
गोण्डा. जनकवि रामनाथ सिंह अदम गोंडवी की जयंती पर ‘साहित्यिक संतों की स्मृति को नमन’ समारोह सम्पन्न हुआ। सेवानिवृत्त आईएएस गोण्डा के पूर्व जिलाधिकारी राम बहादुर ने दीप प्रज्वलित कर समारोह का उद्घाटन किया। इस अवसर पर साहित्यकारों के सम्मान के साथ ही ‘सहज अनुभूति’ पत्रिका का विमोचन किया गया। कवि सम्मेलन भी हुआ। पूरे कार्यक्रम में स्वर्गीय अदम की यादों को ताजा करने के साथ जिले के महापुरुषों, कवि, शायर के जीवन परिचय पर विस्तार से प्रकाश डाला गया।
आयोजक अनुभूति ट्रस्ट के अध्यक्ष अवधेश सिंह ने अतिथियों का स्वागत किया। संचालन कवि साहित्यकार सुरेश मोकलपुरी, याकूब सिद्दीकी अज्म व डा. उमा सिंह ने किया। कार्यक्रम में पूर्व डीएम राम बहादुर ने अदम गोंडवी की यादों को साझा किया। वर्ष 2011 से कार्यकाल के उनके द्वारा उठाए गए कदमों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि अदम जी के बिना जनवाद की चर्चा ही अधूरी है। उन्होंने न सिर्फ अदम जी के साहस को सलाम ही नहीं किया, बल्कि उनकी कविताओं से मिले संदेशों को ऐतिहासिक बताया।
समारोह में परिचर्चा की अध्यक्षता डाक्टर सूर्यपाल सिंह ने की। सुरेश मोकलपुरी, एसपी मिश्र, सुरेन्द्र बहादुर सिंह झंझट, एसबी सिंह बघेल, सुरेश चन्द्र त्रिपाठी, स्वामी भगवदाचार्य, कुवंर अतुल सिंह अतुल, डा. मंजुल हसन, नजमी कमाल और डा. बद्दरुद्दीन ने अपने अपने विचार रखे।डाक्टर एसबी सिंह, पूर्व मंत्री योगेश प्रताप सिंह, गोंडा विकास मंच के डा. एके सिंह, कांग्रेस नेता तरुण पटेल, अधिवक्ता दीनानाथ त्रिपाठी, सत्यनारायण त्रिपाठी, केके श्रीवास्तव आदि भी मौजूद रहे।
भूख के एहसास को शेरो सुख़न तक ले चलो, या अदब की मुफलिसी को अंजुमन तक ले चलो'
इन पंक्तियों के जरिये आम आदमी का दर्द बयां करती यह लाइनें रामनाथ सिंह अदम गोंडवी की हैं। यह वह नाम है जो आम आदमी की आवाज़ के रूप में दुष्यंत कुमार, नागार्जुन व धूमिल की परंपरा के कवियों में शुमार है। अदम जी के रचना में शोषित, वंचित व उत्पीड़ित व्यक्तियों की व्यथा के साथ ही सामाजिक रहनुमाओं का पोल खोकर बैंड बजा देता है। उनका कहना था कि आजादी के 30 साल बाद देश के शासकों से सवाल पूछा कि- 'सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद है, दिल पे रखके हाथ कहिए देश क्या आजाद है'।
गरीबी और गरीबो के हक के लिए कहा 'छेड़िए इक जंग मिल जुलकर गरीबी के खिलाफ, दोस्त और मजहबी नग्मात को मत छेड़िए।' अदम अपने दूसरे रचना में लिखते हैं कि 'जब सियासत हो गई है पूंजीपतियों की रखैल, आम जनता को बगावत का खुला अधिकार है'। अदम की शायरी का राजनीति से गहरा वास्ता है। वह राजनीति और राजनेताओं को आईना दिखाते हुए कहे कि 'काजू भुने प्लेट में व्हिस्की गिलास में, उतरा है रामराज्य विधायक निवास में'। अदम की तीन रचनाएं गर्म रोटी की महक, समय से मुठभेड़, धरती की सतह पर, इन सभी की वैचारिक भूमि एक ही है। अदम उन कवियों में थे, जो शायरी को एक मकसद की तरह लेते थे। जो कुछ समाज में हो रहा है, वो उन्हें अपनी रचनाओं के माध्यम से आम बोलचाल की भाषा मे अपनी रचना में पिरोते थे।
,चमारों की गली' रचना में उन्होने समाज का एक ऐसा सच सामने लाने की कोशिश किया, जिसने उन्हें एक मुकाम दे दिया। इस संबंध में कवि सुरेश मोकलपुरी कहते हैं कि दुष्यंत और अदम से पहले गजल सिर्फ प्रेमी प्रेमिका के मिलन-बिछुड़न की कहानी मात्र हुआ करती थी, लेकिन अदम गोंडवी ने हिन्दी गजल को जनता की आवाज बना दिया था उसे एक नई आवाज, नई पहचान एवं नई परिभाषा दी। अदम गोंडवी ने भूख, गरीबी, लाचारी, सामंतों के जुल्म ज्यादती की बात कहकर मजलूमों की आवाज को शब्दों में ढालकर गजल की रचना की। उन्हें कभी नही भुलाया जा सकता हैं।
अदम जी का बचपन से ही कवितापाठ की ओर झुकाव था...
