scriptMonday Mega Story: Even after spending lakhs, the district's health is | मंडे मेगा स्टोरी : लाखों खर्च के बाद भी सुधरने को तैयार नहीं है जिले का बिगड़ा स्वास्थ्य | Patrika News

मंडे मेगा स्टोरी : लाखों खर्च के बाद भी सुधरने को तैयार नहीं है जिले का बिगड़ा स्वास्थ्य

-गांवों में नहीं जा रहे डॉक्टर, मरीजों को नहीं मिल रहा इलाज
बगैर डिग्री धारियों के हाथों में जिंदगी
बगैर मान्यता के चल रहे हैं निजी अस्पताल, हर बार कार्रवाई के नाम पर केवल रस्म अदायगी

गुना

Updated: January 17, 2022 01:44:53 pm

गुना। लाखों रुपए का बजट मिलने के बाद भी न तो शहर का स्वास्थ्य सुधरने को तैयार है और न ही ग्रामीण क्षेत्र का। कोरोना संक्रमण काल बढ़ रहा है। शहर के साथ-साथ गांवों में भी कोरोना के मरीज निकल रहे हैं। इसके बाद भी जिले के अधिकतर गांवों में न तो डॉक्टर ड्यूटी पर जा रहे हैं, न ही वहां जाने वाले मरीजों को इलाज मिल पा रहा है। जिले के सरकारी अस्पताल में भी मरीजों को इलाज नहीं मिल पा रहा है। बमौरी का विशनवाड़ा एक ऐसा क्षेत्र है जहां दो डॉक्टर हैं, इलाज करना तो दूर ड्यूटी पर प्रतिदिन भी नहीं जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टर और स्वास्थ्य विभाग के अमला द्वारा पदस्थी जगह न ह जाने से उन मरीजों को मजबूरन बगैर डिग्री धारी डॉक्टरों के पास और निजी अस्पताल में जाना पड़ रहा है,जहां इलाज के नाम पर मरीजों को जमकर लूटा जा रहा है। गांव के साथ-साथ शहर में भी निजी अस्पतालों में मान्यता शर्तों के आधार पर कलेक्टर जांच करा लें तो कई निजी अस्पताल बंद हो सकते हैं। हाल ही में जिला स्वास्थ्य अधिकारी को अपने निरीक्षण के दौरान बीनागंज में एक छोटे से कमरे में पांच बेड डले हुए मिले थे, जहां एमबीबीएस की जगह 12 वीं पास नर्सिंग स्टॉफ इलाज करता हुआ मिला है।
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मंडे मेगा स्टोरी : लाखों खर्च के बाद भी सुधरने को तैयार नहीं है जिले का बिगड़ा स्वास्थ्य
मंडे मेगा स्टोरी : लाखों खर्च के बाद भी सुधरने को तैयार नहीं है जिले का बिगड़ा स्वास्थ्य

