
गाजीपुर लोकसभा सीट
एमआर फरीदी साथ में गाजीपूर से आलोक त्रिपाठी...
गाजीपुर . 1962 में संसद पहुंचे विश्वनाथ गहमरी गाय के गोबर से गेहूं छानकर सदन में ले गए। वहां दिखाया कि गाजीपुर की गरीबी और पिछड़ापन किस कैसा है तो पूरी संसद रोयी थी। पहली बार देश ने जाना कि गाजीपुर में कितनी बदहाली है। विश्वनाथ गहमरी के बाद अब तक 13 सांसद लोकसभा में गाजीपुर का प्रतिनिधित्व कर चुके है, लेकिन हालात कमोबेश अब तक उसी तरह हैं। कमजोर खेती और नौकरी के लिये पलायन अब भी गाजीपुर की पहचान है। अफीम फैक्ट्री को छोड़ दें तो उद्योग के नाम पर जिला बिल्कुल जीरो है। कभी यह क्षेत्र गन्ने की खेती पर निर्भर था, लेकिन नंदगंज की एकमात्र चीनी मिल बंद हो जाने के बाद किसानों को इस फसल का सहारा भी नहीं रहा। ले देकर रोजगार के लिये एकमात्र सहारा बड़ौरा कताई मिल पर भी ताला लग चुका है। जमानियां क्षेत्र को छोड़ दें तो जिले में धान की खेती भी बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती। अफीम फैक्ट्री होने के बावजूद पोस्ता की खेती भी अब गाजीपुर में नहीं होती। कुल मिलाकर पूरा जिला औसत खेती और सेना व पुलिस आदि की सरकारी नौकरी के भरोसे है। बेरोजगारी और बदहाली की खाद मिलते ही यहां क्राइम, माफियाराज और गुंडई दरख्त खूब फले-फूले।
वीरों की धरती गाजीपुर ने देश को आजाद कराने में अहम योगदान दिया शहीद शिवपूजन राय समेत कई वीर सपूतों ने आजादी के लिये सबकुछ न्योछावर कर दिया। उम्मीद थी कि स्वतंत्रता के बाद दिन बदलेंगे। चुनाव दर चुनाव बीतते गए लेकिन सिर्फ ऊपरी काम के अलावा यहां कुछ ऐसा नहीं हुआ जिससे लोगों का जीवन स्तर बेहतर होता। यहां सांसद ज्यादातर उस पार्टी से रहे जिनकी केन्द्र में सरकार रही। बावजूद इसके कोई बड़ा कारनामा अंजाम दिया गया हो ऐसा दिखता नहीं। वादों और आश्वासनों में 16 लोकसभा कार्यकाल बीत गए और अब 17वीं लोकसभा के लिये कुछ ही दिन में वोट डाले जाएंगे। इस बार फिजा कुछ बदली-बदली सी है। 2014 की लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव में जिले की चार विधानसभा सीट जीतने वाली बीजेपी के सामने सपा-बसपा का जातिगत समीकरण वाला गठबंधन सामने है तो लड़ाई को त्रिकोणीय बनाने में जुटी कांग्रेस भी बड़ा धमाका करने के मूड में है।
राजनीतिक दल फिजा बदलने में भले माहिर हों, लेकिन जनता का मूड कब बदल जाए कहा नहीं जा सकता। गाजीपुर लोकसभा सीट पर जीत हार के सिलसिले को इससे बड़ी आसानी से समझा जा सकता है। 2014 की लहर वाली राजनीति में भी यहां हार-जीत का अंतर दूसरी सीटों की अपेक्षा काफी कम रहा। 2019 की लड़ाई यहां साफ तौर पर सत्ता के पांच साल बनाम जातीय समीकरण होती दिख रही है। कांग्रेस भी यहां तीसरी ताकत बनने की फिराक में है। वोटरों को लुभाने के लिए सभी दल रणनीति बनाकर काम शुरू कर चुके हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा की लोकसभा का चुनाव जाति धर्म या विकास की नाव पर बैठ बैतरणी पार करेगा या राजनीति कुछ और गुल दिखाएगा।
1984 के बाद कांग्रेस और 91 के बद सीपीआई नहीं खोल पायी खाता
गाजीपुर लोकसभा सीट कभी कम्युनिस्ट पार्टी और कांग्रेस का गढ़ कही जाती थी। कांग्रेस लगातार 1952, 57, 62 और 80 व 84 में जीती। इसके बाद यहां कांग्रेस को जमानत बचा पाना मुश्किल हो गया। वहीं 1952 से लगातार हैट्रिक मार रही कांग्रेस का रथ सीपीआई के सरयू पाण्डेय ने 1967 में रोका और 71 में भी सीपीआई से उनकी वापसी हुई। 77 में जनता पार्टी की लहर में यहां गौरी शंकर राय सांसद बने। इसके अलावा यहां से बीजेपी और समाजवादी पार्टी तीन-तीन बार जीती है। जातीय संरचना ने सपा-बसपा के लिये यहां की राजनीति आसान कर दी है। हिन्दुत्व की सियासत के चलते बीजेपी भी यहां मजबूत है। बसपा यहां खाता नहीं खोल सकी है। 2014 में मोदी लहर पर सवार होकर मनोज सिन्हा यहां से सांसद बन गए।
कब किस पार्टी ने जीती सीट
