
Bhagat Singh : दिल्ली से सटे गाजियाबाद एक सड़क का नाम दुर्गा भाभी मार्ग और पार्क के नाम के अलावा दुर्गा भाभी चौक भी बना हुआ है। नई पीढ़ी को दुर्गा भाभी (Durga Bhabhi) के बारे में भले ही कोई जानकारी ना हो। लेकिन, पुराने लोग अभी तक भी दुर्गा भाभी को नहीं भूल पाए हैं। क्योंकि दुर्गा भाभी वह इंसान थीं, जिन्होंने मुसीबत के समय शहीद भगत सिंह की बेहद मदद की थी। इस दौरान दुर्गा भाभी का सफर भी कम कठिनाइयों से भरा हुआ नहीं रहा। हर मोड़ पर उन्होंने हर तरह की चुनौती को स्वीकार किया। यहां तक कि एक बार उन्होंने शहीद भगत सिंह की पत्नी बनकर पुलिस से बचाया था। उन्हीं को लेकर भगत सिंह और सुखदेव के बीच दरार पैदा होने का भी दावा किया जाता है।
दुर्गा भाभी का जन्म 7 अक्टूबर 1907 में पंडित बांके बिहारी के घर हुआ था। दुर्गा भाभी के पिता इलाहाबाद कलेक्ट्रेट में काम करते थे। उनका छोटी सी आयु में ही विवाह लाहौर के भगवती चरण वोहरा के साथ हुआ था। जिसके बाद दुर्गा भाभी के नाम के आगे वोहरा जुड़ गया था। दुर्गा भाभी के ससुर शिवचरण जी रेलवे में उच्च पद पर तैनात थे। दुर्गा भाभी के पति भगवती चरण वोहरा राय साहब के पुत्र होने के बावजूद भी अंग्रेजों को देश से भगाना चाहते थे। 1920 में उनके पिता की मृत्यु हो गई, जिसके बाद घर की जिम्मेदारी उनके कांधों पर आ गई। उसके बावजूद भी वह पूरी तरह से क्रांतिकारी हो गए। इतना ही नहीं अंग्रेजों के अत्याचार सुन-सुनकर दुर्गा भाभी भी अंग्रेजों की हरकतों से बेहद आहत रहती थीं। उन्होंने भी अपने पति का पूरा सहयोग करना शुरू कर दिया।
क्रांतिकारियों को लाने ले जाने का कार्य करती थीं दुर्गा भाभी
मार्च 1926 में भगवती चरण वोहरा भगत सिंह के संपर्क में आए और भगत सिंह के साथ मिलकर संयुक्त रूप से नौजवान भारत सभा तैयार की। इस नौजवान भारत सभा की स्थापना उन्होंने रामचंद्र कपूर के साथ मिलकर की। अंग्रेजों से मुकाबला करने के लिए हथियारों की आवश्यकता पड़ने पर दुर्गा भाभी का कार्य सभी साथी क्रांतिकारियों के लिए राजस्थान से लाना और ले जाने का था। बताया जाता है कि चंद्रशेखर आजाद ने अंग्रेजों से लड़ते वक्त खुद को गोली मारने के लिए किया था। यह प्रस्ताव दुर्गा भाभी ने ही चंद्रशेखर को दिया था। दुर्गा भाभी क्रांतिकारियों का इतना साथ देती थी कि एक बार उन्होंने भगत सिंह को पत्नी बनकर पुलिस से बचाया था। हालांकि इस दौरान इस बात को लेकर भगत सिंह और उनके साथियों सुखदेव ने तनाव रहने लगा और आपस में दरार भी पैदा हो गई। हालांकि इस बात की पुष्टि किसी ने नहीं की थी। लेकिन, इसका कुछ खुलासा उस वक्त हुआ, जब वरिष्ठ पत्रकार और लेखक कुलदीप नैयर ने भगत सिंह के जीवन पर अध्ययन शुरू किया।
सुखदेव और भगत सिंह के बीच मतभेद
