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पत्रिका एक्सपोज : यह है गुना का खैराती जिला अस्पताल, जहां गरीब मरीज को भी पट्टा चढ़वाने देने पड़ते हैं 400 रुपए

ऑपरेशन के लिए भेजते हैं प्राइवेट अस्पतालब्लड सैंपल लेने वाला कोई नहीं, मरीज भटकता है इधर से उधरभर्ती मरीज को न पलंग न चादर

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पत्रिका एक्सपोज : यह है गुना का खैराती जिला अस्पताल, जहां गरीब मरीज को भी पट्टा चढ़वाने देने पड़ते हैं 400 रुपए

जिला अस्पताल के ट्रॉमा सेंटर की यह एक तस्वीर स्वास्थ्य सुविधाओं की जमीनी हकीकत बताने के लिए लिए पर्याप्त है। जिसमें मरीज फर्श पर है। उसे न चादर मिली है और न बॉटल चढ़ाने स्टैंड है। मरीज के पास रखे जांचों के पर्चें बता रहे हैं कि यह अस्पताल सरकारी है लेकिन जांचें प्राइवेट में ही करानी पड़ती हैं।

गुना. गरीब व जरुरतमंदों को इलाज मिलने में आर्थिक परेशानी बाधा न बनें, इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार ने जिला मुख्यालय पर 400 बिस्तरीय खैराती जिला अस्पताल की स्थापना की है। जहां डॉक्टर्स के वेतन सहित आवश्यक संसाधनों पर लाखों रुपए का बजट खर्च किया जा रहा है। इसके बावजूद गरीब मरीजों को निशुल्क इलाज नहीं मिल रहा है। उन्हें भर्ती होने के दौरान भी कई तरह की परेशानियों से जूझना पड़ रहा है। यहां तक कि उन्हें जरूरी जांच कराने से लेकर पट्टा तक बाजार से खरीदकर लाना पड़ रहा है। यह जमीनी हकीकत पत्रिका पड़ताल में सामने आई है।
यहां बता दें कि सोमवार को स्वस्थ्य मंत्री प्रभुराम चौधरी ने गुना जिला अस्पताल की स्वास्थ्य सुविधाओं की हकीकत जानने के लिए अस्पताल प्रबंधन से बात की। जिसके बाद उन्होंने अपने हिसाब से वीडियो कॉल के माध्यम से मरीजों से बातचीत करवाई, जिसमें सब कुछ वही सामने आया जो वह चाहता था। यानी कि किसी भी मरीज ने अस्पताल में मिलने वाली स्वास्थ्य सुविधाओं व व्यवस्थाओं में कमी नहीं बताई। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि यहां सब कुछ ठीक चल रहा है। यह जमीनी हकीकत जनता और प्रशासन के समक्ष लाने के लिए पत्रिक टीम ने मंगलवार को जिला अस्पताल के मेडिकल, सर्जिकल, अर्थोपेडिक (हड्डी), ट्रॉमा केंयर सेंटर में भर्ती कई मरीजों से चर्चा की। जिसमें सामने आया कि जो कुछ स्वास्थ्य मंत्री को बताया गया था, वह पूरा सच नहीं है।
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भर्ती मरीजों की जुबानी अस्पताल की कहानी
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6 हजार में हुई सीटी स्कैन और सोनोग्राफी
मुझे पेट दर्द की शिकायत है। डॉक्टर ने देखने के बाद सोनोग्राफी और सीटी स्कैन तथा ब्लड से संबंधित कई जांचें लिख दीं। जब उनसे पूछा गया कि यह सब अस्पताल में ही फ्री हो जाएंगी, तब उन्होंने कहा कि यह जांचें बाजार में ही प्राइवेट अस्पताल व पैथोलॉजी पर ही कराना पड़ेंगी, क्योंकि उनका ही रिजल्ट सही रहता है। इस तरह सीटी स्कैन में 6 हजार और सोनोग्राफी में एक हजार का खर्च आया। भर्ती हुए 6 दिन हो गए। अब डॉक्टर ऑपरेशन करने की बात कह रहे हैं। लेकिन इसमें कितना खर्च आएगा यह सोचकर चिंतित हैं।
खुशबू, मरीज
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ब्लड सैंपल लेने वाला कोई नहीं, जाऊं तो कहां
मेरी बेटी को हर दो माह में खून चढ़ता है। जिसके लिए उसे मेडिकल वार्ड में भर्ती कराया गया है। डॉक्टर ने खून चढ़वाने के लिए लिख दिया है। लेकिन न तो वार्ड की नर्सें ब्लड सैंपल निकाल पा रही हैं और न ही ब्लड बैंक स्टाफ खून निकाल रहा है। नर्सों के कहने पर वह बेटी को लेकर ब्लड बैंक पहुंची तो उन्होंने यह कहकर वापस कर दिया कि ब्लड सैंपल वार्ड ेंमें ही निकलवाकर लाओ। मरीज की हालत चलने लायक नहीं है, ऐेसे में समझ नहीं आ रहा मैं किसके पास जाऊं।
नारायण बाई, मरीज अटैंडर
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400 रुपए दिए तब जाकर चढ़ाया पट्टा
मैं पेशे से कारीगर हूं। मकान बनाते समय दीवार गिर गई। जिससे मेरी रीढ़ की हड्डी व पैर बुरी तरह फ्रेक्चर हो गए। मुझे जिला अस्पताल में इलाज के लिए लाए तो माइनर ओटी में मौजूद स्टाफ ने कहा कि पट्टा चढ़वाना है तो पूरा सामान बाहर से लाना पड़ेगा। मेरी स्थिति बहुत खराब थी, ऐेसे में मजबूरी वश 400 रुपए उधार लेकर पट्टा चढ़वाने सामान लाया तब जाकर पट्टा चढ़ाया गया। अब डॉक्टर कह रहे हैं कि ऑपरेशन कराने प्राइवेट अस्पताल साक्षी में चले जाओ। क्योंकि हमारे यहां ऑपरेशन की कोई सुविधा नहीं है। परिवार वाले यह सोचकर चिंतित हैं कि जब सरकारी में ही पट्टा चढ़वाने बाजार से सामान लाना पड़ा तो प्राइवेट में पता नहीं कितना पैसा लगेगा।
धर्मराज जाटव, मरीज
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जयस्तंभ चौराहा से घर जाते समय मुझे सीने में दर्द हुआ तथा चक्कर आए। गाड़ी रोककर भाई को फोन कर बताया। वे मुझे डॉक्टर के पास ले गए। जहां उन्होंने सभी जांचें प्राइवेट में करवा कर सरकारी अस्पताल में भर्ती करा दिया। लेकिन अगले दिन तक वह देखने नहीं आए। उन्होंने किसी जूनियर को भेज दिया। जांच रिपोर्ट आने के बाद दिखाने डॉक्टर की निजी क्लीनिक पर ही जाना पड़ा। अस्पताल में भर्ती और जांचों की सही सुविधा नहीं है।
राजेश, मरीज
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मेरे बच्चे को खेत पर करंट लग गया था। इमरजेंसी में जो डॉक्टर मिले उन्होंने बर्न वार्ड में भर्ती करा दिया। इसके बाद जो डॉक्टर आए वह ईसीजी की जांच एक पर्चे पर लिखकर चले गए। यह पर्चा लेकर हम गए तो वहां के स्टाफ ने कहा कि इस पर डॉक्टर के साइन नहीं हैं। जब डॉक्टर को ढूंढा तो पता चला कि वे जा चुके हंै। कहा जा रहा है कि लंच के बाद आएंगे।
राजीव, मरीज अटैंडर