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गोरखपुर लिटरेरी फेस्टः थोड़ा देश-समाज तो थोड़ी राजनीति पर, कुछ साहित्य तो कुछ मीडिया पर हुआ मंथन

दो दिनी आयोजन का उद्घाटन किया राज्यसभा सभापति हरिवंश ने

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गोरखपुर लिटरेरी फेस्टः थोड़ा देश-समाज तो थोड़ी राजनीति पर, कुछ साहित्य तो कुछ मीडिया पर हुआ मंथन

शहर में आयोजित गोरखपुर लिटरेरी फेस्ट ‘शब्द-संवाद’ का उद्घाटन शनिवार को किया गया। इस दो दिवसीय आयोजन के पहले दिन साहित्य-समाज-राजनीति और नई तकनीकों के देश-समाज-साहित्य पर प्रभाव पर अलग-अलग सत्रों में बात हुई।
सेंट एंड्रयूज के सभागार में चलने वाले लिटरेरी फेस्ट का उद्घाटन राज्यसभा सभापति हरिवंश ने किया।
उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि हरिवंश ने कहा कि साहित्य मनुष्य और समाज को बदलने का सबसे प्रमुख माध्यम है। मनुष्य की सोच, भाव और क्षमता को बदलने का काम करता है साहित्य। आज जब फांसी वाद, पूंजीवाद का पराभव हो गया तो एक नया पद सामने आ रहा है पूंजीवाद मानवीय चेहरे के साथ। आयोजन की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि यह वही धरती है जहां पर बुद्ध, कबीर, गुरु गोरक्षनाथ, हनुमान प्रसाद पोद्दार और फिराक गोरखपुरी जैसे महान संत, विचारक और साहित्य कर्मी पैदा हुए। विश्वनाथ प्रसाद तिवारी इसकी कड़ी हैं। उन्होंने कहा कि जिस धरती पर गीता प्रेस स्थित हो और यहां से साहित्य प्रकाशित हो कर पूरे विश्व में भारतीय सभ्यता और संस्कृति का परचम लहराया हो अगर वह धरती साहित्य सम्मेलन के लिए उपयुक्त नहीं होगी तो भला कौन सी धरती उपयुक्त कही जाएगी।
साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा कि शांति, स्वतंत्रता, कुटुंब और वैश्वीकरण तो साहित्य के कीवर्ड्स हैं और संयोग है की दूसरे गोरखपुर लिटरेरी फेस्टिवल का आयोजन करने वाली संस्थाओं के नाम में भी यह सब है। उन्होंने कहा की शब्द के साथ संवाद की बहुत आवश्यकता है क्योंकि जब शब्द से संवाद रुक जाता है तो हिंसा शुरू होती है। आज भूमंडलीकरण और व्यवसायिकता के दौर में आत्मीयता का अभाव है और साहित्य इन सब से बहुत बड़ा है। उन्होंने कहा कि आज के दौर में समाज दो प्रमुख समस्याओं से जूझ रहा है, एक हिंसा और दूसरी महिलाओं से बदसलूकी यहां पर दोनों के बीच साहित्य की जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है।

प्रोफेसर चितरंजन मिश्र ने साहित्य की उपेक्षा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज साहित्य हाशिए पर है और इसे एक पन्ना मिलना भी मुश्किल होता है। उन्होंने कहा की सभ्यता को मानवीय बनाने के लिए जरूरी है कि शब्द के साथ संवाद हो। खराब आदमी की भी इच्छा होती है कि वह अच्छा बने और यह साहित्य ही कर सकता है ।
प्रोफेसर सदानंद गुप्ता ने कहा कि साहित्य दिल के रकबे को चैड़ा करता है। साहित्य मनुष्यता के व्यापक पद से परिचित कराता है और आत्मा से साक्षात्कार करा कर बेहतर मनुष्य बनने की प्रेरणा देता है।
उद्घाटन सत्र का संचालन अनुपम सहाय ने किया।

दूसरा सत्रः इंटरनेट के दौर में साहित्य की उड़ान

दूसरा सत्र इंटरनेट के दौर में साहित्य की उड़ान के विषय पर था। सत्र का संचालन पत्रकार/एंकर शिप्रा सुमन ने किया। विषय पर चर्चा के लिए लेखिका और स्वतंत्र पत्रकार नासिरा शर्मा, प्रभात रंजन और राजकुमार मौजूद रहे। इंटरनेट के दौर में पुस्तकें और उनको डिजिटल प्लेटफॉर्म से मिल रही चुनौती पर वक्ताओं के बीच असहमति भी बनी। सबने अपने तर्क दिए तो दूसरे ने अपने तर्क से असहमति जताई।
नासिरा शर्मा ने कहा कि किताबे कालजई हैं और इंटरनेट उनके प्रचार प्रसार में मदद कर सकता है लेकिन वहीं पर डिजिटल माध्यम संवेदनाओं को घाल मेल कर देते हैं। यह साहित्य के लिए हानिकारक है। असल साहित्य तो किताब ही है। प्रभात रंजन ने कहा की इंटरनेट ने साहित्य की सुलभता को बढ़ाया है और तमाम रीडिंग एप्स से लेकर के ऑडियो बुक तक काफी लोकप्रिय हो रही है। उन्होंने कहा कि जो भी नया माध्यम हो साहित्यकार को उसने अपनी उपस्थिति दर्ज करानी चाहिए। शुभ्रा सुमन ने कहा कि इंटरनेट साहित्य को वैश्विक स्तर पर पहुंचने में सुलभ बनाता है।

