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Bakrid 2018 : हज औऱ कुर्बानी की शुरूआत की पूरी कहानी, हजरत मुहम्मद से नहीं, हजरत इब्राहीम से है कुर्बानी का संबंध

बकरीद से पहले जानें, कैसे हुई हज की शुरुआत, ये है पूरी

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हज औऱ कुर्बानी की शुरूआत की पूरी कहानी, हजरत मुहम्मद से नहीं, हजरत इब्राहीम से है कुर्बानी का संबंध

गाजियाबाद. हज इस्लाम धर्म के 5 प्रमुख स्तंभों में से एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। हर मालदार (आर्थिक रूप से संपन्न) मुसलमान पर जिंदगी में कम से कम एक बार हज करना फर्ज है। हज सऊदी अरब के मक्का शहर में बने काबा शरीफ यानी दुनिया की पहली मस्जिद और उसके आसपास के मकामात (स्थानों) पर किया जाता है। हज इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक साल के आखिरी महीने जिलहिज्जा की 8वीं से 12वीं तारीख तक की जाती है। हज के दौरान हाजी एक निश्चित स्थान पर एहराम यानी बिना सिले सफेद कपड़े धारण करते हैं। इसके बाद काबा शरीफ पहुंचकर वहां दो रकात नमाज आदा करते हैं। हज के दौरान हाजी सफ़ा और मरवा की सई यानी दोनों पहाड़ियों के बीच सात बार दौड़ते हैं। चूंकि हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की पत्नी हाजरा अलैहिस्सलाम इसी जगह पर अपने बच्चे को रखकर दोनों ही पहाड़ियों के बीच पानी के लिए कई बार दौड़ी थी। लिहाजा, उन्हीं की याद में हाजी यहां पर दौड़ लगाते हैं। इसके बाद जम जम का पानी पीते हैं। इसके बाद हाजी अराफात पर्वत के मैदानों में जाते हैं यहां पर हाजी रमी यानी शैतान को पत्थर मारते हैं। दरअसल, जब हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम अपने बेटे हजरत इस्माईल अलैहिस्सलाम को कुर्बानी के लिए ले जा रहे थे तो रास्ते में शैतान ने उन्हें रोकने की कोशिश की थी। तब उन्हेंने शैतान को पत्थर उठाकर मारा था। उन्हीं की याद में उसी स्थान पर बनाए गए पिलर (सांकेतिक शैतान)को पत्थर मारा जाता हैं। उसके बाद सभी हाजी पशु की कुर्बानी की रस्म अदा करते हैं। इसके साब सभी पुरुष हाजी अपने सिर के बाल मुंडवाते हैं। वहीं, जो लोग हज पर नहीं जा पाते हैं। वे मुसलमान ईद उल-अजहा का त्योहार 10,11 और 12 जिलहिज्जा को तीन दिवसीय वैश्विक उत्सव मनाते हैं। इस दौरान मुसलमान दस जिल हिज्जा को ईद की नमाज के बाद जानरों की कुर्बानी देते हैं। जानवरों की कुर्बानी का ये सिलसिला तीन दिन तक चलता है।

