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धनतेरस के दिन क्यों की जाती है रावण के भाई की पूजा, आखिर क्यों है ये मान्यता

धनतेरस के दिन क्यों की जाती है रावण के भाई की पूजा, आखिर क्यों है ये मान्यता

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kuber

धनतेरस के दिन धन के देवता कुबेर की पूजा की जाती है लेकिन क्या आपको पता है की कुबरे पूर्वजन्म में चोर थे। जी हां कुबेर जी को लेकर एक जनश्रुति प्रचलित है, जिसके अनुसार बताया जाता है की वे चोर थे। और कुबेर जी और कहीं नहीं बल्कि देव मंदिरों में चोरी करते थे। चोरी की आदत के कारण वे एक दिन शिव मंदिर में चोरी करने गए क्योंकि वहां बहुत सा धऩ-खजाना रहता था। मंदिर में अंधेरा होने के कारण कुबेर को वहां खजाना खोजने में दिक्कत हो रही थी तभी उन्होंने वहां एक दीपक जलाया लेकिन हवा बहुत तेज थी जिसके कारण वह दिपक बार बार बुझ रहा था। कुबेर ने फिर दीपक जलाया, वह फिर से बुझ गया। जब यह बार-बार हुआ तो भोलेनाथ को लगा के कुबेर द्वारा भक्ति का एक तरीका है और उन्होनें कुबेर को प्रसन्न होकर अगले जन्म में धनपति होने का आशीर्वाद दे दिया।

रावण के सौतेले भाई थे कुबेर

रामायण के अनुसार महर्षि पुलस्त्य ब्रह्माजी के मानस पुत्र थे। उनका विवाह राजा तृणबिंदु की पुत्री से हुआ था। महर्षि पुलस्त्य के पुत्र का नाम विश्रवा था। वह भी अपने पिता के समान सत्यवादी व जितेंद्रीय था। विश्रवा के इन गुणों को देखते हुए महामुनि भरद्वाज ने अपनी कन्या इड़विड़ा का विवाह उनके साथ कर दिया। महर्षि विश्रवा के पुत्र का नाम वैश्रवण रखा गया। वैश्रवण का ही एक नाम कुबेर है। महर्षि विश्रवा की एक अन्य पत्नी का नाम कैकसी था। वह राक्षसकुल की थी। कैकसी के गर्भ से ही रावण, कुंभकर्ण व विभीषण का जन्म हुआ था। इस प्रकार रावण कुबेर का सौतेला भाई हुआ।

इसलिए की जाती है पूजा

धनतेरस, कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को मनाया जाता है। माना जाता है इसी दिन समुद्र मंथन के दौरान, अमृत का कलश लेकर धन्वन्तरी प्रकट हुए थे। स्वास्थ्य रक्षा और आरोग्य के लिए इस दिन धन्वंतरी देव की उपासना की जाती है। इस दिन को कुबेर का दिन भी माना जाता है और धन सम्पन्नता के लिए कुबेर की पूजा की जाती है। धन के देवता कुबेर जी को भगवान शिव का अधिपति माना जाता है। वहीं मां लक्ष्‍मी के साथ भगवान गणेश भी मुहूर्त रूप में विद्यमान रहते हैं। इसीलिए लक्ष्‍मी-गणेश का पूजन साथ में किया जाता है।