23 जनवरी 2026,

शुक्रवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

जान‌िए : साधु संत क्यों करते हैं कल्पवास और हठ योगा

वह इंसान जो अपने परिवार को छोड़कर, सारे रिश्ते-नाते तोड़कर भगवान की भक्ति में इस तरह लीन हो जाते हैं कि उन्हें अपना ही ध्यान नहीं रहता है।

2 min read
Google source verification
Sadhus saint do kalpavas and hatha yoga

फर्रुखाबाद. आखिर धरती वासियों को हठयोग से क्या फायदा होता है? इन सवालों का जवाब पाते ही आप हैरान हो जाएंगे। वह इंसान जो अपने परिवार को छोड़कर, सारे रिश्ते-नाते तोड़कर भगवान की भक्ति में इस तरह लीन हो जाते हैं कि उन्हें अपना ही ध्यान नहीं रहता है। साधु का भेश धारण करने बाद इंसान आम जनमानस की तरह सुख-समृद्घि की कामना के लिए हठयोग करना शुरू कर देता है और भगवान विष्णु को प्रसन्न करने मे लग जाता हैं।

महंत बाबा बालकदास बताते हैं कि ऋतुओं के विपरीत यह साधु संत अपनी हठ तपस्या करके विष्णु भगवान को प्रसन्न करते हैं और इसके साथ ही जनमानस की सुख-समृद्घि की कामना करते हैं। धूनी तप कर रहे साधु रघुवीरदास, बजरंगदास और मुकेश दास वर्ष भर भगवान विष्णु की साधना में लीन बने रहते हैं।

मेघ-डंबर का करते हैं अनुष्ठान

महंत बताते हैं कि ज्येष्ठ माह के दशहरे से कार्तिक माह की चौथ तक साधु, संत मेघ-डंबर का अनुष्ठान करते हैं। इसके तहत वह 24 घंटे खुले आसमान के नीचे बैठकर भगवान से वारिश की कामना करते हैं। कार्तिक माह से माघ तक यह साधु कभी गंगा में खड़े होकर तो कभी 300 मटके ठंडे जल से स्नान कर प्रकृति के विपरीत जाकर अपने शरीर को कष्ट देते हैं। साधुओं की साज सज्जा भस्म लपेटने से होती है। धूनी पर बैठकर साधु चंदन, रोली व बंधन से श्रृंगार करते हैं।

पौष की पूर्णिमा से कल्पवास होगा शुरू

फर्रुखाबाद के पंचाल घाट पर माघ महीने में लगने वाले मेला श्रीरामनगरिया में कल्पवास के लिए साधु संतों का आना शुरू हो गया है। पौष (पूस) महीने की पूर्णिमा के स्नान के साथ ही उनका कल्पवास शुरू हो जाएगा। श्रद्धालुओं के ल‌िए प्रशासन ने मेले की तैयारियां भी शुरू कर दी हैं। इसमें साधु-सन्यासियों से लेकर गृहस्थ तक माघ महीने में भागीरथी के तट पर कल्पवास पर भगवान विष्णु की आराधना करते हैं। पौष (पूस) की पूर्णिमा से माघ की पूर्णिमा तक कल्पवास चलता है। राजस्थान के भीलपाड़ा के दानेश्वर धाम से आए नागा साधु बाबा रामदास ने बताया कि वे 1984 से यहां कल्पवास करने आ रहे हैं।

कुटिया तैयार करते हैं साधु संत

साधु संत पहले रोशनी के लिए कल्पवासी लालटेन का प्रयोग करते थे। कल्पवासियों की दिनचर्या केवल भागवत भजन ही थी। उन्होंने बताया है कि इस बार नागा साधु अपने अखाडे़ को सजाने संवारने के लिए पहले से ही डेरा जमाना शुरू कर दिया है। अन्य जिलों से 18 युवा नागा संन्या‍सी अखाडे़ में आकर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने वाले हैं। मेले के दौरान निकलने वाली शोभा यात्राओं में 56 तरह के हथियारों से करतब दिखाया जाएगा। पटाबाजी, बल्लम, फरसा, कांता, दोधारू, चौमुखी, चक्र, वननेती, धनुष बाण आदि से सुसज्जित साधु अपने हुनर का प्रदर्शन भी करेंगे। चौरासी परिक्रमा बद्रिका वन के कुंदन बाबा वर्ष 1999 से पांचाल घाट पर कल्पवास करने के लिए आ रहे हैं। कुंदन बाबा बताते हैं कि, मेले की सूरत में अब काफी बदलाव आया है। आधुनित मेले में कल्पवासियों को किसी तरह की कोई तकलीफ नहीं होती है।