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International woman Day Special: इस महिला के जज्बे को सलाम, दिव्यांग होकर भी 250 दिव्यांग बच्चों की सवार रही जिंदगी

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है और आज उस जाबाज महिला की दास्ता आपके सामने बयां कर रहें हैं

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savita singh

savita singh

गाजीपुर. अगर मन में कुछ कर दिखाने का जज्बा हो तो सफलता उनके कदम जरूर चूमती है। भले ही वह शारीरिक रूप से मजबूत व स्वस्थ्य न हो। आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है और आज उस जाबाज महिला की दास्ता आपके सामने बयां कर रहें हैं जो शारीरिक रूप से कमजोर जरूर है इसे सच कर दिखाया गाजीपुर जिले की रहने वाली सविता सिंह (Savita Singh) ने, जो राजस्व विभाग में लेखाधिकारी के पद पर कार्यरत हैं। सविता सिंह (Savita Singh) आज दो सौ दिव्यांग बच्चों (Handicapped Children) के लिए मां की तरह हैं। इन्होंने अपना पूरा जीवन इन दिव्यांग बच्चों के लिए समर्पित कर दिया।

सविता सिंह खुद एक दिव्यांग होने के बाद भी 250 दिव्यांग बच्चों को सम्भालती हैं। ये इन बच्चों को उनके पैरों पर खड़ा करने के लिए उन्हें शिक्षा के साथ ही व्यावसायिक शिक्षा भी देती हैं। ताकि ये बड़े होकर किसी पर बोझ बनने के बजाय आत्मनिर्भर बन सके। इनके द्वारा संचालित “समर्पण” संस्था के बैनर तले चलने वाले “राजेश्वरी विकलांग विद्यालय” जो 2007 से चल रहा है, मे 250 से अधिक बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। पढ़ाई के लिए किताब, कॉपी और ड्रेस भी उन्हें मिलता है। सविता सिंह ने दिव्यांगों को ही अपना पूरा परिवार मान लिया है।

सविता सिंह खुद भी दिव्यांग हैं
सविता सिंह का एक पैर बचपन से ही खराब है, ये आम बच्चों की तरह न दौड़ पाती थी और न ही डांस कर पाती थी, लेकिन इन सबके बीच एक ऐसा वाकया हुआ जिसने सविता के जीने का नजरिया ही बदल दिया। सविता सिंह ने इन बच्चों को जन्म तो नहीं दिया, लेकिन जन्म देने वाली से कहीं बढ़कर हैं। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी इन दिव्यांग बच्चों के लिए समर्पित करने का फैसला कर लिया है, अब ये बच्चे ही सविता की जिंदगी हैं। सविता जीती हैं तो बस इन बच्चों के लिए।

सविता ने कैसे संवारी दिव्यांगों की दुनिया
गाजीपुर के शास्त्री नगर इलाके में सविता सिंह इन दिव्यांग बच्चों के लिए एक स्कुल चला रही है ताकि ये बच्चे इस काबिल बन जाये कि उनको किसी दूसरे के सहारे की जरुरत न पड़े। सविता के स्कूल में इस वक्त ढाई सौ बच्चें हैं, जो हर रोज पढ़ाई के लिए उनके स्कूल में आते हैं। बच्चों की पढ़ाई के साथ-साथ सविता उन्हें रोजगार देने वाले कोर्स की ट्रेनिंग भी दिलाती हैं, ताकि पढ़ाई के बाद ये बच्चें खुद का रोजगार कर सकें। सविता के स्कूल में कंप्यूटर के साथ सिलाई कढ़ाई की ट्रेनिंग दी जाती है। सविता जानती हैं कि अगर इन बच्चों को मानसिक रुप से मजबूत बनाना है तो इन्हें शिक्षित करना बेहद जरुरी है, लिहाजा एक स्कूल की जरुरत थी जहां ये बच्चें पढ़ाई कर सकें। लेकिन दुर्भाग्यवश पूर्वांचल के पिछड़े जिलों में शुमार गाजीपुर में दिव्यांगों के लिए कोई भी स्कूल नहीं था।

तब आया स्कूल खोलने का विचार
दिव्यांग बच्चों की इसी जरुरत को सविता ने समझा और एक स्कूल खोलने का निर्णय किया। हालांकि ये इतना आसान नहीं था, पर सविता ने भी हार नहीं मानी | दिव्यांग बच्चों के लिए सविता मुहल्ले मुहल्ले चक्कर लगाती रहीं, लोगों से चंदा मांगा कुछ ने आगे बढ़कर उनका साथ दिया तो कुछ ने दिव्यांगों का नाम सुनते ही मुंह फेर लिया। दिव्यांगों का स्कूल खोलने के लिए सविता ने अपनी जिंदगी भर की गाढ़ी कमाई लगा दी | सालों की मेहनत के बाद आज शास्त्रीनगर मोहल्ले में बच्चों का स्कूल बन पाया।इस स्कूल में बच्चों के रहने के हॉस्टल की भी व्यवस्था है। आज सविता इन बच्चों के साथ बेहद खुश हैं।

2015 में ए आर रहमान से पा चुकी हैं नेशनल अवार्ड
3 दिसंबर 2011 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार और विकलांग कल्याण विभाग के द्वारा स्टेट अवार्ड भी दिया गया। 2013 में अमर उजाला रूपायन अचीवर अवार्ड। 2014 में वाराणसी के तत्कालीन कमिश्नर नितिन रमेश गोकर्ण ने भी सम्मानित किया। साल 2015 सबसे खास रहा क्योंकि इस साल इन्हें नेशनल अवॉर्ड चेन्नई में मिला जो उन्होंने मशहूर संगीतकार एआर रहमान के हाथों “केविन केयर एपीलिटी अवॉर्ड” लिया। साल 2018 में 3 दिसंबर को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के द्वारा भी सम्मानित हुईं।

BY- Alok Tripathi