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पतंजलि ने दुनिया को सिखाया योग, खुद की जन्मस्थली उपेक्षित

योग के नाम पर बाबा रामदेव अकूत संपत्ति के हुए मालिक। गोंडा के गोनार्द में स्थित कोडर गांव है, महर्षि पतंजलि की जन्मस्थली।

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Akansha Singh

Jun 21, 2016

patanjali

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गोंडा। वैसे तो गोंडा ऋषियों मुनियों की जन्म, कर्म और तपोस्थली रही है। यहां भगवान राम की गायें चरने आती थीं। जिससे इस पुरे क्षेत्र को गोनार्द कहा जाता रहा है। इतना महत्वपूर्ण क्षेत्र होने के बावजूद सरकारों के उपेक्षा के कारण यहां घूमने टहलने व पर्यटन स्थल तक नहीं है।

जिले के बलरामपुर रोड पर सुभागपुर के पास महर्षि च्यवन मुनि का आश्रम है। जहां महर्षि के तप के दौरान पुरे शरीर पर दीमक लगी थी। केवल आंखे चमक रही थी। एक राजकुमारी ने आंखों में कांटा चुभोकर फोड़ दिया था। जिन्हें महर्षि से शादी कर श्राप से मुक्त होना पड़ा था। माहर्षि च्यवन मुनि का आश्रम आज भी मौजूद है और उपेक्षा का शिकार बना हुआ है। ऐसे ही सूकरखेत में राजपुर में गोस्वामी तुलसी दास की जन्म भूमि गोस्वामी तुलसी दास के गुरु नरहरि दास जी का आश्रम उपेक्षा का शिकार है।

इसी तरह तहसील तरबगंज में वजीरगंज के पास पहले सरयू नदी और अब तीन तरफ से कोडर झील से घिरा कोडर गांव उपेक्षा का शिकार बना हुआ है। यह वह गांव है, जहां योग जनक महर्षि पतंजलि करीब पांच हजार साल पहले गोडिका से जन्मे थे। योग जनक महर्षि पतंजलि की जन्मभूमि आज अपनी पहचान के लिए तरस रही है। जबकि पतंजलि के नाम से देश के प्रधानमंत्री योग को अंतरराष्ट्रीय बना कर आज के दिन अंतरस्ट्रीय योग दिवस के रूप प्रसिद्धि दिला दी और बाबा रामदेव पतंजलि के नाम से अरबों खरबों के मालिक बन गए।

वहीं पतंजलि की जन्म भूमि अपने पहचान के लिए तरस रही है, यही नहीं पर्यटन स्‍थल का दर्जा दिलाने के लिए दो दशक से संघर्ष कर रही श्री पतंजलि जन्मभूमि न्यास समिति केन्द्र और राज्य सरकारों को 22 बार 48 प्रस्ताव भेज चुकी है। वजीरगंज कस्बे से सटा कोडर गांव कालांतर में सरयू नदी के तट पर बसा था। शेषावतार कहे जाने वाले महर्षि पतंजलि का जन्म इसी पौराणिक स्थल पर हुआ था। किवदंती है कि, शेषावतार के रूप में पतंजलि के जन्म लेने से पहले सरयू नदी का बहाव काफी दूर हो गया और यही कोडर झील अस्तित्व में आ गयी।


मान्यता है कि, पतंजलि के जन्म लेने के बाद एकांतवास से शिष्यों को उपदेश देते थे। जिनकी केवल आवाज सुनाई देती।एक दिन कौतूहलवश गुरु के दर्शन की लालसा में एक शिष्य ने अंदर झांका, उसी दिन से सर्पाकार महर्षि अदृश्य हो गये। श्री पतंजलि जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष डॉ. भगवताचार्य का कहना है कि, महर्षि पतंजलि का जन्म गोडिका नाम की एक कन्या से उस समय हुआ था, जब वह भगवान सूर्य को जल दे रही थी।

म‍हर्षि पतंजलि ने स्‍वरचित ‘व्‍याकरण महाभाक्‍य’ में अपनी जन्‍मस्‍थली कोडर का जिक्र भी किया है। उन्होंने बताया कि, जन्मभूमि को पर्यटन स्थल घोषित कराने के लिए लगातार प्रयास हो रहा है, लेकिन सफलता नहीं मिली। हर वर्ष 21 जून को समिति अपनी ओर से कार्यक्रम करती है। उन्होंने बताया कि, यहां के लोगों को योग में कोई रुचि नहीं है। योग जनक की धरती का यह हाल है। बाकी दूसरे योग के नाम पर मालामाल हो गये हैं। डीएम आशुतोष निरंजन के संज्ञान में इस जन्म भूमि की बात आने पर बताया कि, महर्षि पतंजलि की जन्मभूमि को पर्यटन स्थल और धरोहर के रूप में विकसित करने के लिए नये सिरे से प्रस्ताव संस्कृति विभाग को भेजा जाएगा। पूरा प्रयास होगा वहां महर्षि के चबूतरे पर पतंजलि की प्रतिमा जल्द स्थापित हो जाये।

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