इलाज के नाम पर दूसरी बीमारियां
कोरोना की तीसरी लहर में जहां लोग डरे हुए हैं, वहीं दूसरी ओर सरकारी अस्पताल में पदस्थ होकर हजारों रुपए का वेतन लेने वाले डॉक्टर मरीजों को देखना तक पसंद नहीं कर रहे हैं। जिसकी वजह से ग्रामीण क्षेत्रों में सक्रिय बगैर डिग्री धारी (झोला छाप) डॉक्टरों की दुकानें चल निकली हैं।वे जुकाम-खांसी और मामूली बुखार होने पर कोरोना का डर बताकर इलाज के नाम पर मनमाना पैसा वसूल ही नहीं रहे बल्कि उनकी जिदंगी को खतरे में डालने से भी नहीं चूक रहे हैं।
यहां देखा जा सकता है इलाज करने का नजारा
जहां कोरोना की तीसरी लहर और मौसम में उतार-चढ़ाव आने-जाने से सर्दी-जुकाम व ुबुखार जैसी कई बीमारियों की चपेट में लोग आते जा रहे हैं। शहर और गांव में कई ऐसे घर हैं जहां के अधिकतर लोग वायरल की चपेट में है। इसके चलते शहर और गांव में फैले झोला छाप डॉक्टरों की बन आई है, जो बगैर डिग्री के मरीजों का इलाज कर रहे हैं। इलाज किए जाने का नजारा बजरंगगढ़, कुसमौदा, बूढ़े बालाजी, कैंट के अलावा आरोन, राघौगढ़, चांचौड़ा, बीनागंज, कुंभराज, बजरंगगढ़, हड्डी मिल, बमौरी, झागर, फतेहगढ़ में प्रतिदिन देखा जा सकता है। वायरल आने पर कई लोग कहीं कोरोना न निकल जाए , इसके लिए मेडिकल स्टोर से भी दवाई लेकर ठीक होने का काम कर रहे हैं।
जिले भर में एक हजार से अधिक बगैर डिग्रीधारी डॉक्टर सक्रिय
सूत्र बताते हैं कि मौजूदा समय में स्वास्थ्य विभाग में सौ भी डॉक्टर्स रजिस्टर्ड नहीं हैं। इसके अलावा शहर सहित जिले की 425 पंचायतों के करीब 1338 गांवों में एक हजार से अधिक झोलाछाप डॉक्टर सक्रिय हैं। जो खुलेआम अपना क्लीनिक संचालित कर रहे हैं। जानकारी के अभाव में यह झोलाछाप डॉक्टर ग्रामीण मरीज को गलत दवा देकर उसके स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर रहे हैं। ऐसे कई मामले भी सामने आए हैं जब गलत इलाज की वजह से मरीज की मौत भी हो चुकी है। यही नहीं मामला थाने तक जा पहुंचा है।कुछ समय पूर्व कैंट क्षेत्र में एक बच्चे की जान बगैर डिग्री धारी डॉक्टर ने ले ली थी। इसके बावजूद प्रशासन झोलाछाप डॉक्टर्स पर अंकुश नहीं लगा पाया है।
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कार्रवाई सिर्फ नोटिस तक सीमित
झोलाछाप डॉक्टर्स पर कार्रवाई करने सुप्रीम कोर्ट कई साल पहले शासन को आदेशित कर चुका है। इसी क्रम में शासन भी प्रशासन को लिखित में आदेशित कर चुका है। प्रशासन ने कार्रवाई को लेकर लिखित आदेश स्वास्थ्य विभाग को दे दिए लेकिन आज तक धरातल पर कार्रवाई नहीं हो सकी है। हर साल स्वास्थ्य विभाग एक टीम गठित करता है, यह टीम कार्रवाई करने जाती भी है लेकिन अधिकांश मौकों पर खाली हाथ ही लौट आती है। कई बार सिर्फ झोलाछाप डॉक्टर्स को नोटिस देकर ही कार्रवाई की इतिश्री समझ ली जाती है। इसी तरह का सिलसिला लगातार जारी है।
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यह है झोलाछाप की श्रेणी
सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन के मुताबिक वह डॉक्टर जो स्वास्थ्य विभाग में रजिटर्ड नहीं हैं। जिनके पास इलाज करने की उपयुक्त डिग्री या डिप्लोमा नहीं है। यही नहीं वे डॉक्टर भी झोलाछाप की श्रेणी में आते हैं जो अपनी पैथी छोड़ दूसरी पैथी में मरीज का इलाज करते हैं। जैसे कि ऐलोपैथिक डॉक्टर आयुर्वेद की दवा नहीं लिख सकता तो वहीं आयुर्वेदिक डॉक्टर ऐलोपैथिक दवा नहीं लिख सकता है।
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क्लीनिक पर न पंजीयन न डिग्री चस्पा
नियमानुसार क्लीनिक चलाने के लिए न सिर्फ सीएमएचओ कार्यालय में पंजीयन होना अनिवार्य है। बल्कि क्लीनिक में पंजीयन नंबर सहित उपयुक्त योग्यता के दस्तावेज चस्पा होना जरूरी है। लेकिन जिला मुख् यालय पर ही सैकड़ों क्लीनिक ऐसी चल रही हैं जहां कोई भी जरूरी सूचना अंकित तक नहीं है।
अस्पताल की ओपीडी में बढ़ी मरीजों की भीड़
वायरल जैसी बीमारियों के बढऩे से मरीजों की भीड़ जिला अस्पताल की ओपीडी में बढ़ रही है। लेकिन उनको फिलहाल डॉक्टरों ने देखना बंद सा कर दिया है। सो कई मरीज वापस लौटकर या तो निजी अस्पताल पहुंच रहे हैं या अपने घर के नजदीक स्थित बगैर डिग्री धारी डॉक्टर के यहां जा रहे हैं।
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निजी अस्पतालों में गड़बडिय़ां आईं सामने
स्वास्थ्य विभाग के अफसरों की निष्क्रियता से निजी अस्पतालों की भरमार आ गई है, इनमें अधिकतर के पास मान्यता तक नहीं हैं। पिछले दिनों कलेक्टर ने ऐसे निजी अस्पतालों की जांच करने की स्वास्थ्य विभाग को निर्देश दिए तो कई गड़बडिय़ां खुलकर सामने आने लगी हैं। हाल ही में जिला स्वास्थ्य अधिकारी डा. पी. बुनकर बीनागंज क्षेत्र में गए थे वहां जांच-पड़ताल की तो वहां के तीन निजी अस्पतालों में गड़बडिय़ां मिली थीं, बीनागंज में संचालित मीनेश हॉस्पिटल बगैर मान्यता के चलता मिला। बाधवानी हॉस्पिटल में फार्मा की डिग्री लेने वाला एक मरीज का इलाज करता हुआ मिला। न स्टॉफ का पंजीयन था और न ही कोरेाना की गाइड लाइन का पालन होता मिला। बीनागंज में ही नाव्या हॉस्पिटल में भी गड़बड़ी मिली, जहां के न तो स्टाफ का पंजीयन तक नहीं था और न इलाज कराने के लिए निर्धारित योग्यता। इसके अलावा बीएएमएस डॉक्टर डा. प्रदीप सिंह मीना जांच टीम को मिले।

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