उन्होंने अपनी अंतिम पुस्तक भगत सिंह पर ही लिखी थी। जिसका नाम विदाउट फीयर इन लाइफ एंड ट्रायल ऑफ भगत सिंह रखा था। इस पुस्तक में इन सब तमाम बातों का जिक्र किया गया। इस पुस्तक में यहां तक भी लिखा गया कि जब दुर्गा भाभी और भगत सिंह के बीच घनिष्ठ संबंध थे। इस बात को लेकर सुखदेव और भगत सिंह के बीच अनबन शुरू हो गई। इतना ही नहीं कुलदीप नैयर की किताब में लिखा गया है कि सुखदेव ने साफ शब्दों में भगत सिंह से कहा था कि तुम क्रांतिकारी नहीं हो सकते, क्योंकि तुम एक महिला के कारण भटक चुके हो। यह सब बातें कुलदीप नैयर की किताब में लिखी गई थीं। लेकिन, किसी तरह का कोई ठोस सुबूत नहीं मिल पाया और यह समीक्षा दोबारा से 14 जून 2013 को प्रकाशित हुई।
इस तरह अंग्रेजों और पुलिस से शहीद भगत सिंह को बचाया था दुर्गा भाभी ने
भगत सिंह ने जिस वक्त अपने क्रांतिकारी साथी राजगुरु के साथ मिलकर 17 दिसंबर 1927 में लाहौर में अंग्रेज पुलिस के अफसर सांडर्स की हत्या की और उसके बाद वह वहां से फरार हो गए। उधर पंजाब पुलिस उनकी गिरफ्तारी के लिए लगातार जगह-जगह दबिश देने लगी। इस दौरान भगत सिंह के साथियों ने यह निर्णय लिया कि भगत सिंह को बचाने के लिए दुर्गा भाभी का सहयोग लिया जाए और दुर्गा भाभी को उनकी पत्नी बनाया जाए।इसकी मंजूरी दुर्गा भाभी ने भी दे दी। जिसके बाद दुर्गा भाभी नियत स्थान पर पहुंची। वहां पर भगत सिंह मौजूद थे तब उनकी गोद में उनका 3 साल का 1 पुत्र सब्यसाची भी था। बहराल जहां एक तरफ पुलिस भगत सिंह के पीछे लगी हुई थी। वहीं दुर्गा भाभी भगत सिंह अपना भेस बदलते हुए एंग्लो इंडियन लुक में लाहौर से निकले थे और पुलिस से बचने में कामयाब रहे। इसमें सबसे बड़ा योगदान दुर्गा भाभी का ही रहा। हालांकि कुछ जगह उन्हें रोका भी गया।
1970 के बाद गाजियाबाद आकर रहने लगी थीं दुर्गा भाभी
23 मार्च 1931 में राजगुरु और सुखदेव के साथ भगत सिंह को भी फांसी दे दी गई। उसके बाद उनका संगठन बिखर गया और दुर्गा भाभी भी अपने आप को अलग-थलग मानते हुए 1940 में लखनऊ कैंट इलाके में रहने लगीं।जहां पर उन्होंने एक स्कूल खोला वह स्कूल उन्होंने काफी समय तक चलाया यानी दुर्गा भाभी 1970 तक लखनऊ में ही मौजूद रही। फिर उन्होंने अपने परिवार के कुछ सदस्यों के साथ गाजियाबाद में अपना स्थान बना लिया।गाजियाबाद में भी दुर्गा भाभी ने अपनी अलग पहचान बनाई और तमाम पुराने लोग दुर्गा भाभी की जमकर सराहना करने लगे। इतना ही नहीं दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री मदन लाल खुराना भी 1995 में दुर्गा भाभी से मिलने गाजियाबाद पहुंचे थे। उधर दुर्गा भाभी की उम्र लगातार बढ़ रही थी और उनकी तबीयत नासाज रहने लगी। आखिरकार 1999 में दुर्गा भाभी का गाजियाबाद में निधन हो गया। गाजियाबाद वासियों ने उनकी याद ताजा रखने के लिए राजनगर स्थित घर के पास ही दुर्गा भाभी मार्ग, राजनगर में ही एक पार्क और उस इलाके में एक चौक का नाम भी दुर्गा भाभी रखा। दुर्गा भाभी की मृत्यु के बाद उनका परिवार कनाडा चला गया, लेकिन उनकी यादें अभी भी गाजियाबाद के लोगों के मन में बसी हुई हैं।
Published on:
23 Mar 2022 04:48 pm
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