
ताड़ीघाट रेलवे स्टेशन का इतिहास
पत्रिका न्यूज नेटवर्क
गाजीपुर. गंगा इस पार से गाजीपुर को निहारने वाले लोगों के लिये बीता एक फरवरी ऐतिहासिक पल था जब उन्होंने अपने क्षेत्र में पहली बार इलेक्ट्रिक इंजन देखा। पूरे 141 साल बाद दिलदारनगर ताड़ीघाट रूट पर डीटी पैसेंजर विद्युत इंजन के साथ दौड़ी। ताड़ीघाट स्टेशन भी अपने में एक इतिहास समेटे हुए है। कभी इसका नाम इस स्टेशन की शुरुआत करने वाले अंग्रेज प्रशासक टेरी के नाम पर रखा गया था तो गुलाब की महक की ख्याति सुनकर गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर और स्वामी विवेकानंद जैसी महान हस्तियां भी बिल्कुल वीराने में बने इस स्टेशन तक यात्रा करके आई थीं।
टेरी घाट अब है ताड़ीघाट
ताड़ीघाट रेलवे स्टेशन का नाम पहले ताड़ीघाट नहीं था। इसका नाम टेरीघाट था जो बाद में ताड़ीघाट हो गया। ब्रिटिशकाल में ईस्ट इंडिया कंपनी ने कारोबार को गति देने के मकसद से गंगा के किनारे एक रेलवे स्टेशन बनवाया और उसे पटना जाने वाली मेन लाइन से दिलदारनगर में जोड़ दिया गया। तक इससे कोलकाता से आने वाले सामान यहां उतरते थे। ताड़ीघाट रेलवे लाइन 1880 में बनाई गई थी। 5 अक्टूबर 1880 में अंग्रेज प्रशासक टेरी द्वारा इस स्टेशन का शुभारंभ किया गया था। उसके नाम से इसका नाम टेरी घाट पड़ा था।
गाजीपुर जिले में रेलवे का इतिहास
बताया जाता है कि गाजीपुर जिले में तीन चरणों में रेल सेवाएं शुरू हुईं। इन सारे प्रोजेक्ट के मैनेजर ईस्ट इंडिया रेलवे के कमिशन ऑफिसर मिस्टर टेरी थे। जिले में सबसे पहले 1862 में जमानियां, भदौरा, गहमर प्रोजेक्ट शुरू हुआ। उसके बाद दिलदारनगर, नगसर से ताड़ीघाट प्रोजेक्ट 1880 में पूरा हुआ। 1902 में गाजीपुर, औरहर, बलिया प्रोजेक्ट पूरा हुआ। ताड़ीघाट प्रोजेक्ट को अंग्रेज सरकार गाजीपुर तक ले जाना चाहती थी। इसके लिये 1882 में प्रोवेंशियल रेलवे कमेटी की निगरानी में ताड़ी घाट से गाजीपुर घाट प्रोजेक्ट आगे बढ़ाया गया। 8500 रुपये में इसका टेंडर पास हुआ और 1912 तक इसे बनकर तैयार होना था। पर स्व्तंत्रता आंदोलन अपने शबाब पर होने के चलते इसे रोक दिया गया। दिलदारनगर से ताड़ीघाट के संबंध में डब्लयू इरविन की गाज़ीपुर गजेटियर, गाज़ीपुर, पृष्ठ 34, नेविल के गाज़ीपुर गजेटियर, खंड 29, पृष्ठ 121 और फिशर एंड गिल, गाज़ीपुर गजेटियर, खंड 29, भाग 2, पृष्ठ 58 पर विववरण मिलता है।
135 साल बाद फिर शुरू हुआ प्रोजेक्ट
ईस्ट इंडिया कंपनी ने जिस ताड़ीघाट गाजीपुर रेल प्रोजेक्ट को 1882 में शुरू किया था वह तब तो शुरू होते ही ठप पड़ गया। पर अब 135 साल बाद उसपर फिर काम शुरू हुआ और तेजी से निर्माण कार्य जारी है। तब स्वतंत्रता आंदोलन के चलते अंग्रेजी सरकार इस प्रोजेक्ट को पूरा नहीं कर पाई। उसके बाद यह प्राजेक्ट पटेल आयोग में भी आया। आयोग की संस्तुति के आधार पर पिछली 2014 की सरकार में तत्कालीन रेल राज्यमंत्री और गाजीपुर के सांसद मनोज सिन्हा की कोशिशों से करीब 135 साल बाद प्रोजेक्ट पर काम शुरू हुआ। 2017 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ताड़ीघाट से मऊ रेल रूट और गंगा पर रेल कम रोड ब्रिज का शिलान्यास किया। इसे मऊ रेलवे रूट से जोड़ा जा रहा है। इसके बन जाने से कोलकाता की तरफ से आने वाली गाड़ियां इस वैकल्पिक रूट से भी पूर्वांचल में आ सकेंगी।
गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर को खींच लाई गुलाबों की खुशबू
इतिहासकार ओबैदुर्रहमान बताते हैं कि स्टेशन का निर्माण ब्रिटिश काल में अधिक राजस्व के मकसद से किया गया था। तब जिले में व्यवसाय के एकमात्र साधन गंगा नदी में नाव और स्टीमर के जरिये कारोबार होता था। उन्होंने बताया कि तब गाजीपुर के गुलाब काफी मशहूर थे। एक अंग्रेज ने भी अपनी किताब में लिखा था कि गाजीपुर की की हर गली और चौराहों पर गुलाब की खुशबू मिलती है। यहां के गुलाबों की ख्याति सुनकर गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर टेरी घाट स्टेशन से ही गाजीपुर आए थे। उन्होंने यहां छह माह प्रवास किया और इस दौरान 28 कविताएं लिखीं। गाजीपुर के छह माह के प्रवास का वृत्तांत मानसीे में भी मिलता है।
पावहारी बाबा से मिलने आए स्वामी विवेकानंद
तब गाजीुपर के कुर्थी गांव में पावाहारी बाबा का बड़ा नाम था। दूर-दूर से लोग उनके पास आते थे। उनकी ख्याति सुनकर स्वामी विवेकानंद से भ रहा नहीं गया और वो भी गाजीपुर पहुंचे। स्वामी विवेकानंद भी टेरीघाट स्टेशन से ही गाजीपुर पहुंचे। इक्का गाड़ी से वह कुर्थी गांव स्थित पावाहारी आश्रम गए। हालांकि कई दिनों तक इंतजार के बाद भी पावाहारी बाबा से उनकी मुलाकात नहीं हो पाई। पवहारी बाबा की ख्याति सुनकर उनसे मुलाकात के लिये सी स्टेशन गाजीपुर आए थे। वो इक्का गाड़ी से कुर्थी गांव पहुंचे थे। हालांकि कई दिनों के इंतजार के बाद भी बाबा से उनकी मुलाकात नहीं हो पाई थी।
Published on:
07 Feb 2021 11:08 pm
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