
श्रीमद्भागवत कथा: सांख्य शास्त्र में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में त्रिगुणमयी माया के 24 तत्व जबकि 25वां तत्व स्वयं नारायण स्वरूप
राघौगढ़। भागवत प्रेम-लक्षण-भक्ति का महान ग्रंथ है और सेवा समर्पण ही भक्ति का मूल भाव है, यह बात रुठियाई स्थित कर्माखेड़ी में श्रीमद भागवत कथा के दौरान कृष्ण भक्ति की महिमा बताते हुए कथा वाचक पं. शिवदयाल भार्गव ने कही। इस दौरान उन्होने सुखदेव, राजा परीक्षित और भरत की कथाओं का भी उल्लेख किया।
मंगलवार को कथा के दौरान पं. शिवदयाल भार्गव ने कहा कि सुखदेव महाराज ने परीक्षित से कहा था कि सांख्य शास्त्र में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में त्रिगुणमयी माया के 24 तत्व व्याप्त हैं, जबकि इसमें 25वां तत्व स्वयं नारायण स्वरूप है। इस दौरान उन्होंने कहाकि सभी समस्याओं का निराकरण धर्म सिंधु एंव निर्णय सिंधु है।
24 तीर्थंकर में प्रथम तीर्थंकर...
उन्होंने कहा कि सनातन धर्म के 8वें अवतार भगवान ऋषभ देव हैं, जो जैन धर्म के 24 तीर्थंकर में प्रथम तीर्थंकर हैं। उन्होंने जैन धर्म के संतों की कठोर तपस्या बताते हुए कहा कि बरसात में वृृक्ष के नीचे और सर्दियों में नदी किनारे एवं गर्मियों में पत्थर पर बैठकर तपस्या करना भक्ति का अदभुद उदाहरण है।
कथा के दौरान पं. श्री भार्गव ने कहा कि भगवान ने अर्जुन से कहा था कि आत्म तत्व को शस्त्र, जल, अग्नि और वायु से नष्ट नहीं किया जा सकता, क्योंकि आत्मा ही परम सत्य है। उसका ज्ञान ही गीता का ज्ञान है और इसी में भागवत ज्ञान है। जिसने आत्म ज्ञान समझ लिया, वही प्राणी मात्र का कल्याण करता है।
उन्होंने कहा कि भक्ति को प्रबल बनाने की सत्संग की जरूरत है, ताकि भक्ति का भाव निरंतर बढ़ता रहे। उन्होंने कहा कि अगर हम निर्विवाद रूप से ईश्वर के रहस्य को समझना चाहते हैं, तो हमें वेद शास्त्रों का ज्ञान एवं सत्संग को समझने की जरूरत है,
लेकिन इस परिवेश में मनगढ़ंत व्याख्याएं हो रही है और शास्त्रों के आधे अधूरे श्लोकों की मनचाही व्याख्या करके भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो रही है। इस दौरान उन्होंने धु्रव चरित्र के माध्यम से प्रत्येक माता पिता के कर्तव्यों का उल्लेख किया, ताकि संस्कार और मानवता बनी रहे। कथा आयोजक देवेंद्र कुमार सोनी हैं।
इधर, त्याग की भावना सिखाता है हनुमानजी का जीवन चरित्र
वहीं दूसरी ओर गुना में गीता कथा के अंतिम दिन महाराज फारुख रामायणी ने उपस्थित श्रद्धालुओं से कहा कि हनुमानजी एक मानस के ऐसे पात्र हैं जो अपने संपूर्ण जीवन से सर्वप्रथम सुग्रीव को किष्किन्धा का महाराज तथा विभीषण को लंका का महाराज बना दिया। भगवान श्रीराम सरकार को अयोध्या के महाराज बना दिए।
उन्होंने आगे बताया कि हनुमानजी एक ऐसी त्याग की मूर्ति है जिनका जीवन लोगों को त्याग की भावना सिखाता है। कथा समापन पर समिति के सभी पदाधिकारियों व सदस्यों ने संतश्री की विदाई शॉल एवं श्रीफल भेंट कर दी।
Published on:
11 Dec 2019 12:40 pm
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