तीसरा सत्रःबुद्धिजीवियों के दोहरे मापदंड

तीसरे सत्र में बुद्धिजीवियों के दोहरे मापदंड विषय पर कश्मीरी पंडित और रूट्स इन कश्मीर के संस्थापक सुशील पंडित ने कश्मीरी पंडितों के साथ हुए जुल्म और भारत सरकार के भेदभाव की चर्चा की। सुशील पंडित ने कहा कि भारत में क्या पूरे विश्व में दोहरे मापदंड का ऐसा उदाहरण नहीं मिल सकता जब 28 सालों से 3.50 लाख कश्मीरियों को न्याय नहीं मिलता है और रोहिंग्या मुसलमानों के लिए देश के तमाम नेता और अधिवक्ता खड़े हो जाते हैं। उन्होंने दर्द बयां किया कि जिस नरसंहार में लाखों कश्मीरी बेघर हुए उसकी एक जांच नहीं हुई सजा तो दूर की बात है। उन्होंने कहा कि कश्मीरी पंडितों के मसले को पुराना बताकर सुप्रीम कोर्ट याचिका खारिज कर देती है तो वहीं उससे बहुत पुरानी घटना, गांधी की हत्या की फाइल को दोबारा खोला जाता है।
लिटरेरी फेस्ट में अमर सिंह भाजपा के रंग में रंगे दिखे और गैर भाजपाई दलों पर खूब निशाना साधा। उन्होंने कहा कि बुद्धिजीवी कभी भी दो स्टैंड नहीं रखते हैं और सच बोलने के लिए साहस की जरूरत होती है।
शब्द संवाद के पहले दिन के तीसरे सत्र में उपस्थित अमर सिंह ने रहस्य उद्घाटन किया कि जल्द ही उनके जीवन पर एक आत्मकथा प्रकाशित होने जा रही है। सत्र को माॅडरेट कर रहे प्रोफेसर हर्ष सिन्हा के पूछने पर उन्होंने बताया कि उनके जीवन पर एक फिल्म भी बनने वाली है लेकिन वह उसमें अभिनय नहीं करेंगे।

चौथा सत्रः मीडिया की जनपक्षधरता बनाम दलपक्षधरता

पहले दिन के चैथे सत्र में मीडिया जनपक्षधरता बनाम दलपक्षधरता विषयक विमर्श हुआ। वरिष्ठ पत्रकार बृजेश कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार रंजीत कुमार तथा वरिष्ठ राणा यशवंत के बीच विमर्श को डाॅ.उत्कर्ष सिन्हा ने माॅडरेट किया।
रंजीत कुमार ने कहा जनपक्षधरता तथा दलपक्षधरता के आगे भी मीडिया की कई पक्ष हैं। उन्होंने कहा कि वास्तव में जन और दल एक दूसरे के बनाम नहीं बल्कि दोनों का आपस में संबंध भी है। आज पहले के मुकाबले मीडिया पर ब्रेकिंग और कंप्रोमाइजिंग का दबाव ज्यादा है परंतु फिर भी मीडिया ने चीजों को बहुत हद तक स्पष्ट और पारदर्शी रखा है।
बृजेश कुमार सिंह ने कहा कि विमर्श जरूरी है परंतु मीडिया को एक ही सांचे में रखकर मात्र किसी एक पक्ष का नहीं माना जा सकता। क्योंकि मीडिया सामाजिक क्रांति का अग्रदूत भी है। उन्होंने कहा कि मीडिया पर इतने सवाल जो आज उठ रहे हैं उसके पीछे भी मीडिया ही है। जो कि इसके स्वरूप की विविधता का दर्शन कराती है।
राणा यशवंत ने कहा कि जब हमारे देश की लगभग 40 करोड़ आबादी स्मार्ट फोन के माध्यम से सोशल मीडिया तथा अन्य समाचार प्रसारक माध्यमों से जुड़ी है तब कहीं ना कहीं लोगो के उत्तरदायित्व के विषय में भी हमें सोचना चाहिए। तब जबकि कट-कॉपी-पेस्ट और फॉरवर्डिंग के समय में हम यह नहीं तय कर पा रहे कि क्या सही है और क्या गलत, मीडिया का पक्ष और इसकी भूमिका कहीं ज्यादा सशक्त हो कर उभरती है। उन्होंने स्वीकार किया कि बाजारीकरण और विज्ञापन के दौर में मीडिया के ऊपर कुछ दबाव पड़ा है। उन्होंने कहा कि लगभग इकसठ हजार करोड़ के विज्ञापन का बाजार मीडिया को थोड़ा प्रभावित करता है लेकिन आमजन के तमाम मुद्दों की सशक्त आवाज को भी बुलंद करने का काम मीडिया ही करता है।

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