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चंबल में बदलाव की बयार, 22 गांव के गुर्जरों का शराब और डकैती से तौबा, एक संत के उपदेश का असर

करीब डेढ़ दशक पहले तक डाकुओं की शरणस्थली के तौर पर कुख्यात चंबल घाटी में अब बदलाव की बयार बहनी शुरू हो गई है...
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Etawah Gurjar

चंबल में बदलाव की बयार, 22 गांव के गुर्जरों का शराब और डकैती से तौबा, एक संत के उपदेश का असर

दिनेश शाक्य
इटावा. करीब डेढ़ दशक पहले तक डाकुओं की शरणस्थली के तौर पर कुख्यात चंबल घाटी में अब बदलाव की बयार बहनी शुरू हो गई है। इस बदलाव के नायक हैं एक संत, जिनकी वाणी का इतना प्रभाव पड़ा है कि लोगों ने सिर्फ शराब से तौबा कर लिया है, बल्कि सबने बारात में बैंड और आतिशबाजी पर भी पूरी तरह रोक लगा दी है। बात हो रही है चकरनगर सहित जनपद के 22 गांव के गुर्जर समाज की। गौरतलब है कि इस क्षेत्र में गुर्जर समाज से तमाम दुर्दांत डकैत हुए हैं और यह क्षेत्र शराब और अन्य नशीले पदार्थों के अवैध कारोबार के लिये जाना जाता था।

गूर्जर विकास परिषद के उपाध्यक्ष रधुवीर सिंह गुर्जर बाबा बताते हैं कि राजस्थान धौलपुर के मौरौली गांव निवासी संत शिरोमणि 1008 श्री हरिगिरि महाराज एक संत के उपदेश से गूर्जर वर्ग से जुड़े लोगों ने अपने आप को शराब से दूर रखने की शपथ ली हुई है। संत के समक्ष ली गई शपथ का व्यापक असर होता हुआ भी दिखाई दे रहा है। मध्यप्रदेश के भिंड, मुरैना और ग्वालियर जिले में संत की शपथ पूरी तरह से लोगों ने लागू करना शुरू कर दी है।

रधुवीर सिंह गुर्जर बाबा ने बताया कि इटावा और औरैया जिलों में 42 गांव ऐसे हैं, जहां गुर्जरों की संख्या सबसे अधिक है। इन गांवों के युवा और बुजुर्गों ने शराब छोड़ने की शपथ ली हुई है। उन्होंने कहा कि डेढ़ दशक पहले जब डाकुओं की फौज सक्रिय हुआ करती थी, तब समाज के लोगों के सामने खासी मुश्किल हुआ करती थी। क्योंकि समुदाय के हर आदमी को पुलिस डाकू समझ कर काम करती थी, लेकिन आज कोई संकट नहीं है।

कभी चंबल में गुर्जरों की गरजती थीं बंदूकें
एक समय चंबल घाटी में कुख्यात डकैत निर्भय गुर्जर, रज्जन गुर्जर, रामवीर गुर्जर, अरविंद गुर्जर, सलीम गुर्जर और जगन गूर्जर जैसे डकैतों का खासा आंतक रहा है। चंबल में प्रतिस्पर्धा के चलते साल 2004 में गूर्जर डाकुओं में आपस में गैंगवार के चलते अरविंद रामवीर गूर्जर को मौत के घाट उतारने के लिए जहां निर्भय ने 20 लाख का इनाम घोषित किया था, वहीं अरविंद और रामवीर ने निर्भय पर 40 लाख का इनाम घोषित किया, लेकिन कोई किसी को ठिकाने नहीं लगा सका। इन डाकुओं के आंतक की वजह से पूरा गुर्जर समुदाय भी हमेशा शक के घेरे में रहता था। दस्युओं के खौफ में इस समाज के लोग शराब व अन्य बुराइयों में डूबे हुए थे। हालांकि, समय बदला और चंबल के बीहड़ से डकैतों का राज खत्म हुआ। इससे न केवल गुर्जर समुदाय ने खुलकर सांस ली, बल्कि शराब से तौबा व तमाम कुप्रथाओं से भी किनारा करने का एलान कर दिया।

शराब पिया तो जुर्माना
गुर्जर समाज के लोगों ने पूर्णरूप से शराब बंद कर दी है। यही नहीं शादी में दहेज, चढ़ावा और तेरहवीं भी सीमित दायरे में कर दी है। इसके अलावा शराब पीने वाले पर जुर्माना और पकड़ाने वाले को ईनाम का भी नियम बनाया है। गुर्जर समाज के उक्त संदेश ने समाज को एक नई दिशा दी है। गूर्जर समाज के अहम लोगों ने एक शर्त भी रखी गई है कि यदि गांवों में कोई भी गुर्जर समाज का व्यक्ति शराब पीते हुए पकड़ा जाता है तो उसे 11 हजार रुपये का जुर्माना कमेटी को देना होगा। शराब पीने वाले की सूचना देने वाले युवक को भी एक हजार रुपये का ईनाम दिया जाएगा। जुर्माना सिर्फ तीन बार ही स्वीकार किया जाएगा। इसके बाद उसे समाज से बहिष्कृत कर दिया जाएगा।

बदलाव का स्वागत
गूर्जर समुदाय के बदले हुए मिजाज पर इटावा के एसएसपी अशोक कुमार त्रिपाठी कहते है कि अगर कोई समाज पुरानी कुरातियों को खत्म करने के लिए कोई नया परिवर्तन कर रहा है तो फिर इससे बेहतर और क्या बात हो सकती है। समाज के सभी लोग बधाई के पात्र हैं।

इतिहास के जानकार बोले
इटावा के कर्मक्षेत्र पोस्ट ग्रेजुएट पीजी कॉलेज के इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ.शैलेंद्र शर्मा कहते है कि कोई भी व्यक्ति या समुदाय अपने ऊपर लगे हुए आक्षेपों को हटाने के लिए समाजिक कुरीतियों को दूर करने के लिए होने वाले जन आंदोलनों में भाग लेता रहता है। यह इतिहास में भी होता रहा है। वह चाहे डकैत बाल्मीक की बात हो या फिर अगुंलीमाल जैसे लोगों की, इन लोगों ने भी अपने पर लगे आक्षेपों को हटाने के लिए जनआंदोलन मे भाग लिया था।

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