
चंबल में अब "गब्बर" से नहीं "अजगर" से डरते हैं लोग
दिनेश शाक्य
इटावा. चंबल के डाकुओं पर बनी देश की सबसे लोकप्रिय फिल्मों में से एक "शोले" फिल्म में गब्बर सिंह का डायलाग ........यहॉ से 50-50 कोस दूर तक मॉ अपने बच्चों को गब्बर सिंह का नाम लेकर सुलाती है.........लेकिन आज बदले हालात में गब्बर की जगह नया गब्बर अजगर आ गया है जिसका नाम लेकर बच्चों को सुलाना पड़ रहा है।
चंबल की हकीकत यही है कि चंबल में लगातार निकल रहे अजगरों की वजह से चंबल के बच्चे ना केवल डर रहे हैं बल्कि घरों में कैद हो गए हैं। बच्चों के माता-पिता को यह डर सता रहा है कि उनके बच्चों को कहीं कोई अजगर निवाला ना बना डाले।
खूंखार डाकुओं के शहर के रूप मे विख्यात इटावा में अब दहशत का एक नया दानव अजगर खौफ के रूप में सामने आ गया है। यहां पर जिस तरह से अजगर एक के बाद एक करके निकलते जा रहे हैं, उसे देख करके यही कहा जा रहा है कि अजगरों की सबसे बड़ी शरणस्थली इटावा की जमी हैं।
सहसो इलाके के चंद्रहंसपुरा में एक विशालकाय अजगर को देख कर मासूम मंदोदरी इतनी डर गई कि अब भी डरी और सहमी हुई नजर आ रही है, उसके पिता शिवकुमार भी अब अजगरों की वजह से अपने बच्चों को घरों से बाहर नहीं निकलने दे रहे हैं। इसी तरह का हाल अन्य गांवों का भी बना हुआ है।
यहां जमीन पर ही नहीं, पेड़ों पर भी अजगर अपने अशियाना बनाए हुए हैं। एक दर्जन ऐसे मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें अजगर को पेड़ों से उतार कर संरक्षित किया गया है।
अलर्ट रहने की जरूरत है
इटावा के प्रभागीय निदेशक वन सत्यपाल सिंह का कहना है कि गांव के लोग घर से निकलने से पहले सतर्कता बरतें और सुबह शाम उन्हें विशेष रूप अलर्ट रहने की जरूरत है। उनका कहना है कि अजगर ऐसा सांप है, जो सामान्यता लोगों को नुकसान नहीं पहुचाता है, लेकिन जब उसकी जद में कोई आ जाता है तो बचना काफी मुश्किल हो जाता है। अजगरों के शहर की ओर आने के पीछे मुख्य कारण जंगलो का खासी तादात में कटान माना जा रहा है। इसी के चलते अजगरों के वास स्थलों को नुकसान हो रहा है, इसलिये अजगरों को जहां भी थोड़ी बहुत हरियाली मिलती है वहीं पर अजगर अपना बसेरा बना लेते हैं।
इन्हें संरक्षित घोषित कर दिया गया है
सत्यपाल सिंह कहते हैं कि अजगर एक संरक्षित जीव है। हिंदुस्तान में सुडूल-वन प्रजाति के अजगरों की संख्या काफी कम हैं। अजगर एक संरक्षित प्राणी है। यह मानवीय जीवन के लिए बिलकुल खतरनाक नहीं है परंतु सरीसृप प्रजाति का होने के कारण लोगों की ऐसी धारणा बन गई और इसकी विशाल काया के कारण लोगों में अजगर के प्रति दहशत फैल गई है। हिंदुस्तान में इस प्रजाति के अजगरों की संख्या काफी कम है, यही कारण है कि इन्हें संरक्षित घोषित कर दिया गया है, परंतु इसके बावजूद इनके संरक्षण के लिए केंद्र अथवा राज्य सरकार ने कोई योजना नहीं की है। इसलिए पकड़े जाने के बाद छोटे बड़े अजगरों को संरक्षित वन क्षेत्रो़ में सुरक्षात्मक तौर पर छोड़ दिया जाता है।
इसलिए कर रहे हैं शहरों की ओर रुख
उत्तर प्रदेश में पर्यावरण की दिशा में काम कर रही संस्था सोसायटी फॉर कंजरर्वेसन ऑफ नेचर के सचिव संजीव चौहान और उनकी टीम की बदौलत अभी तक करीब-करीब सभी अजगर पकड़े गये हैं। चंबल घाटी के यमुना तथा चंबल क्षेत्र के मध्य तथा इन नदियों के किनारों पर सैकड़ों की संख्या में अजगर हैं। हालांकि इन अजगरों की कोई तथ्यात्मक गणना नहीं की गई है। वे बताते हैं कि अजगरों के शहरी क्षेत्र में आने की प्रमुख वजह यह है कि जंगलों के कटान होने के कारण इनके प्राकृतिक वास स्थल समाप्त होते जा रहे हैं। जंगलों में जहां दूब घास पाई जाती है, वहीं यह अपने आशियाने बनाते हैं। अब जंगलों के कटान के कारण दूब घास खत्म होती जा रही है। इसके अलावा अजगर अपने वास स्थल उस स्थान पर बनाते हैं जहां नमी की अधिकता होती है, परंतु जंगलों में तालाब खत्म होने से नमी भी खत्म होती जा रही है।
कम ही नजर आ रहीं हैं
चंबल के वाशिंदे बताते हैं कि देश की आजादी के बाद वह लगातार कुख्यात दस्यु गिरोहों के खौफ से जूझते रहे हैं। इन डकैतों के संरक्षण के नाम पर पुलिस की दहशत भी हमने झेली है। परंतु जब पुलिस ने दर्जनों कुख्यात दस्यु सरगनाओं को मार दिया अथवा समर्पण करने को मजबूर कर दिया तो अब अजगर सहित जहरीले सांपों की दहशत से निजात मिलने की संभावनाएं कम ही नजर आ रहीं हैं।
इटावा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अशोक कुमार त्रिपाठी बताते हैं कि जब कभी भी अगर निकलते हैं तो फिर उनको देखने के लिए भारी भीड़ जुट जाती है, जिस कारण पुलिस को भेजा जाना सुनिश्चित कर लिया गया है क्यों कि कभी-कभी गुस्साई भीड़ अजगरों को मार डालती है।
500 से अधिक अजगर निकल चुके हैं
इटावा में करीब 10 साल से एक के बाद एक खासी तादात में अजगर निकलते चले आ रहे हैं। इस अवधि में करीब 500 से अधिक अजगर निकल चुके हैं। करीब 2 फुट से लेकर 20 फुट और 5 किलो से लेकर 80 किलो से अधिक वजन वाले अजगर निकले हैं। इस अवधि में कई मौके ऐसे भी आये हैं जहां अजगरों को मौत की नींद गुस्साए लोगो ने सुला दिया।
चंबल में अब तक निकले अजगरों की कहानी किसी भी तरह से विचित्रताओं से भरी कम नहीं लगती है। जब चंबल मे खूंखार डाकुओ का आंतक था, तब इस कदर अजगरों के निकलने का सिलसिला नहीं था लेकिन आज डाकुओं के आतंक की समाप्ति होते ही अजगरों ने अपना बसेरा बना लिया है।
Published on:
26 Jul 2018 03:06 pm
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