
priest in holi fire
तीन लोक से न्यारी मथुरा नगरी के दो गावों में होली का प्रमुख आकर्षण होली की आग से पंडों का निकलना है। यह होली इतनी चमत्कारिक होती है कि इसे देखकर दर्शक दांतों तले उंगली दबाने लगते हैं। हकीकत यह है कि यह होली भक्त का भगवान के प्रति समर्पण का इम्तहान है। मथुरा के दो गावों जटवारी और फालेन में भगवान विष्णु की कृपा से इन पंडों के लिए होली की आग बर्फ सी शीतल बन जाती है। सामान्यतया होली जलने का मुहूर्त पंडित लोग बताते हैं, लेकिन इन गावों में मुहूर्त पहले से नही बताया जाता एवं पूजन के समय ही पंडा होली में आग लगाने के लिए कहता है।
छाता तहसील में स्थित दोनों गांव जटवारी एवं फालैन गांव के बीच की दूरी 15 किलोमीटर से भी कम है। दोनो ही गावों में राष्ट्रीय राजमार्ग दो पर मथुरा एवं दिल्ली के बीच छाता होकर शेरगढ़ जाना होगा। वहां से इन दोनों गावों में पहुंचा जा सकता है। दूसरा रास्ता कोसी होकर इन गांवो को जाता है। छाता होकर जाने में जहां जटवारी गांव पहले पड़ेगा वहीं कोसी होकर फालैन गांव पड़ेगा।
बताया जाता है कि इन गावों में प्रह्लाद कुंड में डुबकी लगाते ही होली से निकलने वाले पण्डों में भक्त प्रहलाद की तरह भगवान विष्णु की कृपा की वर्षा होने लगती है और इन पंडों को होली की आग बर्फ की तरह शीतल लगने लगती है। छाता तहसील के दो गांवों फालैन और जटवारी अपनी अनूठी होली के कारण मशहूर हैं यहां पर जिस प्रकार होली की आग से होकर अलग अलग समय में दो पंडे निकलते हैं वह भगवत कृपा का जीवन्त नमूना है।
दोनों ही गांवों में होली मनाने का अलग अलग तरीका है। दोनों ही गांवों की होली की आग से पंडे के निकलने की परंपरा डेढ़ शताब्दी से अधिक पुरानी है। दोनों ही गांवों में वसंत पंचमी को पंचायत कर यह निर्धारण किया जाता है कि इस बार होली से होकर कौन पंडा निकलेगा। जो युवक स्वत: निकलने के लिए कहता है वह मंदिर में रखी माला को उठा लेता है। दोनों ही गावों में प्रहलाद का मंदिर हैं जहां पर पंडे आराधना करते है तथा होली की आग से निकलने के पहले पास के प्रहलाद कुंड में स्नान करने के बाद ही होली की आग से निकलते हैं।
दोनों ही गांव के पंडे माला लेने के बाद मंदिर में हर समय पूजा आराधना करते हैं। मंदिर में ही फर्श पर सोते हैं। इस बार फालैन गांव में बाबूलाल पंडा और जटवारी गांव में सुनील पंडा जलती होली से एक मार्च को निकलेंगे। रामहेत के अनुसार होलाष्टक लगने के बाद दोनो ही गांव के पंडे अन्न का परित्याग कर केवल दूध और फल ही ग्रहण करते हैं।
होली की शाम से पंडा प्रहलाद मंदिर के सामने हवन करने लगता है तथा पास रखे दीपक की लौ के ऊपर अपना हाथ रखकर उसकी गर्मी का अंदाजा करता है। जब उसे यह लौ शीतल महसूस होने लगती है तो उसे बहुत अधिक ठंड लगने लगती है। इसी समय वह होली में आग लगाने का निर्देश देकर स्वयं पास के प्रहलाद कुंड में स्नान के लिए जाता है तथा उसकी बहन उसके होली तक आने के मार्ग पर करूए से पानी डालती है और फिर पलक झपकते ही यह पंडा होली की गगनचुम्बी लपटों से होकर निकल जाता है। सामान्यतया होली की लपटों से निकलने वाले पण्डे अविवाहित ही होते हैं। मथुरा के फालेन गांव में इस दिन मेला सा लग जाता है।
गांव के स्थानीय निवासियों के अनुसार पंडा गांव के मंदिर में पूजा पाठ कर रहा है तथा उसने अन्न का परित्याग कर दिया है और वह केवल दूध और फल ही ले रहा है। उन्होंने बताया धधकती आग से निकलने के बावजूद पंडे का कुछ नही बिगड़ता है। लेकिन यदि पंडे के होली की आग से निकलने के पूर्व या इसके बाद कोई चरणस्पर्श कर लेता है तो उस स्थान पर जलने का निशान बन जाता है। उनका कहना था कि इसी कारण गांव के लोग लाठी लेकर पण्डे को आग से निकलने के पहले और बाद में घेर लेते हैं। उन्होंने बताया कि फालेन की होली में आग लगने का समय आखिरी वक्त पर पंडा ही निर्धारित करता है। कुल मिलाकर इन दोनो ही गांव की होली किसी दैवीय चमत्कार से कम नही है।
Published on:
01 Mar 2018 12:57 pm
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