
धीरपुरा गांव में बना राजा का महल
पत्रिका न्यूज नेटवर्क
फिरोजाबाद। देश की आजादी के लिए वैसे तो उस समय प्रत्येक व्यक्ति ने अपना योगदान दिया था लेकिन कुछ लोगों ने इस आजादी की जंग में अंग्रेजों को लोहे के चने चबा दिए थे। कुछ ऐसी ही कहानी है फिरोजाबाद के दो जाबांज भाइयों की जिन्होंने देश की आजादी के लिए अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था।
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धीरपुरा गांव के थे जाबांज भाई
थाना नगला सिंघी क्षेत्र के गांव धीरपुरा के क्रांतिकारियों का नाम भले ही इतिहास के पन्नों में दर्ज न हुआ हो लेकिन पूरा गांव क्रांतिकारियों की गाथा सुनाता है। धीरपुरा रियासत के क्रांतिकारी भाई महाराज सिंह यादव एवं सोबरन सिंह की वीरता की कहानी याद की जाती है। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू होने के बाद दोनों भाईयों ने आगरा किले पर झंडा फहराने की योजना बनाई। इसके बाद दोनों भाई रात के अंधेरे का फायदा लेकर आगरा यमुना किनारे तक पहुंच गए और सैनिकों से बचते हुए आगरा के किले में प्रवेश कर गए थे।
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किले पर फहराया तिरंगा
ग्रामीणों ने बताया कि दोनों भाइयों ने दिन निकलते ही किले पर अंग्रेजी सरकार का झंडा उतारकर तिरंगा फहरा दिया था। तिरंगा लहराते ही अंग्रेजी सैनिक इनकी तरफ दौड़े तथा फायरिंग शुरू कर दी। महाराज सिंह के पैर में गोली लगी, लेकिन इसके बाद भी वह कूदकर यमुना के सहारे बाहर निकल आए। वहां से इनके भाई सोबरन सिंह पीठ पर लादकर गांव पहुंचे। अंग्रेजी सेना इनकी तलाश में कई दिन तक जुटी रही। देश के आजाद होने के बाद गांव के क्रांतिकारियों को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की पेंशन दी गई।
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जूतों की पहना दी थी माला
गांव के ही धूरीलाल नामक क्रांतिकारी ने क्वीन विक्टोरिया की प्रतिमा पर जूतों की माला पहना दी थी। इसके बाद उन्होंने भागने की कोशिश की थी लेकिन अंग्रेजी सेना ने उन्हें पकड़ लिया और उसके बाद उन्हें कई साल तक जेल काटनी पड़ी थी। धीरपुरा रियासत अंग्रेजी सरकार से पहले रियासत हुआ करती थी, जिसके राजा गोवर्धन सिंह थे। उनके रियासत के बेड़े में अष्ट धातु की एक नकटिया तोप थी। महाराजा के वंशज 102 साल के राजेंद्र सिंह बताते हैं कि गांव के बाहर से गुजर रही अंंग्रेजी सेना की टुकड़ी ने गांव के बाहर खिन्नी के बाग में डेरा डाल लिया था। गांव में खबर फैली कि रात में क्रांतिकारियों की धरपकड़ होगी। इसकी जानकारी होने पर उनके दादा गोवर्धन सिंह ने नकटिया तोप से सेना पर गोले दागे, जिससे खलबली मच गई। तोप से हमले के बाद बड़ी संख्या में सेना पहुंच गई और क्रांतिकारी गांव छोड़कर भाग गए। तोप को बचाने के लिए गांव के कुएं में डाल दिया, ताकि वह अंग्रेजी सेना के हाथ न लगने पाए। कहते हैं कि आज भी तोप इसी कुएं में पड़ी है।
गांव में सुनाई जाती थी क्रांतिकारियों की गाथाएं :
75 वर्षीय नत्थी खां बताते हैं कि उनका जन्म तो आजाद भारत में हुआ था, लेकिन बचपन में गांव केे क्रांतिकारियों की कहानियां सुनाई जाती थीं। स्वतंत्रता आंदोलन में धीरपुरा का नाम दर्ज है और यह बात हम सबके लिए गर्व का अहसास कराती है। पूर्वजों से उन्होंने भी कहानियां सुनी हैं।
Published on:
14 Aug 2021 05:50 pm
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