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पूर्व जनरल बोले- हमारी सेना दुनिया में सबसे ऊपर

सिखलाइट इन्फैंट्री रेजिमेंट द्वारा 75 वीं प्लैटिनम जुबली।  

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Farrukhabad

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फर्रुखाबाद. सिखलाइट इन्फैंट्री रेजिमेंट द्वारा 75वीं प्लैटिनम जुबली एवं 26 वें द्विवार्षिक में गुरुवार सुबह कर्नल ऑफ दि रेजिमेंट लेफ्टिनेन्ट जरनल डी अनबू, यू वाई एसएम एवी एसएम, वाईएसएम,एसएम,जीओसी-इन-सी (उत्तरी कमान) सेंटर कमांडेंट विग्रेडियर एसके सेंगर ने अन्य अधिकारियों के साथ परेड ग्राउंड पर सलामी ली। पूर्व जरनल विक्रम सिंह ने कहा कि चेंजिंग के लिए सेना अपने सम्मेलन कराती रहती है, आने वाले समय में सेना मॉर्डन दिखाई देगी, जो समय आ रहा है, उसमें सेना बहुत ही मजबूत हो जाएगी। दूसरी तरफ जो विदेशी साइबर क्राइम के हमले कर रहा है, उसका जवाब हमारी सेना लगातार दे रही है। हमारी सेना बहुत ताकतवर है। अपने दुश्मन को बहुत जल्द पहचान लेती है।

पूर्व जरनल मलिक ने कहा कि 75 साल पूरे होने पर स्थापना दिवस मना रहे हैं। 1857 से हम देश के लिए काम कर रहे हैं, मैं यहां पर पुराने साथियों से मिलने नए साथियों का उत्साह बढ़ाने के लिए आया हुआ हूं। हमारी सेना दुनिया में सबसे ऊपर है। कारगिल में हमारी जो जीत हासिल हुई थी वह काबिले तारीफ है। विदेशी सेना के साथ मिलकर अभ्यास करते हैं, तो कुछ हम सीखते हैं, कुछ उन्हें सीखने का मौका मिलता है।
परेड ग्राउंड पर आर्मी डॉग टीम द्वारा सभी अधिकारियों के सामने कमल का फूल बनाना,11 स्थानों पर जम्प लगाकर उनको पार करना, बर्मा ब्रज पर चला, रस्सी पर चलना, मौली डॉग द्वारा विस्फोटक खोजना, आर्मी डॉग द्वारा आतंकवादियों को पकडऩा, डॉग गजनी द्वारा कपड़े को सूंघ कर आतंकियो को पकडऩा, इस टीम ने कई पदक जीत चुके हैं।
दूसरी तरफ आर्मी सर्विस कोर बंगलुरू के कैप्टन धीरज सिंह द्वारा विभिन्न प्रकार के करतब दिखाए गए। इस टीम द्वारा 6 विश्वस्तरीय कीर्तिमान स्थापित किए गए हैं। इस टीम में 1 अधिकारी 22 जवान हैं। ड्रिल परेड 1931 में भारत में शुरू हुई थी। आज सिखलाइट रेजिमेंट में मनीष कुमार जैन को सौंपी गई है। उसके बाद 1980 में विदेश में मोटर पैराशूट शुरू किया था। 1996 में आर्मी में शामिल किया गया था। यह इटली द्वारा निर्मित है जिसका वजन 27 किलो का है। 35 से 40 किलोमीटर से चलता है, इसके टैंक में 16 लीटर डीजल आता है। कार्यक्रम को देख कर लोगों ने काफी तारीफ की और तालियां बजाकर उत्साहवर्धन किया, उसके बाद अधिकारियों द्वारा गुरुद्वारे में माथा टेका।

रेजीमेंट ने हमेशा अपनी साख बनाए रखी

प्रथम विश्वयुद्ध से लेकर आज तक सिखलाई इनफैंट्री के नाम से लेकर यूनीफार्म तक में कई बदलाव हुए, लेकिन शौर्य की विरासत को संजोए रेजीमेंट ने हमेशा अपनी साख बनाए रखी। देश की आजादी के दो माह बाद हुए पाकिस्तान का पहला हमला हो या कारगिल युद्ध की चुनौती, दुश्मन को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए भी इसी रेजीमेंट को आगे किया गया। अफ्रीका, अफगानिस्तान, तिब्बत, मिस्त्र व श्रीलंका सहित विश्व के विभिन्न देशों में अपने शौर्य का लोहा मनवा चुकी सिखलाइट रेजीमेंटल सेंटर में स्थापना के प्लेटिनम जुबली समारोह शुरू हो चूका है। 19वीं सदी के मध्य इंफैंट्री का गठन रामदासिया और मजहबी सिख समुदाय के जाबांजों से किया गया था। यह सैनिक अपनी अतुलनीय निष्ठा और असाधारण शौर्य के लिए जाने जाते हैं। वर्ष 1887 में खड़ी की गई सिख पायनियर की 23, 32 व 34वीं रेजीमेंट ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अफ्रीका, अफगानिस्तान, तिब्बत व मिस्र में अपने शौर्य का प्रदर्शन कर रॉयल का खिताब अर्जित किया।
द्वितीय विश्व युद्ध में दोबारा इसे सिखलाइट इंफैंट्री के नाम से गठित किया गया। प्रथम सिखलाई रेजीमेंट ने वर्मा में युद्ध के दौरान अपने जौहर दिखाए। इसके लिए उन्हें वर्मा 1942-45 का खिताब दिया गया। आजादी के तुरंत बाद देश पर हुए पहले हमले में सिखलाइट इंफैंट्री ने जम्मू और कश्मीर से दुश्मनों को खदेड़ा। 1962 से 1968 के बीच भारत-पाक युद्धों के दौरान भी सिखलाइट इंफैंट्री ने युद्ध कौशल का बेहतरीन प्रदर्शन किया। श्रीलंका में तैनाती के दौरान सिखलाइट इंफैंट्री की 13वीं बटालियन ने जाफना यूनीवर्सिटी से लिट्टे लड़ाकों को खदेड़ कर जाफना विश्वविद्यालय पर कब्जा जमा लिया। ऑपरेशन पराक्रम के दौरान सिखलाइट की 11वीं व 16वीं रेजीमेंट ने भाग लिया। आपरेशन मेघदूत में भी सिखलाइट ने उल्लेखनीय योगदान किए।