इसलिए मुसलमान करते हैं हज | हज यात्रा का इतिहास
दरअसल हज हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम , उनकी पत्नी हाजरा अलैहिस्सलाम और उनके बेटे हजरत इस्माईल अलैहिस्सलाम की ओर से अल्लाह की खुशी के लिए किए गए कार्यों की पुनरावृति जिसे इस्लाम में सुन्नत कहते हैं। यानी हज सुन्नत-ए-इब्राहीमी है। हज क्यों करते हैं, इसे समझने के लिए पैगम्बर हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की जिंदगी से जुड़ी घटना को समझे बिना इसे समझना मुश्किल है। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम तक़रीबन चार हज़ार साल पहले इराक़ (बेबीलोन) में पैदा हुए थे। लेकिन, एकेश्वरवादी होने की वजह से उन्हें वहां के राजा ने जलाने को कोशिश की, लेकिन जब आग में भी हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम नहीं जले तो उन्हें देश से निकाल दिया गया। इस घटना के बाद हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम इराक़ छोड़कर फ़िलस्तीन चले गए और हमेशा के लिए वहीं बस गए। इसी दौरान हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम अपनी बीवी हज़रत सारा के साथ मिस्र गए। वहां के बादशाह ने हज़रत हाजरा को हज़रत इब्राहीम की बीवी हज़रत सारा की ख़िदमत के लिए पेश किया। उस वक़्त तक हज़रत सारा और इब्राहीम के पास कोई औलाद नहीं हुई थी। मिस्र से हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम फिर फ़िलस्तीन वापस लौट आये। हज़रत सारा ने ख़ुद हज़रत हाजरा का निकाह हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के साथ करवा दिया। बुढ़ापे में लग भग 80 की उम्र में हज़रत हाजरा से हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम पैदा हुए। इसके कुछ अर्से के बाद हज़रत सारा से भी हज़रत इस्हाक़ अलैहिस्सलाम पैदा हुए।

ऐसे बसा था मक्का शहर
अल्लाह के आदेश पर हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपनी दूसरी पत्नी हज़रत हाजरा और बेटे हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम को मक्का के चटियल मैदान में छोड़कर चले गए। इसके बाद तप्ती रेगिस्तान में मां-बेटे के पास खाने पीने के लिए कुछ न रहा तो पानी के लिए हजरत इब्राहीम की बीवी हज़रत हाजरा बेचैन होकर क़रीब की सफा और मरवा नामक पहाड़ियों पर दौड़ीं। इसी बीच देखा कि बच्चे के पांव रगड़ने से रेगिस्तान में पानी का चश्मा ज़मज़म फूट पड़ा है। इसी का पानी को पीकर दोनों मां-बेटे वहीं रहने लगे। इसी बीच हज़रत इब्राहीम को ख़्वाब में देखा कि वो अपने इकलौते बेटे (हज़रत इस्माईल) को ज़िबह कर रहे हैं। इसके बाद अल्लाह के इस आदेश की तामील के लिए फौरन फ़िलस्तीन से मक्का मुकर्रमा पहुंच गए। इस घटना को कुरआन शरीफ में इस तरह बयान फरमाया गया है। “फिर जब वो लड़का इब्राहीम के साथ चलने फिरने के क़ाबिल हो गया तो उन्होंने कहा बेटे, मैं ख़्वाब में देखता हूँ कि तुम्हारी कुर्बानी दे रहा हूं। अब सोचकर बताओ तुम्हारी क्या राय है? जब बाप ने बेटे को बताया कि अल्लाह तआला ने मुझे तुम्हारी कुर्बानी करने का आदेश दिया है तो पिता के आज्ञाकारी बेटे इस्माईल अलैहिस्सलाम ने जवाब दिया अब्बा जान! जो कुछ आपको आदेश दिया जा रहा है, उसे कर डालिए। इंशाअल्लाह (अगर ईश्वर ने चाहा) तो आप मुझे सब्र करने वालों में पाएंगे।” (सूरह अस्साफ़फ़ात: 102)

