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गाजियाबाद एक स्मार्ट सिटी, अभी यह ख्वाब ही रहेगा

स्मार्ट सिटी योजना के तहत पहले बीस शहरों में उत्तर प्रदेश के किसी भी शहर का नाम शामिल नहीं हुआ है।  गाजियाबाद की जनता में भी खासी निराशा है।

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Sharad Mishra

Jan 28, 2016

गाजियाबाद
। स्मार्ट सिटी योजना के तहत पहले बीस शहरों की सूची में उत्तर प्रदेश के किसी भी शहर का नाम शामिल नहीं हुआ है। सूची से गाजियाबाद का नाम बाहर रहने से जनता में खासी निराशा है। लोगों की माने तो इसके लिए शासन, प्रशासन और ऑथिरिटी तीनों जिम्मेदार हैं। काम को लेकर निकम्मेपन की वजह से लोगों ने अपना फीडबैक दिया है। जिसके आधार पर गाजियाबाद को लिस्ट में शामिल नहीं किया गया है। वजह कुछ भी हो लेकिन गाजियाबाद के लिए स्मार्ट सिटी बनना अभी भी किसी सपने के जैसा है। गाजियाबाद का नाम 87 वें नम्बर पर आया है। गाजियाबाद सौ शहरों की सूची में तो शामिल है। जिसे स्मार्ट सिटी बनाया जाएगा। लेकिन पहले बीस शहरों में नाम नहीं आना वास्तव में निराशाजनक है।



स्मार्ट सिटी के लिए गाजियाबाद ने की थी मेहनत


गाजियाबाद को स्मार्ट सिटी की लिस्ट में शामिल करने के लिए यहां के सिटीजनों ने काफी मेहनत की थी। आरडब्लूए फेडरेशन ने एनसीआर प्लानिंग बोर्ड के चैयरमैन कुश वर्मा के साथ मिलकर बैठक की थी। इसके लिए बकायदा प्लानिंग और प्रेजेटेंशन आरडब्लूए और अन्य सिटीजनों की तरफ से दी गई। बकायदा इसके लिए लेटर लिखवाए गए। जिस पर आगे तक मुहर लगी। लेकिन शहर का विकास करने वाले ऑथिरटियों की नाकामी की वजह से लोगों की मंशा पर पानी फिर गया।


क्या कहना है आरडब्लूए का


फेडरेशन के चैयरमैन कर्नल तेजेन्द्र पाल त्यागी ने बताया कि पहली लिस्ट में उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद का नाम ना शामिल होने के लिए सबसे बड़ी वजह नगर निगम है। स्मार्ट सिटी के लिए गाजियाबाद के सिटिजनों की भागीदारी में कोई कमीं नहीं रही। नगर निगम अब एक दम चुप सा हो गया। निगम में 3500 सफाई कर्मचारी है। लेकिन अभी भी शहर में हर 15 कदम पर कूड़ा पड़ा हुआ रहता है। इसके लिए अफसर जिम्मेदार है। लिस्ट फाइनल होने से दो दिन पहले निगम हरकत में आया। स्मार्ट सिटी की वोटिंग में सिटीजन का एक बड़ा हाथ रहा है।


ग्रीनमैन भी है काफी निराश


गाजियाबाद के ग्रीन मैन विजयपाल बघेल ने बताया कि गाजियाबाद लिस्ट में शामिल नहीं हुआ। इससे काफी

निराशा हुई है। लेकिन यहां के विकास को संभालने वाला आरटीओ विभाग भी इसके लिए जिम्मेदार है। आरटीओ विभाग ने पुराने ऑटो को बंद नहीं किया। पहले कहा, लाईसेंस जारी नहीं होगे। बाद में रीजनल पॉलिसी का बहाना बनाकर परमिट दे दिए। इसके अलावा ऑटो और शहर में चलने वाली यातायात सेवाओं के लिए कोई मैनुअल भी नहीं है। इन सबका असर भी पड़ता है।


राजनेताओं की राय

भाजपा के महामंत्री मंयक गोयल ने बताया कि इसके लिए शासन ही जिम्मेदार है। क्योकि उत्तर प्रदेश सरकार के कार्यकाल में अफसरों में काम को लेकर कोई खौफ ही नहीं है। अगर सरकार सख्त हो तो अफसर कैसे काम नहीं करेंगे। अगर काम होगा तो वो नजर भी आएगा। आज तक शहर की ट्रैफिक व्यवस्था नहीं बदली। जीडीए, बीएसएनएल में घोटालों का अम्बार लगा हुआ है। पासपोर्ट विभाग की बात ही करें तो उनके पास वहां पर लोगों के लिए सुविधाएं आसान हुई हैं। वहां के अफसरों के पास में कोई जादू की झड़ी नहीं है। बावजूद इसके अब वहां पर कोई पैडेंसी भी नहीं है। लोग आसानी से अपना काम करवा लेते है।

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