Sawan: सावन में जरूर करें शिव जी का ये चमत्कारी पाठ, धन, विवाह के बनेंगे योग और प्रेम की होगी वृद्धि

Sawan: सावन में जरूर करें शिव जी का ये चमत्कारी पाठ, धन, विवाह के बनेंगे योग और प्रेम की होगी वृद्धि

Tanvi Sharma | Publish: Jul, 11 2019 05:19:20 PM (IST) त्यौहार

भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए करें ये पाठ

सावन माहीना ( month of sawan ) शिव जी का प्रिय माह माना जाता है। इस माह में शिव जी ( shiv ji ) को प्रसन्न किया जाता है, उनकी पूजा व अभिषेक द्वारा। कई घरों में पूजा-पाठ ( puja path ) बहुत विधि विधान से किया जाता है, लेकिन आजकल के भागदौड़ भरे जीवन में जहां लोगों को अपने नौकरी के लिए निकलना होता है तो उनके लिए पूरे विधि विधान से पूजा करना थोड़ा मुश्किल हो जाता है। परंतु आस्था और श्रद्धा तो सर्वोपरी है। इसलिए पंडित रमाकांत मिश्रा बताते हैं की भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए एक और उपाय है। जी हां, यदि आप सावन माह ( sawan ) में भगावन शिव का अभिषेक नहीं कर पा रहे हैं और उनकी कृपा प्राप्त करनी है तो आप शिव चालिसा पढ़ सकते हैं।

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shiv chalisa in sawan

जी हां, शिव चालीसा ( Shiv Chalisa a ) पढ़ने का महत्व अलग है। शिव चालीसा के माध्यम से आप अपने सारे दु:खों को भुलाकर भगवान शिव की अपार कृपा प्राप्त कर सकते हैं। यही नहीं पडित जी बताते हैं की भगवान शिव की सभी स्तुतियों में शिव चालीसा सबसे श्रेष्ठ और कल्याणकारी मानी गई है। खासतौर पर सावन माह ( Sawan 2019 ), सोमवार और महाशिवरात्रि पर श्री शिव चालीसा का पाठ करने व सुनने से घर में सुख-शांति, धन-वैभव और प्रेम की वृद्धि होती है। साथ ही शिव जी जातक की सभी मनोकामना भी पूरी करते हैं।

।।दोहा।।

श्री गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥

जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥
अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन छार लगाये॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देख नाग मुनि मोहे॥

मैना मातु की ह्वै दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥
नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥

देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥
किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥
तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥
आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥
किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तसु पुरारी॥
दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
वेद नाम महिमा तव गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥

प्रगट उदधि मंथन में ज्वाला। जरे सुरासुर भये विहाला॥
कीन्ह दया तहँ करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥
पूजन रामचंद्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥
सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥

एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भये प्रसन्न दिए इच्छित वर॥
जय जय जय अनंत अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै । भ्रमत रहे मोहि चैन न आवै॥

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। यहि अवसर मोहि आन उबारो॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट से मोहि आन उबारो॥
मातु पिता भ्राता सब कोई। संकट में पूछत नहिं कोई॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु अब संकट भारी॥

धन निर्धन को देत सदाहीं। जो कोई जांचे वो फल पाहीं॥
अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥
शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। नारद शारद शीश नवावैं॥

नमो नमो जय नमो शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥
जो यह पाठ करे मन लाई। ता पार होत है शम्भु सहाई॥
ॠनिया जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥
पुत्र हीन कर इच्छा कोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥

पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे ॥
त्रयोदशी ब्रत करे हमेशा। तन नहीं ताके रहे कलेशा॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥
जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्तवास शिवपुर में पावे॥
कहे अयोध्या आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥

॥दोहा॥
नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥
मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान।
अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥

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