
प्राचीन गोरखपुर में बस्ती, देवरिया, आजमगढ़ और नेपाल तराई के कुछ हिस्सों के जिले शामिल थे। ये क्षेत्र, जिसे गोरखपुर जनपद कहा जा सकता है, आर्य संस्कृति और सभ्यता का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।
गोरखपुर कौशल के प्रसिद्ध राज्य का एक हिस्सा था, जो छठवीं सदी में सोलह महाजनपदों में से एक था अयोध्या में अपनी राजधानी के साथ इस क्षेत्र में सबसे पहले राजा शासक थे IKSHVAKU, जिन्होंने क्षत्रिय के सौर वंश की स्थापना की थी।
तब से, यह मौर्य, शुंग, कुशना, गुप्ता और हर्ष राजवंशों के पूर्व साम्राज्यों का एक अभिन्न अंग बना रहा। परंपरा के अनुसार, थारू राजा, मदन सिंह के मोगेन 900-950 ए.डी ने गोरखपुर शहर और आस-पास क्षेत्र पर शासन किया।
1801 में अवध के नवाब ने ईस्ट इंडिया कंपनी को इस क्षेत्र के हस्तांतरण से आधुनिक काल को चिह्नित किया था। इस के साथ, गोरखपुर को एक ‘जिलाधिकारी’ दिया गया था। पहला कलेक्टर श्री रूटलेज था।
1829 में, गोरखपुर को इसी नाम के एक डिवीजन का मुख्यालय बनाया गया था, जिसमें गोरखपुर, गाजीपुर और आज़मगढ़ के जिले शामिल थे। श्री आर.एम. बिराद को पहली बार आयुक्त नियुक्त किया गया था।
1865 में, नया जिला बस्ती गोरखपुर से बनाया गया था । 1946 में नया जिला देवरिया बना दिया गया था। गोरखपुर के तीसरे विभाजन ने 1989 में जिला महाराजगंज के निर्माण का नेतृत्व किया।
गोरखपुर एक प्रसिद्ध धार्मिक केन्द्र है, जो अतीत से बौद्ध, हिन्दू, मुस्लिम, जैन और सिख सन्तों की साधनास्थली रहा है। सन्त गोरखनाथ के बाद, उनके ही नाम पर इसका वर्तमान नाम गोरखपुर रखा गया। यहां का प्रसिद्ध गोरखनाथ मंदिर अभी भी नाथ सम्प्रदाय की पीठ है।
गोरखपुर जंक्शन रेलवे स्टेशन गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के अनुसार विश्व का सर्वाधिक लम्बा प्लेटफॉर्म यहीं पर स्थित है। 20वीं सदी में गोरखपुर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक केन्द्र बिन्दु था।
पूर्वोत्तर रेलवे का मुख्यालय, जो ब्रिटिश काल में 'बंगाल नागपुर रेलवे' के रूप में जाना जाता था, यहीं स्थित है। अब इसे एक औद्योगिक क्षेत्र के रूप में विकसित करने के लिये गोरखपुर औद्योगिक विकास प्राधिकरण गीडा की स्थापना पुराने शहर से 15 किमी दूर किया गया है।
चौरीचौरा की घटना ने असहयोग आंदोलन को स्थगित कर दिया
चौरीचौरा की 4 फ़रवरी 1922 की घटना जो भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई, जब पुलिस अत्याचार से गुस्साए 2000 लोगों की एक भीड़ ने चौरीचौरा का थाना ही फूंक दिया जिसमें 19 पुलिसकर्मियों की मौत हो गई।
आम जनता की इस हिंसा से घबराकर महात्मा गांधी ने अपना असहयोग आंदोलन यकायक स्थगित कर दिया। जिसका परिणाम यह हुआ कि उत्तर प्रदेश में ही हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन नाम का एक देशव्यापी प्रमुख क्रान्तिकारी दल गठित हुआ।
9 अगस्त 1925 को काकोरी काण्ड करके ब्रिटिश सरकार को खुली चुनौती दी, जिसके परिणामस्वरूप दल के प्रमुख क्रन्तिकारी नेता राम प्रसाद बिस्मिल' को गोरखपुर जेल में ब्रिटिश शासन के खिलाफ लड़ाई में सक्रिय भाग लेने के लिए फांसी दे दी गई।