इसलिए मुसलमान देते हैं कुर्बानी
इसके बाद अल्लाह तआला को प्रसन्न करने के लिए हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपने दिल के टुकड़े को मुंह के बल ज़मीन पर लिटा दिया, छुरी तेज़ की, आंखों पर पट्टी बांधी और उस वक़्त तक पूरी ताक़त से छुरी अपने बेटे के गले पर चलाते रहे, जब तक अल्लाह तआला की तरफ से ये आवाज न आ गई। “ऐ इब्राहीम, तूने ख़्वाब सच कर दिखाया। हम नेक लोगों को ऐसा ही बदला देते हैं। (सूरह अस्साफ्फ़ात 105) यानी हज़रत इस्माईल की जगह जन्नत से एक दुंबा भेज दिया गया, जिसकी हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने बेटे की जगह कर्बानी दी। इस वाकिये के बाद से अल्लाह तआला की खुशी के लिए जानवरों की कुर्बानी करना ख़ास इबादत में शुमार हो गया। हजरत इब्राहीम (अ) की इसी दरियादिली की याद में दुनियाभहर के मुसलमान हर साल कुर्बानी देते हैं। इस बड़ी ईश्वरीय परीक्षा में सफल होने के बाद अल्लाह तआला ने हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को आदेश दिया कि दुनिया में मेरी इबादत के लिए एक घर बनाओ। इसके बाद बाप-बेटे ने मिल कर बैतुल्लाह शरीफ (ख़ाना काबा) की तामीर की। इस वाकिये को कुरआन शरीफ में इस तरह बयान किया गया है। “और उस वक़्त के बारे में सोचो जब इब्राहीम काबा की नीव रख रहे थे और इस्माईल भी (उनके साथ शरीक थे और दोनों ये कहते जाते थे कि) ऐ हमारे परवरदिगार, हम से ये ख़िदमत कुबूल फ़रमा ले।” (सूरह अलबक़रह 127)

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किसने क्या था काबा निर्माण
काबे के निर्माण के बाद अल्लाह तआला ने हजरत इब्राहीम को आदेश दिया कि लोगों में हज का एलान कर दो। इसके बाद हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने हज का एेलान किया। बताया जाता है कि अल्लाह हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का एेलान दुनियाभर के सभी लोगों के कानों में गूंज उठी थी। इसके बारे में कुरआन शरीफ में इस तरह फरमाया गया है। “और लोगों में हज का एेलान करो कि वो तुम्हारे पास पैदल आएं और दूर दराज़ के रास्तों से सफर करने वाली ऊँटनियों पर सवार होकर आएं जो (लम्बे सफर से) दुबली हो गई हों।” (सूरह अलहज्ज: 27) यही वजह है कि दुनिया के कोने-कोने से लाखों आज़मीन-ए-हज हज का तराना यानी लब्बैक पढ़ते हुए मक्का पहुंचकर पैगंबर मोहम्मद (स) बताए हुए तरीके़ पर हज की आदएगी करके अपना ताल्लुक हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की अज़ीम कुर्बानियों के साथ जोड़ते हैं। यानी हज के दौरान हर उस काम को दोहराया जाता है, जो जहरत इब्राहीम के परिवार ने किया था।

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कौन है हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम
गौरतलब है कि हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम इस्लाम धर्म के एक लाख 24 हजार पैगंबरों में से एक हैं। इस्लाम धर्म में उनको बड़ी इज्जत की निगाह से देखा जाता है। हजरत अब्राहीम का लकब ख़ुलीलुल्लाह यानी अल्लाह का दोस्त है। कुरआन शरीफ की चौदहवीं सूरत “सूरह इब्राहीम” उन्हीं ही के नाम पर है। कुरआन मजीद में अल्लाह तआला ने कई जगहों पर हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की खूबियां और तारीफ बयान की है। कुरआन करीम में इन्हें “मुस्लिम” भी कहा गया है। कुरआन करीम में ऐसे बहुत सारे पैगंबरों का जिक्र है, जो हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की नस्ल से हैं। हजरत इब्राहीम की नस्ल से हजरत मूसा अलैहिस्सलाम (UPBH), हजरत ईसा अलैहिस्सलाम (UPBH) और हजरत मोहम्मद (स) प्रमुख पैगंबर हुए हैं। यही वजह है कि दुनिया के तीन बड़े धर्म यहूदियत, ईसाइयत और इस्लाम के मानने वाले उन्हें अपना पैगम्बर मानते हैं। इन तीनों धर्मों को इब्राहीमी धर्म कहा जाता है। यही वजह है कि ये तीनों धर्म मूल रूप से एकेश्वरवाद में विश्वास रखते हैं।