श्रावण माह में पड़ रहे हैं दो शनि प्रदोष व्रत, जानिये इनका असर : Shravan 2020

सावन 2020 का पहला शनिप्रदोष 18 जुलाई तो दूसरा 1 अगस्त को, जानें क्या करें व क्या नहीं...

By: दीपेश तिवारी

Published: 16 Jul 2020, 04:55 PM IST

सनातन धर्म में जीवन में लाभ प्राप्त करने के लिए कई व्रत आदि धार्मिक कार्यों के बारे में बताया गया है। इन्हीं में से एक प्रदोष-व्रत को भी सनातन धर्म में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। मान्यता के अनुसार प्रदोष-व्रत चन्द्रमौलेश्वर भगवान शिव की प्रसन्नता व आशीर्वाद को प्राप्त करने के लिए किया जाता है।

पंडित सुनील शर्मा के अनुसार प्रदोष व्रत में शिवजी जी की उपासना व पूजा की जाती है। हिन्दू धर्म के अनुसार यह व्रत बहुत ही महत्वपूर्ण और लाभकारी है। वहीं यह व्रत हिन्दू कैलेंडर के अनुसार त्रयोदशी के दिन किया जाता है।

सावन में शनिप्रदोष...
इस साल यानि 2020 के श्रावण माह में भगवान शिव की पूजा के साथ ही दो शनि प्रदोष का भी संयोग बन रहा है। इसके तहत पहला 18 जुलाई और दूसरी 1 अगस्त को पड़ रहा है। इसमें पहली श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी 18 जुलाई को है। इस दिन शनिवार होने से यह शनि प्रदोष व्रत है। प्रत्येक प्रदोष व्रत के दिन भगवान शंकर की पूजा की जाती है, लेकिन शनि प्रदोष व्रत के दिन भगवान शिव के साथ-साथ शनिदेव की भी पूजा अर्चना की जाएगी।

शनि से जुड़े दोष होंगे दूर
सावन के पवित्र माह में दोनों प्रदोष पड़ रहे हैं दोनों ही शनिवार को पड़ रहे है। जिसके कारण इसका महत्व और अधिक बढ़ जाता है। अगर आपकी कुंडली में शनि दोष, साढ़े साती, शनि की लघु कल्याणी ढैय्या आदि है तो 18 जुलाई और 1 अगस्त को जरूर पूजन करें। पंडित शर्मा के अनुसार ऐसा करने से शनि संबंधी दोष दूर होते हैं।

शनि प्रदोष व्रत कथा
स्कंद पुराण के अनुसार प्राचीन काल में एक विधवा ब्राह्मणी अपने पुत्र को लेकर भिक्षा लेने जाती और संध्या को लौटती थी। एक दिन जब वह भिक्षा लेकर लौट रही थी तो उसे नदी किनारे एक सुन्दर बालक दिखाई दिया जो विदर्भ देश का राजकुमार धर्मगुप्त था।

शत्रुओं ने उसके पिता को मारकर उसका राज्य हड़प लिया था। उसकी माता की मृत्यु भी अकाल हुई थी। ब्राह्मणी ने उस बालक को अपना लिया और उसका पालन-पोषण किया।

कुछ समय पश्चात ब्राह्मणी दोनों बालकों के साथ देवयोग से देव मंदिर गई। वहां उनकी भेंट ऋषि शाण्डिल्य से हुई। ऋषि शाण्डिल्य ने ब्राह्मणी को बताया कि जो बालक उन्हें मिला है वह विदर्भ देश के राजा का पुत्र है जो युद्ध में मारे गए थे और उनकी माता को ग्राह ने अपना भोजन बना लिया था। ऋषि शाण्डिल्य ने ब्राह्मणी को प्रदोष व्रत करने की सलाह दी। ऋषि आज्ञा से दोनों बालकों ने भी प्रदोष व्रत करना शुरू किया।

एक दिन दोनों बालक वन में घूम रहे थे तभी उन्हें कुछ गंधर्व कन्याएं नजर आई। ब्राह्मण बालक तो घर लौट आया किंतु राजकुमार धर्मगुप्त "अंशुमती" नाम की गंधर्व कन्या से बात करने लगे। गंधर्व कन्या और राजकुमार एक दूसरे पर मोहित हो गए, कन्या ने विवाह करने के लिए राजकुमार को अपने पिता से मिलवाने के लिए बुलाया।

दूसरे दिन जब वह दुबारा गंधर्व कन्या से मिलने आया तो गंधर्व कन्या के पिता ने बताया कि वह विदर्भ देश का राजकुमार है। भगवान शिव की आज्ञा से गंधर्वराज ने अपनी पुत्री का विवाह राजकुमार धर्मगुप्त से कराया।

इसके बाद राजकुमार धर्मगुप्त ने गंधर्व सेना की सहायता से विदर्भ देश पर पुनः आधिपत्य प्राप्त किया।

यह सब ब्राह्मणी और राजकुमार धर्मगुप्त के प्रदोष व्रत करने का फल था। स्कंदपुराण के अनुसार जो भक्त प्रदोषव्रत के दिन शिवपूजा के बाद एक्राग होकर प्रदोष व्रत कथा सुनता या पढ़ता है उसे सौ जन्मों तक कभी दरिद्रता नहीं होती।


