
फर्रुखाबाद. राजा द्रोपद की राजधानी पांचाल प्रदेश में पांचाल घाट हुआ करता था लेकिन लोगों की मानें तो त्रेता युग मे गणमुक्तेश्वर में जन्मे स्रंगी ऋषि को किसी कारण से श्राप लगा होने के कारण उनके सिर पर तीन सींग निकल आए। फिर उनको खत्म करने के लिए गंगा के किनारे तपस्या करने को कहा गया तो वह वहां से जिस स्थान पर गंगा के किनारे रुके तो उन्हीं के आधार पर उसका नाम रख दिया गया था।
पांचाल घाट नाम दोबारा से लिया जाने लगा
उसी प्रकार जब वह पांचाल घाट पहुंचे तो उनके तीनो सिंघों का बहुत तेजी से घटना शुरू हो गया। उसी बजह से इस घाट का नाम घटिया पड़ गया। तभी से इस घाट को घटियाघाट कहने लगे। लेकिन तत्कालीन जिलाधिकारी एनकेएस चौहान ने घटियाघाट के मुख्यमार्ग का सुंदरीकरण कराकर उसका दोबारा से पांचाल घाट रखने की कबायद शुरू कर दी। उसके बाद सबसे पहले अपने सरकारी फाइलों में घटियाघाट का नाम बदलकर पांचाल घाट करा दिया। उसके बाद उन्होंने पूरे जिले में सरकारी कर्मचारियों के लिए एक आदेश जारी किया जो भी कर्मचारी घटियाघाट नाम लेगा उसके ऊपर 500 रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा। इस मुहिम में को लोगो ने सहयोग किया उसके बाद हर कार्य मे पांचाल घाट नाम दोबारा से लिया जाने लगा है। 18:06 ऋषि स्रंगी के समय कौन कौन से घाटो का नामकरण हुआ-जब वह अपने घर से निकले तो सबसे पहले गंगा के किनारे नगर सोरो घाट पड़ा क्योकि यहां पर उनके सिंघो में सरसराहट होना शुरू हुई थी।
सिंघों का बहुत तेजी से घटना शुरू
कृष्णनन्द ने बताया कि उसके बाद हमारे पूर्वज बताते थे कि जब वह वर्तमान में कछिला घाट तो उनके वहां पहुंचे पर उनके सिंघो में कम्पन शुरू हो गया था तो उस घाट का कपिला घाट पड़ गया था। बाद में लोगों ने उसका नाम कछिला घाट रख लिया है। जब वह शमशाबाद क्षेत्र में गंगा घाट पर पहुंचे तो उनके सिंघो का ढहना शुरू हो गया था तो उसका नाम ढाई घाट पड़ गया जो अभी चला आ रहा है।जब वह इस घाट पर आए तो सिंघों का बहुत तेजी से घटना शुरू हुआ तो इसका नाम घटियाघाट पड़ गया। उसके बाद वह गंगा के किनारे तपस्या करने लगे तो लोगो ने उनकी तपस्या को देखते हुए उसने आस पास रहना शुरू कर दिया जिस कारण वहां बस्ती बन गई तो उस गांव का नाम स्रंगी रामपुर पड़ गया है।
इस घाट के रोचक तथ्य
इस घाट से पूरे देश मे व्यापार किया जाता था यहां से बनाई गई काठ की नाव पूरे देश मे बेचा जाता था। स्रंगी ऋषि के बाद हजारों ऋषियों ने इस घाट के आस पास गंगा के किनारे तपस्या करके आश्रमो की स्थापना की है। इस घाट पर इलाहाबाद के बाद दूसरा मिनी कुम्भ का मेला माघ के महीने में लगता है। इस मेले में लाखों लोग कल्पबास करते है। यह घाट आर्मी सेंटर के नजदीक है। इस घाट पर पहले राजा द्रोपद अपनी पुत्री द्रोपदी के साथ गंगा दर्शन को आते थे। इस घाट के आस पास के क्षेत्र में सैकड़ो मंदिरों का निर्माण कराया गया था।
Published on:
15 May 2018 12:16 pm
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