मान्यता है कि, पतंजलि के जन्म लेने के बाद एकांतवास से शिष्यों को उपदेश देते थे। जिनकी केवल आवाज सुनाई देती।एक दिन कौतूहलवश गुरु के दर्शन की लालसा में एक शिष्य ने अंदर झांका, उसी दिन से सर्पाकार महर्षि अदृश्य हो गये। श्री पतंजलि जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष डॉ. भगवताचार्य का कहना है कि, महर्षि पतंजलि का जन्म गोडिका नाम की एक कन्या से उस समय हुआ था, जब वह भगवान सूर्य को जल दे रही थी।