जिले के आटा गांव में 22 अक्टूबर 1947 को एक साधारण किसान परिवार में रामनाथ सिंह का जन्म हुआ था। पारिवारिक पृष्ठभूमि कमजोर होने के कारण केवल प्राइमरी तक की शिक्षा पाने के बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी। बचपन से ही कवितापाठ की ओर उनका झुकाव था। वह आसपास के मुशायरों व कवि सम्मेलनों में जाने लगे। उन्होंने तीन रचनाएं लिखीं। वर्ष 2011 में 18 दिसबंर को उनका निधन हो गया। उन्हें 1998 में दुष्यंत कुमार पुरस्कार, नोएडा से नागरिक सम्मान, माटी रत्न पुरस्कार मिल चुका है। 19 नवंबर 2011 को अदम गोंडवी को पद्म विभूषण पुरस्कार देने की तत्कालीन डीएम राम बहादुर की संस्तुति फाइलों में दबी हुई है।
याद करते हैं साहित्यकार
सहित्यकार एसपी मिश्र का कहना है कि अदम गोंडवी को मैं दुष्यंत कुमार के अधिक निकट पाता हूं। उन्होंने वर्तमान व्यवस्था के यथार्थ को स्वर देते हुए उसके खिलाफ विद्रोह की कविता लिखी। अदम की शायरी सुकई, मंगरे, झुम्मन घिसियावन से बतियाती हुई बगावत का बिगुल बजाते हुए संसद को ललकारती है। इसलिए वह कहते हैं कि 'जनता के पास एक ही चारा है बगावत'। कुल मिलाकर अदम जनता का कवि है। उन्होंने न केवल शायरी की बल्कि शायरी को जिया भी है। वह एक महान रचनाकार थे।
अदम गोंडवी की कुछ गज़लें:
तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आँकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है
उधर जमहूरियत का ढोल पीटे जा रहे हैं वो
इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है, नवाबी है
लगी है होड़-सी देखो अमीरी औ' गरीबी में
ये गांधीवाद के ढाँचे की बुनियादी खराबी है
तुम्हारी मेज चाँदी की तुम्हारे ज़ाम सोने के
यहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रक़ाबी है
दूसरी ग़ज़ल
काजू भुने पलेट में विस्की गिलास में
उतरा है रामराज विधायक निवास में
पक्के समाजवादी हैं तस्कर हों या डकैत
इतना असर है खादी के उजले लिबास में
आजादी का वो जश्न मनाएँ तो किस तरह
जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में
पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें
संसद बदल गई है यहाँ की नखास में
जनता के पास एक ही चारा है बगावत
यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में
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हिंदू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िए
अपनी कुरसी के लिए जज्बात को मत छेड़िए
हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िए
ग़लतियाँ बाबर की थी; जुम्मन का घर फिर क्यों जले
ऐसे नाज़ुक वक़्त में हालात को मत छेड़िए
हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गए सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िए
छेड़िए इक जंग, मिल-जुल कर गरीबी के खिलाफ़
दोस्त मेरे मजहबी नग़मात को मत छेड़िए
Updated on:
23 Oct 2017 02:32 pm
Published on:
23 Oct 2017 02:29 pm
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