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HOLI : सिर्फ गीत के बोल नहीं बल्कि हमारी धरोहर है ‘फगुआ’

भारत विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों को एक साथ लेकर चलने वाला देश है। यहां हर मौसम में विविध त्यौहार आते हैं जो मिलने-मिलाने का बेहतरीन अवसर प्रदान करते हैं। हर कुछ महीने बाद देश त्यौहारों के रंग में डूबा नजर आता है।वसंत ऋतु अपने साथ देश का सबसे रंगीन त्यौहार “होली” लेकर आता है।होली भारत का एक बेहद लोकप्रिय त्यौहार है। रंगों का त्योहार कहा जाने वाला यह पर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। होली के अवसर पर कई गीत गाये जाते हैं।

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होली के अवसर पर गाये जाने वाले फगुआ गीतों का अपना विशेष पौराणिक महत्व है। फगुआ जी हाँ, जिसका मतलब होता है फागुन। भारतीय हिंदी कैलेंडर के हिसाब से वसंत ऋतु के बाद आने वाले माह को फागुन का महीना कहा जाता है।

गुलाल डालने का मह्त्व-

होली में एक दूसरे के ऊपर रंग-बिरंगे रंग और गुलाल डालना हमारी पौराणिक परंपरा है। माना जाता है कि होली का त्यौहार सभी भेदभाव को ख़त्म करने और सबको एकजुट और एक रंग में करने का प्रतीक है। आज के आधुनिक होते सामाज़ में भले ही होली रंगों के साथ शोर-शराबे तक सिमट गयी हो। लेकिन अभी भी हमारे गांवों में फगुआ गाने की परंपरा निभाई जाती है। ज्यादातर शहरों में सिर्फ सुबह ही होली की धूम मचती है, शाम को सभी अपने घरों में आराम कर रहे होते है।लेकिन बिहार और यूपी में होली सुबह शाम दोनों समय मनाई जाती है। होली सुबह गीले रंगों के साथ और शाम को गुलाल-अबीर के साथ। शाम को गुलाल का भी बड़ा महत्व है। सब छोटे सबसे पहले अपने से बड़ों के पैरो में गुलाल लगाकर उन्हें प्रणाम करते है, फिर बड़े आशीर्वाद के तौर पर उन्हें गुलाल का टिका लगाते हैं।

फगुआ के बिना अधूरी है होली -

यह परंपरा भी छोटों के मन में बड़ों के लिए इज़्ज़त और बड़ों के मन में छोटों के लिए प्यार दर्शाने का एक खूबसूरत स्वरुप है। बिहार और यूपी में आज भी होली फगुआ गाये बिना अधूरी होती है। ये अलग बात है कि वहां भी यह परंपरा अब गांव तक सिमट के रह गयी है। हमारे कितने शहरी बच्चे आज तक फगुआ क्या है ये जानते ही नहीं हैं। लेकिन सच मानिये जिन लोगों ने इस परंपरा के साथ होली मनाई है वो आज कितने भी शहरी आधुनिकताओं के साथ होली मना लें। लेकिन अंतर्मन के किसी कोने में बिन फगुआ होली अधूरी सी ही लगती है।


क्या है फगुआ ?

फगुआ होली में गाया जाने वाले पारम्परिक लोकगीत है। इसे फ़ाग भी कहते हैं। बिहार और यूपी के ज्यादातर गाँव में सुबह रंग खेलने के बाद नहाकर शाम को गुलाल के साथ अच्छे या नए कपडे पहने मर्दों की टोली ढोल ,नगाड़ों और मंजीरे के साथ गांव के सभी घरों के सामने जाकर फगुआ गाती है। जोगीरा सारारारा..... जैसे फगुआ गीतों का रस कान और हृदय में अमृत की भांति महसूस होता है। इस दौरान फगुआ गाने आयी हुई टोली का स्वागत घर की महिलाएं मिठाई व सूखे मेवो से करतीं हैं। हर घर के द्वार पर जाकर फगुआ गाने की रस्म बेहद शुभ मानी जाती है। ढोलक की थाप, मंजीरों की आवाज़ के बीच फगुआ गीतों के बोल को सुनकर हर व्यक्ति फागुन के रंग में रचबस जाता है। उत्तर भारत के कई राज्यों में तो वसंत पंचमी के बाद से ही होली के गीत गाए जाने लगते हैं जिसका सिलसिला होली तक जारी रहता है। होली में गाये जाने वाले पारम्परिक गीतों को फगुआ या फ़ाग भी कहते हैं।सच मानिये, होली में फगुआ का महत्त्व और ख़ुशी वही जान सकता है जिसने इन स्वर्णिम दिनों को जिया हो। धीरे-धीरे गांव में भी फैलती शहरी आधुनिकताओं ने डी जे और लाउड म्यूजिक का प्रचलन बढ़ा दिया है। लेकिन आज भी फगुआ के मीठे रस की जगह शायद कभी ये ले पाएं।

इस धरोहर का सम्मान हर व्यक्ति की ज़िम्मेदारी है-

आशा है कि हमारी ये पौराणिक धरोहर हमारी अगली पीढ़ी आगे लेकर बढ़े। ताकि हमारी आने वाली नस्लें भी मिट्टी की सौंधी खुशबु से रचे बसे इन फगुआ गीतों से रूबरू होकर अपनी परंपरा का निर्वाह करें। पूर्व शिक्षक एवं वरिष्ठ पत्रकार विनोद कुमार महराजगंज के घुघली क्षेत्र स्थित अपने गांव मटकोपा को याद करते हुए बताते हैं कि आज भले ही वह शहर में सभी आधुनिक सुविधाओं के साथ रहते है लेकिन आज भी वह अपनी मातृभूमि, अपने ,गांव,अपनी परम्परा से जुड़े हुए है। आज भी उनका पूरा परिवार प्रत्येक होली पर अपने गांव रहता है और फगुआ गीतों के साथ होली का पर्व मनाता है। वह कहते हैं फगुआ के बिना होली अधूरी सी लगती है।

जीवन के 70 वसंत देख चुके विनोद जी की आँखों में फगुआ को याद करके एक अलग ही चमक आ जाती है। वह चाहते हैं कि शहरी चकाचौंध में हमारी फगुआ की परंपरा विलुप्त ना हो बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ी इस धरोहर को आगे लेकर जाये। होली व फगुआ एक दूसरे के पूरक हैं , इस धरोहर का सम्मान हर व्यक्ति की ज़िम्मेदारी है।