
डीडीयू में न जाने कितने रोहित बेमुलाआें ने कॅरियर को दांव पर लगा दिया, कुछ लड़े आैर बढ़े भी
दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में यह पहला प्रकरण नहीं है जब आरक्षित वर्ग से आने वाले छात्रों को परेशान किया गया। ऐसे छात्रों की लंबी फेहरिश्त है। कुछ ने अपना शोध अधूरा छोड़ दिया तो कुछ लड़े भी और अपने हक के लिए आज भी लड़ रहे।
गोरखपुर विवि में शोधार्थी रह चुके डाॅ.हितेश का प्रकरण तो इसी विभाग से संबंधित है। डाॅ.हितेश अपनी लड़ाई को ओबीसी आयोग तक लेकर जा चुके हैं। इनके भी आरोपों की केंद्र बिंदू में प्रो.सीपी श्रीवास्तव ही रहे हैं। डाॅ.हितेश बताते हैं कि उनके प्रकरण में प्रो.सीपी श्रीवास्तव को तत्कालीन कुलपति प्रो.पीसी त्रिवेदी ने विभागाध्यक्ष पद से हटाया भी था।
हितेश ने साल 2008 में विवि में शोध छात्र के रूप में अपना पंजीकरण कराया था। इनके गाइड उस समय प्रो.केसी पांडेय थे। करीब दो साल बाद प्रो.पांडेय दूसरे विवि में चले गए। विवि ने प्रो.पांडेय की इस अवधि में छुट्टी मंजूर कर दी। लेकिन डाॅ.हितेश के गाइड प्रो.पांडेय ही रहे। लोकल गाइड के रूप में प्रो.एमएम त्रिवेदी को विवि के कुलपति के निर्देश पर बना दिया गया था।
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तत्कालीन शोध छात्र डाॅ.हितेश बताते हैं कि इस दौरान विभाग के कुछ शिक्षक उनको काफी परेशान करते थे। बात बात पर टिप्पणी करना इनकी फितरत में हैं। वह बताते हैं कि प्रो.सीपी श्रीवास्तव किसी न किसी बात को लेकर परेशान करने की नियत तो रखते ही थी, आरक्षित वर्ग के होने का अहसास जरूर कराते रहते थे जबकि मैं यूजीसी-नेट की परीक्षा पास कर जेआरएफ क्वालिफाई किया था। हितेश बताते हैं कि विभागीय जिम्मेदारों के द्वारा जेआरएफ के लिए मिलने वाले स्टाईपेंड में अड़ंगा लगाया जाता रहा। हद तो तब हो गई कि उनको एसआरएफ के दौरान मिलने वाली धनराशि का एक पैसा भी नहीं देने दिया गया। डाॅ.हितेश बताते हैं कि अपनी लड़ाई लड़ते हुए मैंने अपनी पीएचडी तो पूरी कर ली लेकिन एसआरएफ के दौरान की धनराशि नहीं मिली। हर बार तत्कालीन विभागीय जिम्मेदार प्रो.सीपी श्रीवास्तव कोई न कोई अड़ंगा लगा देते। वह विवि स्तर पर शिकायत कर जब थक गए तो ओबीसी आयोग में पहुंचे। आयोग में आज भी मामला लंबित है।
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डाॅ.हितेश बताते हैं कि विवि में आरक्षित वर्ग से आने वाले शोध छात्रों के साथ बहुत ही अन्यायपूर्ण व्यवहार कुछ शिक्षक करते हैं।
पत्रिका भी आवाज उठा चुका है इन शोधार्थियों का
करीब दो साल पहले 2016 में पत्रिका इन शोधार्थियों की आवाज बन चुका है। ‘मोदीजी, गोरखपुर के इस दलित छात्र को रोहित बेमुला होने से बचाइए’ शीर्षक से अपने आॅनलाइन संस्करण में खबर को प्रमुखता से उठाया था। विवि द्वारा कई महीनों से दलित वर्ग से आने वाले करीब तीन दर्जन शोधार्थियों के शोध की खातिर मिलने वाली धनराशि को आवंटित नहीं दिया जा रहा था। थक हारकर परेशान यह शोधार्थी हर स्तर पर कोशिश कर चुके थे लेकिन इनको सफलता नहीं मिली थी। इन्होंने पत्रिका से संपर्क किया। पत्रिका द्वारा मामले को प्रकाशित किए जाने के बाद आनन फानन में विवि ने इनके प्रकरण का निस्तारण कराया था।
Published on:
25 Sept 2018 01:01 pm
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