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Unnao Rape case योगी के गढ़ की महिलाएं क्या बोली उन्नाव कांड पर

विपक्ष से सत्ता में आने के बाद राजनैतिक दलों के बदलते चाल-चरित्र से आधी आबादी काफी आहत दिखीं

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Unnav Rape Case

उन्नाव रेप केस

गोरखपुर। अभी बामुश्किल से डेढ़ साल पहले की बात है जब एक राजनैतिक दल के नेता द्वारा बहू-बेटियों पर की गई आपत्तिजनक टिप्पणी के बाद राजनीति गरमा गई थी। अचानक से राजनीति ऐसी करवट लेती है कि बेटी के सम्मान में-भाजपा मैदान में के नारों के साथ पूरे प्रदेश में आंदोलन खड़ा हो जाता है। मीडिया में डिबेट शुरू हो जाता। हर नुक्कड़-चैक-चैराहों पर बस महिला सम्मान की ही चर्चा। विधानसभा चुनावों का ऐलान होते ही बीजेपी इसे मुद्दा बना देती है। महिलाओं को लगने लगता है कि प्रदेश में जो राजनैतिक परिवर्तन होने जा रहा उसमें शायद उनके भी सम्मान की बात होगी। लेकिन जिस उम्मीद और विश्वास के साथ महिलाओं ने बीजेपी को वोट किया उन्नाव प्रकरण ने एक झटके से उसे धूमिल कर दिया। वह महिला जो बेटी के सम्मान में-भाजपा मैदान में नारे सुनकर एक विश्वास से भर उठती थी, उसे अब लगने लगा है कि सत्ता और राजनीति का चरित्र एक ही समान है। नैतिकता की दुहाई देने वाले सत्ता मिलते ही अपराध और अपराधियों को बचाने के लिए तरह-तरह के तर्क गढ़ने लगते हैं। शुक्रवार को उन्नाव प्रकरण, बीजेपी सरकार के रवैए पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गढ़ में रहने वाली महिलाओं-युवतियों से पत्रिका ने बात की। विपक्ष से सत्ता में आने के बाद राजनैतिक दलों के बदलते चाल-चरित्र से आधी आबादी काफी आहत दिखीं। इनका मानना था कि महिलाओं के सम्मान और हक की बातें केवल सेमीनार या सम्मेलनों में न होकर हकीकत में अगर सरकारें करने लगे तो आजाद भारत में महिलाएं भी खुद को आजाद समझने लगेंगी।

शिक्षिका निक्कू त्रिपाठी का मानना है कि उन्नाव जैसी घटनाएं केवल सरकारों की असंवेदनशीलता से होती हैं। कोई भी व्यक्ति चाहे वह सांसद-विधायक या मंत्री या नौकरशाह की क्यों न हो वह कानून से बड़ा नहीं हो सकता। जब भी कोई खुद को कानून से बड़ा समझता है उसे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सत्ता का वरदहस्त जरूर प्राप्त होता। सरकारों को भी सोचना पड़ेगा कि जिस जनता ने उसे चुना है, उसके प्रति उसकी जवाबदेही बनती है लेकिन सत्ता हासिल होते ही जनता को सब भूल जाते हैं। उन्होंने कहा कि उन्नाव की घटना में एक पीड़िता न्याय की गुहार लगाती है और सरकार पीड़िता को न्याय दिलाने की बजाय आरोपी विधायक को बचाने में लग जाती है सिर्फ इसलिए कि वह उसकी पार्टी का है। औरत के सम्मान की बात करने वाली पार्टी की सरकार में जब इस तरह की घटनाएं होती हैं तो वह बेहद शर्मनाक होता। जनता केवल जनप्रतिनिधि नहीं चुनती, सरकारें नहीं बनवाती बल्कि अपना अभिभावक भी चुनती है। लेकिन सरकार अपने परिवार की रक्षा नहीं कर सकती तो इससे अधिक शर्म की बात क्या हो सकती।

