
Gopaldas Neeraj File Photo
'लिखे जो खत तुझे, ऐ भाई जरा देख के चलो' आदि गीतों के लिए मशहूर गीतकार और पद्मभूषण सम्मानित गोपालदास नीरज की 19 जुलाई को चौथी पुण्यतिथि है। गोपलदास नीरज वह जाने माने कवि रहे जिनकी कलम जब भी कागज पर चली तो कविता के रूप में शानदार शब्द उभर कर सामने आए। उनके लिखे कई गानों को फिल्मी पर्दे पर भी उतारा गया। उनकी स्मृतियों को ताजा रखने के लिए लोगों ने उनकी जन्मस्थली पुरावली गांव को साधना केंद्र बनाने की मांग की है। लोगों का कहना है कि सरकार द्वारा कवि नीरज का स्मारक बनाए जाए, साथ ही उनकी मूर्ति भी स्थापित की जाए। गांव के प्रधान सुभाष यादव ने शासन से दिवंगत गोपालदास नीरज का स्मारक बनवाने के साथ ही द्वार बनावने की भी मांग की है।
लोगों की ख्वाहिश, गोपालदास नीरज का बने स्मारक
महेवा ब्लॉक के पुरावली गांव में 4 जनवरी, 1925 को जन्मे नीरज जब 6 साल के थे तब उनके सिर से पिता बृजकिशोर का साया उठ गया था। इसके बाद परिवार इकदिल कस्बे के कायस्थान मोहल्ले में रहने लगा था। नीरज का पालन पोषण उनके फूफा हरदयाल प्रसाद ने किया था। उनके निधन से पुरावली और इकदिल में शोक व्याप्त है। गांव के लोग चाहते हैं कि पुरावली में देश के जानेमाने कवि का स्मारक और उनकी मूर्ति की स्थापना की जाए। इसके साथ ही साहित्य साधना केंद्र का निर्माण हो सके जिससे कि यहां आने वाले साहित्य प्रेमियों को उनके बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी मिल सके।
गांव के महंत मदन मोहन ने कहा कि यहां कवि नीरज की पुश्तैनी जमीन है जिसकी लोग मिल कर देखरेख करते हैं। उनका यहां मकान भी था, जिसकी जगह पर मंदिर बना हुआ है। जब कभी गोपालदास नीरज यहां आए तो ठाकुर जी के दर्शन करके ही गए।
हिंदी गीतों के सुकोमल गीतकार थे गोपालदास नीरज
इटावा के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ.कुश चतुर्वेदी कहते हैं कि गोपालदास नीरज एक नामभर नहीं है, वह हिंदी गीतों के सुकोमल गीतकार भी थे। उनकी शैली और चिंतन किसी भी कवि से अनुकरण नही है। नीरज अपने आप में एक शैली थे। देश के दूसरे कवियों को नीरज से उस चिंतन धारा से जुडना चाहिए जिससे समाज को एक संदेश मिलता हुआ दिखाई देता रहा है। नीरज को बचपन मे पंतग उडाने का बहुत शौक था। उनके गांव पुरावली से चंद किलोमीटर की दूरी पर यमुना नदी है।
कानपुर से शुरू हुआ प्रेमगीत का सफर
कवि गोपालदास नीरज ने एटा से ही 1942 में हाईस्कूल की शिक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की और इटावा कचहरी में टाइपिस्ट की नौकरी शुरू की। टाइपिस्ट की नौकरी रास नहीं तो वर्ष 1946 में दिल्ली के आपूर्ति विभाग में 67 रुपये प्रतिमाह की नौकरी करने लगे। यह भी पसंद नहीं आया, तो कानपुर चले गए और डीएवी कालेज में लिपिक के पद पर नियुक्त हो गए। यहां आए तो शहर से उनका इस्तकबाल पूरे मन से हो गया। यहीं से प्रेमगीत का सफर शुरू हुआ। उन्होंने फिल्मों के लिए कई गीत लिखे जो आज भी लोगों की जुबां पर रहता है। राज कपूर की फिल्म 'मेरा नाम जोकर' का मशहूर गाना 'ऐ भाई जरा देख के चलो' इनमें से एक है।
Published on:
19 Jul 2022 07:44 pm

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