19 दिसंबर 1927 को बिस्मिल की अन्त्येष्टि जहाँ पर की गयी वह राजघाट नाम का स्थान गोरखपुर में ही राप्ती नदी के तट पर स्थित है।
जवाहर लाल नेहरू को गिरफ्तार किया गया
जिले में घटी दो अन्य महत्वपूर्ण घटनाओं ने 1942 में शहर को और अधिक चर्चित बनाया। प्रसिद्ध भारत छोड़ो आंदोलन के बाद शीघ्र ही 9 अगस्त को जवाहर लाल नेहरू को गिरफ्तार किया गया था और इस जिले में उन पर मुकदमा चलाया गया।
उन्होंने यहाँ की जेल में अगले तीन साल बिताये। सहजनवा तहसील के पाली ब्लॉक अन्तर्गत डोहरिया गाँव में 23 अगस्त को आयोजित एक विरोध सभा पर ब्रिटिश सरकार के सुरक्षा बलों ने गोलियाँ चलायीं जिसके चलते नौ लोग मारे गये और सैकड़ों घायल हो गये। एक शहीद स्मारक आज भी उस स्थान पर खड़ा है।
गोरखपुर शहर की संस्कृति
गोरखपुर शहर की संस्कृति अपने आप में अद्भुत है। यहाँ परम्परा और संस्कृति का संगम प्रत्येक दिन सुरम्य शहर में देखा जा सकता है। जब आप का दौरा गोरखपुर शहर में हो तो जीवन और गति का सामंजस्य यहाँ आप भली-भाँति देख सकते हैं।
सुन्दर और प्रभावशाली लोक परम्पराओं का पालन करने में यहां के निवासी नियमित आधार पर अभ्यस्त हैं। यहां के लोगों की समृद्ध संस्कृति के साथ लुभावनी दृश्यावली का अवलोकन कर आप मन्त्रमुग्ध हुए बिना नहीं रह सकते। जनसंख्या की प्रमुख संरचना में हिन्दू धर्म के कायस्थ, ब्राह्मण, क्षत्रिय, मारवाड़ी वैश्य समाज, मुसलमान, सिख, ईसाई, शामिल हैं।
शहर में स्थित दुर्गाबाड़ी बंगाली समुदाय के सैकड़ों लोगों का भी निवासस्थल है जो कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में एक अलग बात है। गोरखपुर प्रसिद्ध बिरहा गायक बलेसर, भोजपुरी लोकगायक मनोज तिवारी, मालिनी अवस्थी, मैनावती आदि की कर्मभूमि रहा है।
प्रसिद्ध सन्त कबीर यहीं के थे
रहस्यवादी कवि और प्रसिद्ध सन्त कबीर यहीं के थे। उनका मगहर नाम के एक गाँव (गोरखपुर से 20 किमी दूर) देहान्त हुआ। कबीर दास ने अपनी कविताओं के माध्यम से अपने देशवासियों में शान्ति और धार्मिक सद्भाव स्थापित करने की कोशिश की। उनकी मगहर में बनी मजार की जगह तीर्थयात्रियों की एक बड़ी संख्या को अपनी ओर आकर्षित करती है।
गोरखनाथ, फिराक, मुंशी प्रेमचंद से बनी गोरखपुर की पहचान
सात वर्ग किलोमीटर में फैले भव्य रामगढ़ ताल की गिनती तो गोरखपुर के प्राकृतिक धरोहरों में होती है। मशहूर शायर फिराक गोरखपुरी और कथाकार प्रेमचंद के नाम से गोरखपुर साहित्य के राष्ट्रीय फलक पर सजता है। गोरखपुर खाद कारखाना और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) भी अब गोरखपुर की पहचान में शामिल हो रहा है।
गोरखपुर की भाषा
गोरखपुर की भाषा में हिन्दी और भोजपुरी शामिल है। इन दोनों भाषाओं का भारत में व्यापक रूप से प्रयोग किया जाता है। हिन्दी भाषा तो अधिकांश भारतीयों की मातृभाषा है परन्तु जो हिन्दी गोरखपुर में बोली जाती है उसकी भाषा में कुछ स्थानीय भिन्नता है। लेकिन यह शहर में सबसे व्यापक रूप से प्रयुक्त भाषा है।
शहर की दूसरी भाषा भोजपुरी है। इसमें उत्तर प्रदेश के क्षेत्र में बोली जाने वाली विशेष रूप से भोजपुरी की कई बोलियाँ शामिल हैं। भोजपुरी संस्कृत, हिन्दी, उर्दू और अन्य भाषाओं के हिन्द-आर्यन आर्यन शब्दावली के मिश्रणों से बनी है। भोजपुरी भाषा बिहारी भाषाओं से भी सम्बन्धित है।
