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 इतनी बड़ी नाव कि, राजा अपने हाथी-घोड़े के साथ दरिया पार कर जाते!

 जिले में काठ की नाव का इतिहास लगभग 250 वर्ष पुराना है।

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Akansha Singh

Jun 25, 2016

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फर्रुखाबाद।
जिले में काठ की नाव का इतिहास लगभग 250 वर्ष पुराना है। नोगमा कैंट निवासी धनीराम शर्मा बताते हैं कि, पहले तो इतनी बड़ी नाव बनाई जाती थी की उन नावों पर राजा लोग अपने हाथी, घोड़े के साथ दरिया पार कर जाते थे। लगभग 50 सालों से टीन चादर लगाकर नाव बनने लगी और गंगा नदी दरिया में पानी कम हो जाने से और हर नदी पर पुल बिजली बनाने बाले कारखाने खुलने से नावों की बिक्री कम हो गई। यदि बाढ़ आ जाती है तो दो चार नाव बिक जाती है। यहां की बनी हुई नाव दिल्ली, बरेली, पीलीभीत, दातागंज, दूर के इलाको में जाती है। इस काठ की नाव बनाने में कील, जूट, लकड़ी की आवश्यकता होती है। यह नाव खराब होने पर सही करने में परेशानी होती है। लेकिन टीन और लकड़ी की बनी नाव में कोई खराबी होती है तो उसे सही किया जा सकता है।

वहीं उन्होंने कहा कि, आज इक्सवी सदी चल रही है। मोटर का जमाना हो गया है। काठ की छोटी नाव की कीमत लगभग 40 हजार रुपए लगता है। जबकि टीन की नाव सस्ते दामो में मिल जाती हैं। यह के कारीगर अन्य जिले के लोगों ने बताया कि, बाढ़ के समय ही नावों की बिक्री अधिक होती है। काठ की नाव केवल गहरे पानी में ही चलाई जा सकती है।