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2014 में 32 हजार वोटों से हारी थी समाजवादी पार्टी
2014 की मोदी लहर में भी यहां समाजवादी पार्टी और बसपा का प्रदर्शन निराशाजन नहीं रहा था। सपा ने बीजेपी को कड़ी टक्कर दी थी। मनोज सिन्हा 306929 वोट पाकर जीते थे तो सपा की शिवकन्या कुशवाहा 32452 वोट से हारी थीं। उन्हें 274477 जबकि बसपा के कैलाशनाथ सिंह यादव को 241645 वोट मिले थे। सपा-बसपा अपने वोटों को जोड़कर इस बार जीत का दावा कर रहे हैं। सीट बसपा के खाते में है और यहां से पूर्व सांसद अफजाल अंसारी मैदान में आ सकते हैं। फिलहाल वो प्रभारी बनाए जाने के बाद चुनाव की तैयारी में जुटे हैं। 2014 की बीजेपी की जीत में राष्ट्रीय परिवर्तन दल के डीपी यादव के फैक्टर को भी गिना जाता है। मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल के सहयोगी के तौर पर डीपी यादव गाजीपुर से मैदान में थे और उन्होंने 59510 वोट पाए थे। सपा दावा करती है कि अगर वो नहीं लड़े होते तो हमारी जीत पक्की थी। गठबंधन के जातीय समीकरण और जीत के दावे को बीजेपी हल्के में नहीं ले रही। वो गुप्त रणनीति के तहत काम कर रही हे। अब तक बीजेपी ने भी प्रत्याशी का ऐलान नहीं किया है, लेकिन माना जा रहा है कि मनोज सिन्हा फिर यहां से ताल ठोक सकते हैं। कांग्रेस के यहां पर बाबू सिंह कुशवाहा की पत्नी शिवकन्या कुशवाहा को टिकट देने की चर्चा है। शिवकन्या 2014 में सपा से लड़ी थीं। बसपा ने अफजाल अंसारी के नाम पर मुहर नहीं लगायी है लेकिन सूत्रों के मुताबिक उन्हें प्रभारी बनाकर चुनाव की तैयारी का निर्देश है, जिसपर वो काम भी कर रहे हैं।
जातीय समीकरण के जरिये जीत का जुगाड़
गाजीपुर लोकसभा सीट यादव बाहुल्य मानी जाती है। उनके बाद दलित, क्षत्रिय, बिन्द, मुस्लिम और राजभर के साथ अन्य जातियों के वोटर आते हैं।
गाजीपुर लोकसभा के जातीय आंकड़े
नोट- सभी आंकड़े अनुमानित |
गाजीपुर लोकसभा (75) की बुनावट
गाजीपुर जिले में यूं तो सात विधानसभा क्षेत्र हैं पर गाजीपुर लोकसभा में पांच विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं। मुहम्मदाबाद और जहूराबाद बलिया लोकसभा के अर्त्गत आती हैं। इनमें से दो पर बीजेपी, एक पर सहयोगी दल सुभासपा और दो सीटें सपा के खाते में हैं।
| गाजीपुर सदर | सैदपुर | जखनिया | जमानिया | जंगीपुर |
| संगीता बलवंत | सुभाष पासी | त्रिभुअन राम | सुनिता सिंह | विरेन्द्र यादव |
क्या हैं चुनावी मुद्दे
बेरोजगारी, विकास, बन्द चीनी मिल, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क बिजली पानी, किसानों की समस्या आदि गाजीपुर लोकसभा के प्रमुख मुद्दे हैं। इन में सबसे अहम बेरोजगारी है और दूसरा स्वास्थ्य। गाजीपुर में डॉक्टरों की कमी की वजह से यहां का जिला अस्पताल रेफरल अस्पताल के रूप में जाना जाने लगा है। यहां पर डॉक्टरों की कमी दूर करने के लिए तमाम समाजिक संस्था और क्षेत्रिय नेताओं ने इस मुख्य मुद्दा बना रहे है।
गाजीपुर एक नजर में
गाजीपुर भारत के सबसे पुराने जिलों में से एक है। अंग्रेजों ने भी इसे अपना मुख्यालय बनाया था। यहां 1920 में अफीम फैक्ट्री बनवायी थी। ब्रिटिश गवर्नर जनरल लॉर्ड कर्नवालिस की मृत्यु गाजीपुर में ही हुई और उनका मकबरा यहीं स्थित है। कहा जाता है कि कभी गाजीपुर जंगलों से ढका हुआ करता था और यहां कई संतों का वास था। इसका सम्बन्ध रामायण से भी जोड़ा जाता है। ऐसा कहा जाता है कि महर्षि परशुराम के पिता जमदग्नि यहीं रहा करते थे। महर्षि च्यवन ने शिक्षा यहीं से हासिल की ऐसा भी कहा जाता है। वाराणसी, बलिया, मऊ चंदौली और जौनपुर इसके पड़ोसी जिले हैं। बिहार सीमा से सटे गाजीपुर को पूर्वांचल का महत्वपूर्ण जिला माना जाता है।
Updated on:
28 Mar 2019 11:13 pm
Published on:
26 Mar 2019 06:31 pm
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