
प्रदेश से लेकर देश की राजनीति में अपनी अलग छाप छोड़ने वाली राजमाता विजयाराजे सिंधिया के प्रयासों से 1957 में पहली बार मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की ओर से 34 महिलाएं चुनाव जीती थीं। 1962 में भी लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ हुए। इस बार राजमाता ने ग्वालियर लोकसभा से चुनाव लड़कर फतह हासिल की थी। इतिहास के जानकार नूरूल हसन नूर बताते हैं कि उस चुनाव के समय गुना जिले में कांग्रेस, हिंदू महासभा, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी सक्रिय थीं। गुना में जिला अस्पताल बन चुका था। हायर सेकंडरी स्कूल में शिक्षा जारी थी लेकिन शहर की सड़कें कच्ची थीं। शाम को नगरपालिका की बैलगाड़ी से छिड़काव होता था, तब जाकर धूल के गुबार से थोड़ी राहत मिलती थी। शाम के वक्त उजाला करने के लिए खंबों पर लालटेन जलाए जाते थे। 1962 के चुनावों में मध्यप्रदेश में पहली मर्तबा कांग्रेस में जबर्दस्त गुटबाजी का जन्म हुआ। इसी चुनाव में जनसंघ ने अपनी स्थिति मजबूत की। कांग्रेस 232 सीटों से खिसककर 142 सीटों पर आ गई। मुख्यमंत्री कैलाशनारायण काटजू के चुनाव हारने के कारण भगवंतराव मंडलोई को विधायक दल का नेता चुना गया। वे भी बमुश्किल डेढ़ साल टिक पाए इसके द्वारकाप्रसाद मिश्र ने प्रदेश की कमान संभाली। सबसे पहली सभा उन्होंने ग्वालियर में की जहां राजमाता सिंधिया ने उनका भावभीना स्वागत कर यह संदेश दिया कि द्वारका प्रसाद मिश्र के मुख्यमंत्री बनने के बाद क्षेत्र में विकास की गति तेज होगी।
1962 के चुनावों में गुना जिले की पांच विधानसभाओं में चुनाव हुए। जिसमें दो कांग्रेस, एक हिंदू महासभा, एक प्रजा सोशलिस्ट और एक सीट निर्दलीय के खाते में गई। गुना विधानसभा सीट पर 1967 में 30,193 वोटरों ने भाग लिया। तीन प्रत्याशी मैदान में उतरे। पूर्व विधायक वृंदावन प्रसाद तिवारी हिंदू महासभा से प्रत्याशी बने। कांग्रेस ने एक बार फिर सीताराम ताटके को उम्मीदवार बनाया। नाथूलाल मंत्री ने जनसंघ के प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा। वृंदावन प्रसाद तिवारी ने कांग्रेस के सीताराम ताटके को 1964 वोटों से हरा दिया। चांचौड़ा सीट से सात उम्मीदवार खड़े हुए थे। कुल 24,887 वैद्य मतों की गिनती में निर्दलीय प्रभुलाल ने कांग्रेस के रमनलाल प्रेमी को 2581 वोट से हराया था। आश्चर्यजनक रूप से हिंदू महासभा के प्रत्याशी रामलाल सबसे आखिर रहे। जनसंघ के कृष्णवल्लभ तीसरे और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के रामेश्वर सिंह पांचवें नंबर पर रहे थे।
(जैसा इतिहास के जानकार नूरूल हसन नूर ने पत्रिका को बताया)
तब अशोकनगर सामान्य सीट थी
राघौगढ़ सुरक्षित से पांच प्रत्याशी चुनाव लड़े। कांग्रेस से दुलीचंद, हिंदू महासभा से मातादीन, जनसंघ से प्रभु के अलावा दो अन्य निर्दलीय प्रत्याशियों ने किस्मत आजमाई। 17,916 की वोटिंग में दुलीचंद 2697 वोट से जीते। अशोकनगर से 7 उम्मीदवार चुनाव लड़े। तब अशोकनगर सुरक्षित सीट नहीं थी। दो सदस्य चुने जाने की व्यवस्था खत्म हो गई। कांग्रेस से रामदयाल, कम्यूनिस्ट पार्टी से शांतिलाल, हिंदू महासभा से राजधर सिंह और जनसंघ से चिमनलाल मैदान में थे। कुल 27,512 की वोटिंग में कांग्रेस के रामदयाल सिंह ने निर्दलीय रामस्वरूप को 1713 वोट से हराया। कम्यूनिस्ट तीसरे, जनसंघ पांचवें और हिंदू महासभा के प्रत्याशी आखरी नंबर पर रहे। मुंगावली से 5 प्रत्याशी चुनाव लड़े। कांग्रेस से चंदन सिंह, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से चंद्रभानसिंह, हिंदू महासभा से खलक सिंह के अलावा दो प्रत्याशी निर्दलीय लड़े। चंद्रभानसिंह ने कांग्रेस के चंदन सिंह को हराया।
Published on:
04 Nov 2023 10:09 am
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