
15 अगस्त 2020 : खंडहर में बदल रही है आजादी की याद दिलाती निशानियां
दिनेश शाक्य
इटावा. इटावा में आजादी के जमाने की कई निशानियां रखरखाव के अभाव में खंडहर मे तब्दील होती जा रही है। आजादी की गवाह यह बेजुबान इमारतें अपनी आज की हालात से सब कुछ बयां कर देती हैं। इन इमारतों में न जानें कितनी कहानियां छुपी हुई हैं। बेबस है कुछ कह नहीं सकती पर जिन्हें आजादी की लड़ाई में इन इमारतों के योगदान की मालूमात है वो आज भी हाथ जोड़कर खड़े हो जाते हैं और अपने निरंतर निकलते आंसू से अपने श्राद्धसुमन अर्पित करते हैं। अगर जल्द ही इन इमारतों का रखरखाव ठीक नहीं किया गया तो चंद दिनों में यह खंडहर भी लुप्त हो जाएंगे और नई पीढ़ी सिर्फ कहानियों में इन्हें याद करेगी।
देश 74वां स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहा है। एक बार फिर हम उन अमर सपूतों को याद करेंगे जिन्होंने आजादी के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। आज हमारे बीच आजादी के योद्धा तो नहीं हैं, लेकिन उनकी याद दिलाने के लिए कई खंडहर इमारतों के अवशेष जरूर हैं। आजादी के दौर की इन इमारतों को संजोने का सही ढंग से जिम्मेदारों की ओर से निर्वाहन नही किया गया, परिणामस्वरूप आजादी के दौर की यादें सिर्फ याद बन करके रह गई है।
सरकारों ने पूरी तरह से भुला दिया :- अगर बात करे इटावा जिले की तो यहा पर आगरा कानपुर हाइवे के पास से गुजर रहे जसवंतनगर के बलैयामठ का देश की आजादी की जंग में महत्वपूर्ण स्थान है। यह ऐतिहासिक बलैयामठ 1857 के गदर का गवाह है। जहा आजादी के दीवाने मंगल पांडे व उनके साथियों की फिरंगियों से हुई जंग की याद ताजा कराता है। मेरठ में भी विद्रोह ने तेजी पकड़ ली थी। ब्रिटिश शासकों ने इस विद्रोह को कुचलने के लिए कुचक्र रचा। ईस्ट इंडिया कंपनी के मुख्यालय कलकत्ता से मेरठ में सैन्य व रसद सामग्री भेजी गई। आजादी के दिनों मे छोटे से कस्बे के तौर पर पहचाने जाने वाले जसवंतनगर के मोहल्ला फक्कड़पुरा में स्थित बलैया मठ इस रास्ते में ही पड़ता था। लिहाजा मंगल पांडे ने ब्रिटिश हुकूमत के इस कुचक्र को इसी स्थान पर ध्वस्त करने की ठान ली थी। मंगल पांडे और आजादी के दीवाने उनके साथियों ने इस मठ पर डेरा डाल दिया। 18 मई 1857 को क्रांतिकारी अपना मिशन पूरा करने में कामयाब हुए। सैन्य व रसद सामग्री को यहीं पर लूट लिया गया था। ऐसे क्रांतिकारी स्थल को आजाद देश की रही सरकारों ने पूरी तरह से भुला दिया।
विरासत संजोकर नहीं रख सके आजाद देश के सत्तानशी :- इटावा के बीहडी इलाके चकरनगर तहसील हिस्से मे सबसे ज्यादा ऐतिहासिक इमारतें हैं, 1857 के गदर में अलग-अलग रियासतों के राजाओं को ब्रिटिश हुकूमत अपनी गुलाम बना रही थी। भरेह के राजा रूप सिंह तथा चकरनगर के राजा निरंजन सिंह जूदेव ने अंग्रेजों की दास्तां स्वीकार करने से इंकार कर दिया। नतीजन अंग्रेजों से जंग हुई। भरेह के राजा रूपसिंह को काला पानी की सजा सुनाई गई। उसी वक्त चकरनगर रियासत के राजा निरंजन सिंह जूदेव थे। उन्होंने भी अंग्रेजों से लोहा लिया। पर वो कहा गए उनका पता आज तक नहीं चला। बंसरी ग्राम के उन आजादी के दीवानों के परिजन आज भी यह जानने को उत्सुक हैं कि उनके बुजुर्गों का क्या हुआ। आजादी की जंग के गवाह बने भरेह व चकरनगर के दुर्ग को भी आजाद देश के सत्तानशी संजोकर नहीं रख सके।
सिर्फ अवशेष ही शेष रह गए :- बीहड़ी क्षेत्र चकरनगर में आज यहां यमुना-चंबल का संगम है वहां भरेह के राजा रूप सिंह का किला होने के साथ ही बंदरगाह हुआ करता था। वर्ष 1857 से पहले यहीं से जलमार्ग के जरिए व्यापार होता था। अब यहां सिर्फ अवशेष ही शेष रह गए हैं। चकरनगर में यमुना किनारे बना मठ भी आजादी की याद दिलाता है। यहां अंग्रेजों ने चकरनगर के राजा निरंजन सिंह जूदेव के किले को तोपों से उड़ा दिया गया था। कालेश्वर मंदिर और भारेश्वर मंदिर भी आजादी की याद दिलाते हैं।
कालेश्वर महापंचायत के अध्यक्ष बापू सहेल सिंह परिहार का कहना है कि आजादी के आंदोलन मे बीहडी इलाके का खासा योगदान रहा है और इस इलाके कई राजाओं ने अंग्रेजों की दास्ता को स्वीकार नहीं किया। परिणामस्वरूप उनके किलों को तोपों से ध्वस्त कर दिया गया है। इन खंडहर किलों को आज भी दूरदराज से देखने के लिए लोग आते रहते है। पर अब इनके पूरे तरह से नष्ट होने का खतरा बढ़ रहा है। सरकारी तौर पर इन्हें संरक्षित करने का प्रयास करना चाहिए।
स्मृतियां ही शेष रह जाएंगी :- इटावा स्थिति के.के.कालेज के इतिहास विभाग के प्रमुख डा.शैलेंद्र शर्मा का कहना है कि इन ऐतिहासिक धरोहरों को अगर समय रहते संरक्षित नहीं किया गया तो इनकी तस्वीरें और स्मृतियां ही शेष रह जाएंगी।
Published on:
14 Aug 2020 04:58 pm
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