प्रधानाचार्या रूपाली श्रीवास्तव कहती हैं कि इस घटना और सरकार की कार्यप्रणाली की जितनी भी निंदा की जाए वह कम है। बेहद अफसोसनाक घटना है। ऐसी घटनाओं में फांसी से कम की सजा का प्राविधान नहीं होना चाहिए। भारत देश में कानून केेसाथ खेलने की छूट किसी को भी नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहाकि हम मुस्लिम देशों की बुराई करते हैं लेकिन वहां के कानून से सीख लेने की भी जरूरत है। वहां गंभीर मामलों में कड़ी सजा का प्राविधान है। उन्नाव जैसी घटनाएं मुस्लिम देशों में होते हैं तो वहां फांसी से कम सजा नहीं होती। महिलाओं की सुरक्षा की बात तो होती है लेकिन विपक्ष में रहते हुए ही राजनैतिक दल ऐसी बातें करते हैं। सत्ता मिलते ही उनको महिला सुरक्षा के लिए कही जा रहीं बातें भूल जाती हैं। समाज में हर ओर महिला हिंसा, शोशण की घटनाएं सामने आती हैं लेकिन अधिकतर मामलों में अपराधी छूट जाते हैं। ऐसे मामलों में बहुत सी घटनाएं दबा दी जाती हैं। वह कहती हैं कि पीड़ितों को भी आगे आना होगा, हम महिलाओं कोे भी ऐसी पीड़िताओं का साथ देना होगा। हर सरकार को ऐसी घटनाओं के प्रति सख्त रवैया होना चाहिए। समाज में महिलाएं सबसे अधिक असुरक्षित हैं। नेताओं का क्या वह तो अपने परिवार के लोगों को बंदूकों के साए में लेकर चलते हैं और दूसरों की बहू-बेटियों पर बुरी नजर रखते। कानून सबके लिए बराबर होना चाहिए। उन्नाव कांड में सरकार को त्वरित कार्रवाई करनी चाहिए थी ताकि आम आदमी को कानून के राज का एहसास हो सकता।

छात्रा दीपिका त्रिपाठी कहती हैं कि विधायक हो या आम इंसान, कानून सबके लिए बराबर है। भारतीय संविधान में सबको बराबरी का दर्जा मिला हुआ है। एक दुश्कर्म पीड़िता सरकार से गुहार लगाती है और उसको न्याय नहीं मिल पाता। आखिर ऐसी कौन सी परिस्थिति सरकार के सामने खड़ी हो जाती है कि वह कार्रवाई करने में भेदभाव करती है। एक विधायक के आगे क्यों कानून बौना साबित हो जाता। वह सवाल करती हैं कि क्या सिर्फ इसलिए आरोपी विधायक का सरकार साथ दे रही थी कि वह उसकी पार्टी का था। सत्ताधारी दल से ताल्लुक रखना या जाति का होना ही क्या किसी को कानून से बड़ा बना सकता है। उन्होंने कहा कि वह महिला किसी के घर की हो सकती थी। महिलाओं केे सम्मान की बात करने वाले आखिर सत्ता में आते ही बदल कैसे सकते हैं। विपक्ष में रहकर बातें करने वाले सत्ता पाने के बाद अपनी बातें आखिर कैसे भूल जाते हैं। जिस देश में नारी की पूजा और सम्मान की बात होती है उसी देश में नारी न्याय के लिए भटकती रहती है और सरकार आरोपी को बचाने खातिर तरह तरह के जतन करती है, क्या यह न्यायसंगत है। कानून तो सबके लिए समान है। सजा देने या कार्रवाई करने में अगर भेदभाव होने लगे तो आमजन कैसे न्याय पा सकेगा।

शिक्षिका निवेदिता कहती हैं कि एक महिला को भी हमारे संविधान ने समान अधिकार ही दिए हैं। लेकिन यह बहुत की पुरानी समस्या है कि सरकारें कानून का पालन करने में भेदभाव करती हैं। एक पीड़िता गुहार लगाती है लेकिन उसको न्याय नहीं मिलता सिर्फ इसलिए क्योंकि आरोपी विधायक हैं और सत्ता उनकी है। कानून किसी से भेदभाव नहीं करता लेकिन सरकारें ऐसा करवाती हैं। सामान्य सी बात है कि पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए सबसे पहले आरोपी के खिलाफ एफआईआर होना चाहिए था। फिर जांच के बाद तय होता कि सच्चाई क्या है। लेकिन पीड़िता को न्याय दिलाने की बजाय एकतरफा स्टैंड लिया जा रहा था। उन्होंने कहा कि आखिर न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद कार्रवाई शुरू हुई। यह कार्रवाई तो पहले ही होनी चाहिए थी। न्याय की लड़ाई में महिला ने अपने पिता को खो दिया। अगर कार्रवाई में देर नहीं की जाती तो शायद पीड़िता के पिता जीवित होते। क्या किसी को अहसास भी है कि पीड़िता ने अपनी लड़ाई में परिवार के मुखिया को खो दिया है। न्याय के लिए उसने जो कीमत चुकाई है उसकी भरपाई कैसे हो सकेगी। जनता हर बार उम्मीद और विश्वास के साथ एक सरकार चुनती है। लेकिन सत्ता पाने के बाद सभी एक ही रंग में रंग जाते हैं। आम आदमी कैसे फर्क महसूस करे। वह कैसे विश्वास करे कि वह जो सरकार चुन रहे उसमें कानून सबके लिए एकसमान होगा।