प्रदोष व्रत करने की विधि...
: प्रदोष व्रत करने के लिए त्रयोदशी वाले दिन प्रातः सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि से निर्वित हो।
: इस व्रत में व्रती का सफ़ेद कपड़े पहनना शुभ माना जाता है।
: यह व्रत निराहार रखा जाता है।
: सांयकाल के समय शिवालय जाये या फिर घर पर ही पूजास्थान पर बैठे।
: भगवान शंकर का ध्यान करते हुए, व्रत कथा और आरती पढ़नी चाहिए।
: भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें।
: पूजा में शिवजी जी को फल, फूल, धतूरा, बिल्वपत्र और ऋतुफल अर्पित करें।
: प्रदोष व्रत में अपने सामर्थ्य अनुसार किसी ब्राह्मण को भोजन करवाकर दान दक्षिणा देनी चाहिए।
: इस व्रत में भोजन करना निषेध है।
: फिर भी व्रति अपनी यथा शक्तिअनुसार संध्याकाल के पूजन के बाद सात्विक भोजन या फलाहार ले सकता है।

प्रदोष व्रत करने के लाभ...
: शास्त्रों में कहा गया है के इस व्रत को श्रद्धा भाव करने से अतिशीघ्र कार्यसिद्धि होकर अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है।
: इस व्रत को करने से जीवन के सभी कष्ट दूर होते है और सहस्त्र गोदान का पुण्य प्राप्त होता है।
: प्रदोष व्रत को करने से शिवजी जी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
: वैसे तो सभी प्रदोष व्रत फलदायी और शुभ है, पर हर प्रदोष व्रत का वार के हिसाब से अलग फल होता है।

सप्ताह के वार के अनुसार प्रदोष व्रत और उनके लाभ...

1. सोमवार को पड़ने वाले प्रदोष व्रत को सोम प्रदोषम या चंद्र प्रदोषम कहते हैं।
: सोमवार का प्रदोष व्रत मनुष्य की मनोकामना की पूर्ति करता है और उसे निरोगी रखता है।

2. मंगलवार को पड़ने वाले प्रदोष व्रत को भौम प्रदोष कहते हैं।
: मंगलवार के दिन त्रयोदशी का प्रदोष व्रत करने से स्वास्थ लाभ होता है। अगर आप किसी बीमारी से परेशान हैं तो उससे भी छुटकारा मिलता है।

3. बुधवार को पड़ने वाले प्रदोष व्रत को बुध प्रदोष या सौम्यवारा प्रदोष कहते हैं।
: बुधवार को पड़ने वाले प्रदोष व्रत को करने से मनुष्य की इच्छा पूर्ति होती है।

4. बृहस्पतिवार को पड़ने वाले प्रदोष व्रत को गुरु प्रदोषम कहते हैं।
: गुरुवार का प्रदोष व्रत करने से उपासक के शत्रुओं का नाश होता है और उसके जीवन में आने वाली बाधाएं भी दूर होती हैं।

5. शुक्रवार को पड़ने वाले प्रदोष व्रत को शुक्र प्रदोषम कहते हैं।
: शुक्रवार का प्रदोष व्रत सुहागनों के लिए बहुत ही लाभकारी होता है। इस दिन व्रत और पूजा करने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है और दांपत्य जीवन सदैव के लिए खुशहाल और सुखमय हो जाता है।

6. शनिवार को पड़ने वाले प्रदोष व्रत को शनि प्रदोषम कहते हैं।
: शनिवार का प्रदोष व्रत संतान प्राप्ति के इच्छुक भक्तों के लिए फलदायक है। अगर आप संतान प्राप्ति की कामना कर रहे हैं तो यह व्रत जरूर करें।

7. रविवार को पड़ने वाले प्रदोष व्रत को भानु प्रदोष या रवि प्रदोष कहते हैं।
: रविवार का प्रदोष व्रत व्यक्ति को अच्छा स्वास्थ्य और लंबी आयु प्रदान करता है।

इस वर्ष 2020 में अब आने वाले प्रदोष व्रत कब कब...

माह और पक्ष : दिनांक : दिन
श्रावण कृष्ण पक्ष : 18 जुलाई 2020 : शनिवार
श्रावण शुक्ल पक्ष : 1 अगस्त 2020 : शनिवार
भाद्रपद कृष्ण पक्ष : 16 अगस्त 2020 : रविवार
भाद्रपद शुक्ल पक्ष : 30 अगस्त 2020 : रविवार
शुद्ध आश्विन कृष्ण पक्ष : 15 सितम्बर 2020 : मंगलवार
अधिक आश्विन शुक्ल पक्ष : 29 सितम्बर 2020 : मंगलवार
अधिक आश्विन कृष्ण पक्ष : 14 अक्टूबर 2020 : बुधवार
शुद्ध आश्विन शुक्ल पक्ष : 28 अक्टूबर 2020 : बुधवार

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