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जन्मदिन विशेष : न फनकार तुझसा तेरे बाद आया, मोहम्मद रफी तू बहुत याद आया

रफी के बड़े भाई हमीद ने मोहम्मद रफी के मन मे संगीत के प्रति बढ़ते रूझान को पहचान लिया था और उन्हें इस राह पर आगे बढऩे मे प्रेरित किया।

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Rajeev sharma

Dec 24, 2016

आवाज की दुनिया के बेताज बादशाह मोहम्मद रफी को पार्श्वगायन की प्रेरणा एक फकीर से मिली थी। पंजाब के कोटला सुल्तान सिंह गांव में 24 दिसंबर 1924 को एक मध्यवर्गीय मुस्लिम परिवार में जन्मे रफी एक फकीर के गीतों को सुना करते थे जिससे उनके दिल में संगीत के प्रति एक अटूट लगाव पैदा हो गया।

रफी के बड़े भाई हमीद ने मोहम्मद रफी के मन मे संगीत के प्रति बढ़ते रूझान को पहचान लिया था और उन्हें इस राह पर आगे बढऩे मे प्रेरित किया। लाहौर मे रफी संगीत की शिक्षा उस्ताद अब्दुल वाहिद खान से लेने लगे और साथ ही उन्होंने गुलाम अलीखान से भारतीय शास्त्रीय संगीत भी सीखना शुरू कर दिया।

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एक बार हमीद रफी को लेकर के. एल. सहगल संगीत के कार्यक्रम में गये लेकिन बिजली नही रहने के कारण के. एल. सहगल ने गाने से इनकार कर दिया। हमीद ने कार्यक्रम के संचालक से गुजारिश की वह उनके भाई रफी को गाने का मौका दे।

संचालक के राजी होने पर रफी ने पहली बार 13 वर्ष की उम्र मे अपना पहला गीत स्टेज पर दर्शकों के बीच पेश किया। दर्शकों के बीच बैठे संगीतकार श्याम सुंदर को उनका गाना अच्छा लगा और उन्होंने रफी को मुंबई आने के लिये न्यौता दिया।

श्याम सुंदर के संगीत निर्देशन मे रफी ने अपना पहला गाना 'सोनिये नी हिरीये नी' पाश्र्वगायिका जीनत बेगम के साथ एक पंजाबी फिल्म ‘गुल बलोच’ के लिये गाया। 1944 मे नौशाद के संगीत निर्देशन में उन्हेंअपना पहला हिन्दी गाना हिन्दुस्तान के हम है ..'पहले आप' के लिये गाया।

1949 में नौशाद के संगीत निर्देशन में दुलारी फिल्म में गाये गीत 'सुहानी रात ढ़ल चुकी' के जरिये वह सफलता की उंचाईयों पर पहुंच गये और इसके बाद उन्होंने पीछे मुडक़र नही देखा। दिलीप कुमार देवानंद, शम्मी कपूर, राजेन्द्र कुमार, शशिकपूर, राजकुमार जैसे नामचीन नायकों की आवाज कहे जाने वाले रफी अपने संपूर्ण सिने करियर में लगभग 700 फिल्मों के लिये 26 हजार से भी ज्यादा गीत गाये।

मोहम्मद रफी फिल्म इंडस्ट्री में मृदु स्वाभाव के कारण जाने जाते थे लेकिन एक बार उनकी कोकिल कंठ लता मंगेशकर के साथ अनबन हो गयी थी। मोहम्मद रफी ने लता मंगेशकर के साथ सैकड़ों गीत गाये थे लेकिन एक वक्त ऐसा भी आया था जब रफी ने लता से बातचीत तक करनी बंद कर दी थी।

लता मंगेशकर गानों पर रॉयल्टी की पक्षधर थीं जबकि रफी ने कभी भी रॉयल्टी की मांग नहीं की। रफी साहब मानते थे कि एक बार जब निर्माताओं ने गाने के पैसे दे दिए तो फिर रॉयल्टी किस बात की मांगी जाए। दोनों के बीच विवाद इतना बढा कि मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर के बीच बातचीत भी बंद हो गई और दोनों ने एक साथ गीत गाने से इंकार कर दिया हालांकि चार वर्ष के बाद अभिनेत्री नरगिस के प्रयास से दोनों ने एक साथ एक कार्यक्रम में 'दिल पुकारे..' गीत गाया।

मोहम्मद रफी ने हिन्दी फिल्मों के अलावा मराठी और तेलगू फिल्मों के लिये भी गाने गाये। मोहम्मद रफी अपने करियर में छह बार फिल्म फेयर अवार्ड से सम्मानित किये गये। 1965 में रफी पदमश्री पुरस्कार से भी सम्मानित किये गये। मोहम्मद रफी, बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन के बहुत बड़े प्रशंसक थे।

मोहम्मद रफी फिल्म देखने के शौकीन नही थे लेकिन कभी-कभी वह फिल्म देख लिया करते थे। एक बार रफी ने अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘दीवार’ देखी थी। दीवार देखने के बाद रफी, अमिताभ के बहुत बड़े प्रशंसक बन गये। 1980 में प्रदर्शित फिल्म ‘नसीब’ में रफी को अमिताभ के साथ युगल गीत 'चल चल मेरे भाई.' गाने का अवसर मिला।

अमिताभ के साथ इस गीत को गाने के बाद रफी बेहद खुश हुये थे। जब रफी साहब अपने घर पहुंचे तो उन्होंने अपने परिवार के लोगों को अपने पसंदीदा अभिनेता अमिताभ के साथ गाने की बात को खुश होते हुये बताया था। अमिताभ के अलावा रफी को शम्मी कपूर और धर्मेन्द्र की फिल्में भी बेहद पसंद आती थी।

मोहम्मद रफी को अमिताभ-धर्मेन्द्र की फिल्म शोले बेहद पंसद थी और उन्होंने इसे तीन बार देखा था। 30 जुलाई 1980 को 'आस पास' फिल्म के गाने .'शाम क्यू उदास है दोस्त..' को पूरा करने के बाद जब रफी ने लक्ष्मीकांत प्यारेलाल से कहा 'शुड आई लीव..' जिसे सुनकर लक्ष्मीकांत प्यारे लाल अचंभित हो गये क्योंकि इसके पहले रफी ने उनसे कभी इस तरह की बात नही की थी। अगले दिन 31 जुलाई 1980 को रफी को दिल का दौरा पड़ा और वह इस दुनिया को हीं छोडक़र चले गये।

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