एक ओर जहां दूषित मानसिकता के चलते कासगंज जैसे दंगे हो रहे हैं वहीं दूसरी ओर एक खुदा का नेक बंदा समाज में सद्भावना के रंग बांट बिखेर रहा है। प्राचीन होली की परंपरा को जीवित रखने के साथ ही गंगा-जमुनी सभ्यता को भी बनाए हुए हैं। तहसील क्षेत्र के गांव धीरपुरा निवासी मुन्ने खां उर्फ मुन्नालाल की गीतों की होली के बिना रंग भी बेरंग नजर आते हैं। हर वर्ष धीरपुरा में दौज के दिन होली का आयोजन किया जाता है। जिसमें शामिल होने के लिए करीब दो दर्जन आस-पास गांवों के लोगों शामिल होने आते हैं। होली के गीत, रसिया, ढोला और लावनी गाकर एक दूसरे को होली की बधाई देते हैं।