रामगढ़ ताल कभी गांव था
गोरखपुर विवि के प्राचीन इतिहास विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. राजवंत राव के अनुसार जहां रामगढ़झील है वहां 2600 साल पहले रामग्राम हुआ करता था। यह कोलियों की राजधानी थी। भौगोलिक आपदा के चलते रामग्राम धंसकर झील में बदल गया।
अब तक 8 बार बदल चुका है गोरखपुर का नाम, 2600 साल का इतिहास
गोरखपुर के नाम के इतिहास को लेकर साहित्यकार डॉ वेद प्रकाश पांडे द्वारा लिखित किताब शहरनामा में बताया गया है कि मुगल काल में जब जौनपुर में सर्की शासको का राज हुआ तो इसका नाम बदलकर सूब-ए-सर्किया कर दिया गया। इसके कुछ सालों बाद ही बाद एक बार फिर इसका नाम बदला और अख्तरनगर रख दिया गया।
बीते समय के बाद औरंगजेब के शासन में भी इसका नाम बदला गया। इस दौरान साल 1658 से लेकर 1707 तक इसे मोअज्जमाबाद के नाम से जाना गया।
दरअसल औरंगजेब के बेटे का नाम मोअज्जमाबाद था और वह यहां शिकार के लिए आया करता था। ऐसे में जब वह कुछ समय के लिए यहां ठहरा था, तो उसी दौरान इसना नाम मोअज्जमाबाद रख दिया गया।
इसके बाद साल 1801 में अंग्रेजों ने एक बार फिर इसके नाम में बदलाव किया। इस दौरान गुरु गोरक्षनाथ के नाम पर शहर का नाम गोरखपुर रखा गया। तब से लेकर अब तक उत्तर प्रदेश के इस जिले को गोरखपुर के नाम से ही जाना जाता है। बता दें 217 सालों से जिले का नाम गोरखपुर ही है।
गोरखपुर ने अब तक दो मुख्यमंत्री दिएं है
वीर बहादुर सिंह 24 सितम्बर, 1985 से 24 जून, 1988 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। वे उत्तर प्रदेश के 14वें मुख्यमंत्री थे। 1988 से 30 मई, 1989 तक वे केन्द्रीय संचार मंत्री के पद पर आसीन रहे।
वीर बहादुर सिंह जिला युवक कांग्रेस गोरखपुर के संयोजक, सदस्य अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी, सदस्य उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी, महामन्त्री उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी और सेन्ट्रल पार्लियामेन्टरी बोर्ड के स्थायी निमंत्रित सदस्य भी रहे। दूसरे मुख्यमंत्री योगी अदित्यनाथ है। जो वर्तमान में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री है।
गीताप्रेस हिन्दू धार्मिक पुस्तकें प्रकाशित करने वाली संस्था
गीताप्रेस विश्व की सबसे ज्यादा हिन्दू धार्मिक पुस्तकें प्रकाशित करने वाली संस्था है। यह पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर शहर के गीता प्रेस रोड इलाके की एक इमारत में धार्मिक पुस्तकों के प्रकाशन का काम कर रही है।
इसमें लगभग 200 कर्मचारी काम करते हैं। यह एक आध्यात्मिक संस्था है। देश-दुनिया में हिंदी, संस्कृत और अन्य भारतीय भाषाओं में प्रकाशित धार्मिक पुस्तकों, ग्रंथों और पत्र-पत्रिकाओं की बिक्री कर रही गीताप्रेस को भारत में घर-घर में रामचरितमानस और भगवद्गीता को पहुंचाने का श्रेय जाता है।
गोरखपुर भौगोलिक क्षेत्र 3,483.8 वर्ग किलोमीटर जनसंख्या 44,36,275 ग्रामीण जनसंख्या 81.22% शहरी जनसंख्या 18.78% साक्षरता 73.25%
Updated on:
22 Jan 2023 09:37 am
Published on:
22 Jan 2023 09:36 am
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