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Gandhi Jayanti Special चौरीचौरा कांड से इतना विचलित हुए बापू कि गोरों को उखाड़ फेंकने वाले आंदोलन को ही स्थगित कर दिया था

गांधी जयंती विशेष

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Mahatma Gandhi

Mahatma Gandhi

भारत में विदेशी उपनिवेश को खत्म करने के लिए बापू ने देश में असहयोग आंदोलन छेड़ दिए। लेकिन गोरखपुर के चौरीचौरा कांड ने महात्मा गांधी को झकझोर कर रख दिया। वह विचलित हो गए, हिंसा की वजह से दिशाहीनता की ओर जाने लगे आंदोलन से भारतीयों को बचाने के लिए उन्होंने असहयोग आंदोलन को स्थगित करने का निर्णय लिया। बापू के इस निर्णय से सब निराश हुए, बहुत आग्रह हुआ लेकिन उनका फैसला अटल था।

असहयोग आंदोलन से हिल चुका था अंग्रेजी नींव

यह 1914-18 का दौर था जब पूरा देश बापू के आह्वान पर रॉलेट एक्ट के विरोध में खड़ा हो गया। हालांकि, अंग्रेजी हुकूमत ने एक्ट को और कड़ाई से लागू किया। देश में कई जगह हिंसा हुई लेकिन आंदोलन की धार कम न हुई।
रॉलेट एक्ट के खिलाफ सत्याग्रह से पूरे देश को एक धागे में पिरोने में महात्मा गांधी सफल हो रहे थे। उनके एक आह्वान पर देश जीने मरने लग रहा था। बापू अहिंसात्मक रूप से ब्रिटिश औपनिवेश को खदेड़ने में लग गए। उन्होंने पूरे देश से गोरों और सरकार के खिलाफ असहयोग की मांग रख दी। 1 अगस्त 1920 से देश भर में असहयोग आंदोलन शुरू हो गया।महात्मा गांधी ने आह्वान किया कि असहयोग आंदोलन के तहत भारतीय अपने सभी संबंधों को अंग्रेजों से तोड़ लेंगे। स्कूल, कॉलेज, दफ्तर, न्यायालय नहीं जाएंगे। हम कर भी कोई नहीं चुकाएंगे। किसी प्रकार का सहयोग उपनिवेश को नहीं करेंगे। बापू का मानना था कि एक साल तक यह जारी रहा तो अहिंसात्मक रूप से उपनिवेशवाद का भारत से खात्मा कर देंगे। अंग्रेजी लेखक लुई फिशर ने लिखा है कि 1857 के ग़दर के बाद यह अंग्रेजी नींव हिलाने वाला पहला आंदोलन था।
बताया जाता है कि अंग्रेजी उपनिवेश की स्थिति खराब होने लगी।

चौरीचौरा कांड से विचलित हुए गांधी, स्थगित किया आंदोलन

चौरीचौरा आजादी की लड़ाई का प्रमुख पड़ाव रहा। 1922 में आंदोलित किसानों को चौरीचौरा में पुलिस वालों ने रोकने की कोशिश की। 4 फरवरी 1922 को किसानों-व्यापारियों के इस आंदोलन को रोकने के लिए अंग्रेजों ने बल प्रयोग किया। अंग्रेजों की गोली से कई किसान ढेर हो गए। इसके बाद भीड़ का सब्र जवाब दे गया। लोगों ने चौरीचौरा थाने में आग लगा दी। इसमें थानेदार गुप्तेश्वर सिंह समेत डेढ़ दर्जन से अधिक पुलिसवाले जिंदा जला दिए गए। आंदोलन और हिंसक हो गया, देश के दूसरे हिस्सों में इसका असर देखने को मिला।
महात्मा गांधी को जब यह जानकारी हुई तो वह अपने असहयोग आंदोलन को स्थगित करने का निर्णय सुनाए।

चौरीचौरा कांड में 172 आंदोलनकारियों को फांसी की सजा सुनाई

अंग्रेजी हुकूमत ने इस आंदोलन में शामिल भगवान अहीर समेत 172 आंदोलनकारियों को इस घटना का दोषी करार दिया था। 9 जुलाई 1922 को सेशन कोर्ट ने 172 आंदोलनकारियों को फांसी की सजा सुनाई थी। पूरा देश इस सजा से हिल गया था। उच्च न्यायालय में अपील के लिए एक मजबूत अधिवक्ता की जरूरत थी। स्थानीय अधिवक्ताओं केएन मालवीय, गोकुल दास, डीएन मालवीय, केसी श्रीवास्तव, एपी दुबे ने हाईकोर्ट में अपील के लिए महामना मदन मोहन मालवीय से अनुरोध किया। महामना इसके लिए सहर्ष राजी हो गए। 6 मार्च 1923 को हाईकोर्ट में याचिका दायर हुई। महामना ने मजबूती से क्रांतिकारियों के पक्ष में पैरवी कर रहे थे। पूरे देश की निगाहें इस बड़ी घटना पर आने वाले फैसले पर टिकी हुई थी। महामना ने भी जोरदार पैरवी की। नजीतन यह कि अंग्रेजी हुकूमत को भी उनके आगे झुकना पड़ा और 156 लोग फांसी से बच गए। हालांकि, 19 क्रांतिवीर फांसी पर चढ़ा दिए गए।


गांधी जी के निर्णय से सब खुश नहीं थे...

महात्मा गांधी ने चौरीचौरा कांड से विचलित हो असहयोग आंदोलन स्थगित कर दिया। लेकिन उनके निर्णय से युवा क्रांतिकारी खुश नहीं थे। उनका मानना था कि देश का जोश चरम पर पहुंच रहा, आजादी की लड़ाई के लिए यह बेहद खास है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आंदोलन स्थगित करने के निर्णय की आलोचना की। यह कांड वैचारिक रूप से कांग्रेस को दो फांक कर दिया एक नरम दल जिसके नायक वे लोग थे जो अहिंसात्मक रूख के हिमायती थे। दूसरा गरम दल जिसमें भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, राम प्रसाद बिस्मिल, राजगुरु, सुखदेव जैसे युवा थे। दोनों ने अपनी लड़ाइयों को जायज ठहराया और देश के लिए सर्वस्व न्योछावर किया।


मालवीय जी के भतीजे और गांधी जी के पुत्र ने तैयार की रपट


चौरीचौरा कांड के बाद अंग्रेजी हुकूमत का जुल्म बढ़ गया। स्थानीय लोगों पर बेवजह जुल्म ढाए जाने लगे। कांग्रेस ने बापू की सहमति पर इसकी जांच के लिए एक समिति को भेजने का निर्णय लिया जो हकीकत पता कर सके। इसके लिए महामना के भतीजे सीके मालवीय व महात्मा गांधी के पुत्र देवधर गांधी को चौरीचौरा भेजने का फैसला हुआ। फिर ये लोग आए। यहां के लोगों से, पीड़ितों से मिले। एक रिपोर्ट तैयार की गई। इस रिपोर्ट में अंग्रेजी जुल्म की कहानी बयां थी।


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