
‘थूक जिहाद’ पर कानून बनाने की मांग फोटो सोर्स : Social Media X
UP Politics Thook Jihad: उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर एक नए मुद्दे ने गर्माहट ला दी है। लोनी विधानसभा क्षेत्र से विधायक नंदकिशोर गुर्जर ने राज्य विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर ‘थूक जिहाद’ और खाद्य पदार्थों में की जा रही अमानवीय और असामाजिक गतिविधियों को रोकने हेतु कठोर कानून बनाने की मांग की है।
विधायक गुर्जर का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कई वीडियो और घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें कुछ दुकानदारों, विक्रेताओं या खाद्य सेवा कर्मियों को जानबूझकर खाने में थूकते या उसे अशुद्ध करते देखा गया है। यह न केवल धार्मिक आस्था पर हमला है, बल्कि सीधे तौर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक सौहार्द के लिए भी गंभीर खतरा है।
विधायक नंदकिशोर गुर्जर ने यह पत्र उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना को प्रेषित किया है। पत्र में उन्होंने लिखा:
“आदरणीय विधानसभा अध्यक्ष महोदय,
हाल के दिनों में सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों में कई ऐसे वीडियो सामने आए हैं, जिनमें कुछ व्यक्तियों द्वारा खाद्य पदार्थों में थूकना, पेशाब मिलाना या अन्य घृणित हरकतें करते हुए देखा गया है। यह देश की संस्कृति, धार्मिक विश्वास और मानवीय मर्यादा का घोर उल्लंघन है।”उन्होंने मांग की कि इस प्रकार की "जिहादी मानसिकता" पर लगाम कसने के लिए एक विशेष दंडात्मक कानून बनाया जाए, जो खाद्य सामग्री के साथ छेड़छाड़ को गंभीर अपराध की श्रेणी में लाकर उसे गैरजमानती और कठोर सजा योग्य बनाए।
‘थूक जिहाद’ एक राजनीतिक और सामाजिक रूप से विवादास्पद शब्द है, जिसका इस्तेमाल कुछ वर्गों द्वारा उन घटनाओं के लिए किया जाता है, जहां जानबूझकर खाद्य पदार्थों को अशुद्ध किया जाता है। इस शब्द का इस्तेमाल राजनीतिक दलों द्वारा धार्मिक भावनाओं को अपील करने और जनता के गुस्से को एक दिशा देने के लिए भी किया जाता रहा है। हालांकि यह शब्द कानूनी रूप से परिभाषित नहीं है और इसके प्रयोग पर कई वर्गों में असहमति भी रही है।
पिछले कुछ वर्षों में यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म्स पर ऐसे वीडियो बड़ी संख्या में वायरल हुए हैं। कई राज्यों में एफआईआर भी दर्ज हुई हैं। कुछ मामलों में गिरफ्तारियां भी की गईं, लेकिन मौजूदा कानूनों के तहत ऐसे अपराधों पर विशेष श्रेणी में कठोर दंड का प्रावधान नहीं है, जिससे कई आरोपी जमानत पर रिहा हो जाते हैं।
विधायक के इस कदम को लेकर सत्ताधारी दल के कुछ नेताओं ने समर्थन जताया है, वहीं विपक्षी दलों ने इसे धार्मिक ध्रुवीकरण और भय फैलाने वाला कदम बताया है।
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता ने कहा कि "ऐसे शब्दों और घटनाओं का प्रयोग करके जनता को गुमराह किया जा रहा है। सरकार को कानून व्यवस्था और खाद्य सुरक्षा की मौजूदा व्यवस्था को सुदृढ़ बनाना चाहिए, न कि एक समुदाय विशेष को निशाना बनाने वाले कानून बनाने चाहिए।"
वहीं भाजपा समर्थकों और कुछ हिन्दू संगठनों ने विधायक के पत्र को "साहसी और जनभावनाओं के अनुरूप" बताया है। उनका कहना है कि ऐसी घटनाओं पर अगर समय रहते रोक नहीं लगी, तो यह जन स्वास्थ्य और धार्मिक विश्वासों को प्रभावित कर सकता है।
कानून विशेषज्ञों का कहना है कि IPC (भारतीय दंड संहिता) की कई धाराएं जैसे धारा 270 (जीवित प्राणी को जानबूझकर बीमारी फैलाने की कोशिश) और धारा 269 (लापरवाही से जीवन को संकट में डालना) के अंतर्गत ऐसी गतिविधियां दंडनीय हैं, लेकिन इनमें अधिकतम सजा एक-दो साल तक की है। इसलिए यदि राज्य सरकार चाहे तो विधानसभा से एक नया कानून पारित कर सकती है, जिसमें सख्त दंड और अभियोजन प्रक्रिया निर्धारित की जा सकती है।
लोनी क्षेत्र के कई लोगों ने विधायक की इस मांग को समर्थन दिया है। स्थानीय निवासी राजेश शर्मा का कहना है कि "हम अपने बच्चों को जब बाहर से कुछ खाने भेजते हैं, तो डर लगता है कि कहीं कुछ मिला न हो। ऐसे मामलों पर कठोर कानून बहुत ज़रूरी है।"वहीं, कुछ अन्य लोग इसे धार्मिक सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश भी मानते हैं।
विधायक नंदकिशोर गुर्जर का यह कदम राजनीतिक रूप से बहुचर्चित तो है ही, सामाजिक बहस को भी जन्म दे रहा है। जहां एक ओर यह सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए जरूरी बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसके भाषाई और धार्मिक पहलुओं पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। इस विषय पर यदि सरकार कानून बनाती है, तो उसे धार्मिक या जातीय पहचान से हटकर, सार्वजनिक सुरक्षा और खाद्य गुणवत्ता के आधार पर बनाना होगा, जिससे सभी वर्गों का भरोसा और न्याय सुनिश्चित हो सके।
Updated on:
14 Jul 2025 07:04 am
Published on:
14 Jul 2025 07:04 am
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