा इस बार के सहयोगी दल
प्रियंका ने साफ-सुथरी राजनीति की मिसाल पेश की पर कमजोर संगठन ने पीछे किया
उधर कांग्रेस की बात करें तो प्रियंका गांधी वाड्रा ने एक शालीन राजनीति का उदाहरण पेश करने की कोशिश की। आधी आबादी पर फोकस किया। लेकिन सबसे बड़ी बात ये कि 2019 में सक्रिय राजनीति में आने के बाद जो उम्मीद प्रदेश व देश उनसे लगा रहा था उसमें वो सफल नहीं हो सकीं। ये दीगर है कि 2019 लोकसभा चुनाव के तत्काल बाद से वो यूपी में अकेले दम पर सक्रिय रहीं। महिला उत्पीड़न का मामला हो या आदिवासियों के नरसंहार का सबसे पहले पहुंचीं। समूचे यूपी में कांग्रेस संगठन को बदला। बावजूद इसके वो संगठन को ग्रासरूट पर खड़ा नहीं कर सकीं जिसका खामियाजा साफ दिख रहा है।
बीएसपी वोट कटवा के रूप में ज्यादा दिखी
वहीं बसपा की बात की जाए तो मायावती ने इस बार बहुत ज्यादा रैली भी नहीं की। सतीश चंद्र मिश्रा के साथ मिल कर उन्होंने 2007 के सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले को अपना कर यूपी फतह की कोशिश की लेकिन उसमें वो पूरी तरह से सफल होती नहीं दिखीं। अलबत्ता कई जहगों पर वोट कटवा की भूमिका में जरूर दिखी बसपा।

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