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200 साल पुरानी है राम लीला मंचन की प्रथा, जानिए क्या है पूरा इतिहास, देखें वीडियो

जिले में रामलीला का इतिहास बहुत पुराना है आज भी सरस्वती भवन की रामलीला देखने के लिए बहुत बहुत दूर से लोग आते हैं।

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200 साल पुरानी है राम लीला मंचन की प्रथा, जानिए क्या है पूरा इतिहास, देखें वीडियो

फर्रुखाबाद. जिले में रामलीला का इतिहास बहुत पुराना है आज भी सरस्वती भवन की रामलीला देखने के लिए बहुत बहुत दूर से लोग आते हैं। रामलीला कमेटी मंचन पर विशेष ध्यान देती है। कलाकारों का कहना है कि वर्तमान में टीवी और फिल्मों में जो कलाकार अपना अभिनय करते हैं यदि को शब्द गलत हो जाता है तो उसको दोबारा दोहराया जाता है लेकिन इस मंच पर हर चौपाई से लेकर डायलाग को कलाकार विल्कुल सही तरीके से बोलता है जिससे सामने बैठे दर्शक को सवाल न कर सके। यह रामलीला का मंचन तुलसीदास द्वारा रचित रामचरित मानस के आधार पर होती है।

किसने की थी रामलीला की शुरुआत

सरस्वती भवन की रामलीला की शुरुआत पंडित स्व कृपाशंकर, करूणा शंकर के पूर्वजो द्वारा की गई थी। पहले इस भवन में अंग्रेज भी अपने कार्यक्रमों का आयोजन किया करते थे। रात में कलाकारों द्वारा रामलीला का मंचन किया जाता था। जब रामबारात निकलती थी तो उसको देखने के लिए दूर दराज के लोग दो दिन पहले ही शहर में आकर रुक जाते थे। जिस समय बारात निकलती थी तो दुकानों की पटियो पर भी खड़े होने की जगह नहीं मिलती थी।

मलीला की खुद की करोड़ों जमीन जानिए कैसे

सरस्वती भवन की रामलीला कमेटी के पास रामलीला के लगभग 75 बीघा शहर में जमीन थी जिसको वर्तमान में दलित वर्ग के लोगों ने कब्जा कर लिया है जिसमें केवल वर्तमान में तालाब ही बचा है। कुछ जमीन तिकोना चौकी के पास है। लालगेट के पास ही और भी जमीन है जिसमे दुकाने वनी हुई है कुछ दुकानदार किराया दे रहे। वहीं कुछ दुकानदारो ने मुकदमा कर दिया है। वर्तमान में यदि रामलीला की जमीन की कीमत का आकलन किया जाए तो करोड़ों में है।

कितना बजट कैसे होता पूरा

पूरे सत्र रामलीला के खर्चे का बजट 12 लाख रुपये है। जिसमे 2लाख 60 हजार रुपये व्यापारियों से चंदा करके जुटाया गया है। बाकी का बजट रामलीला के पदाधिकारी आपस मे मिलकर पूरा करते है साथ ही रामलीला की कुछ दुकानों का किराया जो साल भर में एकत्र होता है उसको इसी खर्चे में खर्च किया जाता है।

कौन कौन करते रामलीला मंचन

इस इतिहासिक रामलीला में मंचन के लिए बाहर से कलाकार नही बुलाये जाते है बल्कि यहां के कलाकारों को अन्य जिलों में मंचन के लिए बुलाया जाता है। शहर के तमाम लोग जैसे बकील, शिक्षक, छात्र, रेलवे कर्मचारी, डॉक्टर विभिन्न किरदारों का मंचन करते है। दिन में लोग अपनी अपनी नौकरी व व्यापार करते है रात में अपने आप आकर रामलीला खेलते हैं। सभी कलाकारों को रामायण का जो किरदार निभाना है वह पूर्ण रूप से याद होता है।

रामलीला इतिहासिक क्यों

र्रुखाबाद प्राचीन स्थली है क्योंकि भगवान के पांचवे अवतार कपिलमुनि का जन्म यही हुआ था। उसके बाद यह राजा द्रोपद की राजधानी भी थी। यह पर द्रोपदी का विवाह हुआ था। भगवान बुद्ध की तपस्या स्थली भी है। बनारस के बाद सबसे अधिक शिवालय भी है। गंगा घाट के किनारे बसा हुआ शहर है। इसलिए इसको अपरा काशी भी कहा जाता है।

रामलीला के आयोजक कौन है

रामलीला कमेटी में पदाधिकारी बहुत है लेकिन आयोजक केवल मटर लाल दूवे है। जो एक डायरेक्ट का काम करने के साथ रामलीला का मंचन भी करते है। वह 235 सालो से लगातार यह कार्य कर रहे है। वह बनारस, गुजरात, आगरा, शाहजहापुर, बरेली, सहित दर्जनों जिलो में रामलीला का मंचन करने वाले कलाकारों को तैयार कर चुके है।