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क्या आपने सुना है बाहुबली रॉबिनहुड और शाही का नाम, जिनसे कांप उठती थी छात्र राजनीति

यह राजनीति थी बाहुबल के वर्चस्व की...

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Jyoti Mini

Sep 17, 2016

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धीरेंद्र गोपाल
गोरखपुर. जब पूरे देश के नौजवानों को एक बुजुर्ग क्रांति के लिए तैयार कर रहा था तो गोरखपुर भी इस सम्पूर्ण क्रांति में कदमताल कर ही रहा था। यह वह दौर था जब साथ ही साथ यहाँ शनै शनै माफियाराज भी पांव पसार रहा था। कहते हैं अपराध की दुनिया को कायम रखने के लिए युवा शक्ति की जरुरत होती है और गोरखपुर विवि से बड़ा युवा शक्ति का कौन सा केंद्र हो सकता। बस यहीं से छात्र संघ चुनाव में एक नए तरह की राजनीति ने पदार्पण किया। यह राजनीति थी बाहुबल की, वर्चस्व की। जिसको पूर्वांचल का दो सबसे बड़ा ध्रुव सीधे तौर पर अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर लड़ना शुरू किया।
शुरुआत किया लोकप्रिय छात्रनेता रविन्द्र सिंह ने जो गोरखपुर के अलावा लखनऊ विवि के भी छात्र संघ अध्यक्ष रहे। बाद में कौड़ीराम के विधायक चुने गए।


जानकार बताते हैं कि विधायक रहते हुए वह सीधे छात्र संघ राजनीति में हस्तक्षेप करते और अपना पदाधिकारी बनवाते। इसके साथ साथ रॉबिनहुड ही छवि बना चुके बाहुबली पंडित हरिशंकर तिवारी के हाता का भी पूरे जोर शोर से इस चुनाव में दखल होता रहा। युवा विधायक रविंद्र सिंह की हत्या के बाद वीरेंद्र प्रताप शाही ने खुलकर दूसरे गुट की कमान संभाल ली। गोरखपुर माफियाराज से पूरी तरह रूबरू हो चुका था। हर तरफ इनका प्रभाव हो चुका था। सिस्टम पूरी तरह फेल हो चुका था। इसके बाद तो छात्र संघ चुनाव हाता बनाम शाही होने लगा। चुनाव में चेहरे कोई होते लेकिन चुनाव तो दोनों ध्रुव ही लड़ते। 1996 में वीरेंद्र प्रताप शाही की हत्या के बाद भी ध्रुवीकरण पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ा। कभी क्षेत्र तो कभी जाति तमाम मोहरे ध्रुवीकरण के नाम पर चलते रहे।



एक वरिष्ठ पत्रकार बताते हैं कि चुनाव में अराजकता का यह दौर था। छात्र नेता जीत की आस में दोनों चौखटों पर पहुँचने लगे। इनके आशीर्वाद के बिना चुनाव नहीं होते। जब दो गुट आमने सामने होते थे तब मरने-मारने की नौबत आ जाती थी। चुनाव को शांतिपूर्ण कराने में पुलिस प्रशासन को पसीना छूटने लगता था। छात्रसंघ के महामंत्री रह चुके अंशुमान त्रिपाठी हालांकि छात्र संघ में अपराधी प्रवित्ति के लोगों के चुने जाने की बात साफ़ तौर पर ख़ारिज करते हैं लेकिन इस बात को स्वीकार करते हैं कि दोनों ध्रुव छात्र संघ राजनीति में पूरी तरह हावी रहे। उनका कहना है कि चाहे जितनी भी अराजकता बाहर हो जाए कैंपस में बिल्कुल सही माहौल रहता। श्री त्रिपाठी कहते हैं कि यह पहला चुनाव है जहां दोनों ध्रुवों की कोई रुचि नहीं है।

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