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गुना के आदिवासियों का छलका दर्द, कहा- महाराज! जानवर भी न पिएं ऐसा पानी

MP News: गुना जिला मुख्यालय से महज 45 किमी दूर आदिवासी एक नाले का दूषित पानी पी रहे हैं। उन्हें पानी पीने के लिए नदी किनारे गड्ढा खोदने को मजबूर होना पड़ रहा है। महिलाओं ने अपनी पीड़ा व्यक्त की।
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गुना

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Akash Dewani

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Updated: 7 Jan 2026, 11:11 AM IST

tribals of Guna forced to drink dirty water Indore contaminated water case mp news

tribals of Guna forced to drink dirty water (Patrika.com)

Indore contaminated water case: इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी पीने से हुई 17 मौतों के खौफनाक मंजर ने पूरे प्रदेश को हिला दिया है। लेकिन, गुना जिले के आदिवासी अंचलों में आज भी वैसी ही एक बड़ी त्रासदी आकार ले रही है। सरकार आदिवासियों के उत्थान के नाम पर हर साल करोड़ों रुपए पानी की तरह बहा रही है, पर हकीकत यह है कि इन परिवारों को पीने के लिए शुद्ध पानी की एक बूंद तक नसीब नहीं है।

बमौरी विधानसभा के सहरिया बाहुल्य गांवों में विकास के तमाम दावे उस मटमैले पानी में तैरते नजर आते है, जिसे इंसान तो क्या जानवर भी पीने से परहेज करें। यह वही बमौरी विधानसभा क्षेत्र है, जहां 22 हजार करोड़ रुपए के विकास कार्य कराने का दम भरा जाता है। लेकिन, धरातल पर सच्चाई इसके उलट है। जिला मुख्यालय से 45 किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत धानवाड़ी से होते हुए जब म्यापुर पठार और टांडा जैसे क्षेत्रों में पड़ताल की गई तो भयावह दृश्य सामने आए। (MP News)

पत्रिका ने की पड़ताल

पत्रिका टीम ने मंगलवार को गुना के ग्रामीण क्षेत्र में जाकर वस्तु स्थिति को देखा। ग्राम पंचायत धानवाड़ी से 10 किलोमीटर अंदर ग्राम म्यापुर में बहुतायत संख्या में आदिवासी-सहरिया परिवार निवास करता है। गांव के पास एक तालाब है जो गंदे पानी से लबालब था। यहां के लोग पीने का पानी एक किलोमीटर दूर लगे एक हैंडपंप से लाते है। यह हैंडपम्प अक्सर खराब हो जाता है। गांव से तीन किलोमीटर दूर म्यापुर पठार पर आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में पहुंचे तो वहां का नजारा और दृश्य काफी भयावह था। यहां गंदे नाले से पोखरों के जरिए पानी आ रहा था। इसके आसपास एक नहीं, चार झिर बनी थीं। यह झिर दो-ढाई फीट की थी, पानी बहुत गंदा था। म्यापुर पठार की महिलाओं ने काफी दुखी मन से कहा कि क्या करें साहब, झिर का पानी नहीं पीएं तो क्या करें? आश्वासन तो लंबे समय से हमे मिल रहा है, मगर कोई नहीं सुनता हमारी।

बहना के सिर पर दर्द का डिब्बा

आदत पड़ गई है जहर पीने की। साहब क्या करें? अगर इस झिर का गंदा पानी न पिएं तो प्यास से मर जाएंगे। जानवर भी इसी में मुंह मारते हैं। इसे पीकर अक्सर बीमार पड़ते हैं, तो कर्ज लेकर निजी अस्पतालों में इलाज कराते हैं। डर लगता है कि कहीं एक दिन यह पानी हमारी जान ही न ले ले। -सती बाई और जीराबाई, म्यापुर

हम तीस साल से इसी नदी के किनारे गड्ढे खोदकर प्यास बुझा रहे हैं। दो किलोमीटर दूर सिर पर घड़ा रखकर पथरीली पहाड़ी चढ़नी पड़ती है। सरकारी अस्पताल में न इलाज मिलता है और न गांव में पानी का इंतजाम। हमारे जैसे दर्जनों मजरे-टोले भगवान भरोसे हैं।- रेशमबाई और कलाबाई, ग्राम टांडा

मां बोली-लड़कों की नहीं हो रही शादी

अव्यवस्था ने न केवल स्वास्थ्य बल्कि इन गांवों के सामाजिया ताने-बाने को भी तोड़ दिया है। यहां पानी का संकट इतना गहरा है कि दूसरे गांवों के लोग इन मजरे-टोलों में अपनी बेटियों की शादी करने से कतराते हैं। 70 वर्षीय मेहरबाई का दर्द पूरे गांव की कहानी बयां करता है, जिनके दो बेटों की शादी सिर्फ इसलिए नहीं हो पा रही क्योंकि कोई भी पिता अपनी बेटी को झिर का पानी ढोने के लिए इस नर्क में नहीं भेजना चाहता। वे बताती हैं किमेरे दो बेटे हैं, कैलाश और अजबसिंह। दोनों शादी के लायक हैं, लेकिन जैसे ही लोग देखते हैं कि यहां बहू को झिर से पानी लाना पड़ेगा, वे रिश्ता तोड़ देते हैं।

इंतजाम नाकाम, खुद गड्ढा खोद बुझा रहे प्यास

बमौरी विधानसभा के दूसरे गांव यानी ग्राम पंचायत राई का आदिवासी बाहुल्य टांडा गांव है, जहां पत्रिका टीम पहुंची तो चार दर्जन से अधिक आदिवासी परिवार जंगल के बीय पहाड़ी इलाके में जीवन यापन कर खेती करते हुए दिखाई दिए। इस गांव में भी पीने के पानी का समुचित इंतजाम नहीं है। झिर को उन्हीं लोगों ने नदी के किनारे गड्‌ढा खोदकर बनाया है। कहा कि तीस साल से इसी झिर से पानी ले जाकर अपनी प्यास बुझा रहे हैं। दो किमी दूर सिर पर घड़ा रखकर पहाड़ी चढ़कर अपने घर पहुंचती हुई महिलाएं दिखीं। उनका भी कहना था कि बमौरी में एक दर्जन से अधिक मजरे-टोले और गांव हैं। जिला मुख्यालय से 8 किमी दूर सोजना गांव को महिलाएं-बच्चे पत्थरों के बीच से पानी गड्‌ढे खोदकर निकालते हैं।

विधायक बोले-अफसर नहीं सुनते

बमौरी के कांग्रेस विधायक ऋषि अग्रवाल भी मानते हैं कि उनकी विधानसभा के एक दर्जन से अधिक आदिवासी बाहुल्य गांव के लोग झिर का पानी पी रहे हैं। उन्होंने पत्रिका से बताया कि कई बार संबंधित अधिकारियों से उनके पेयजल का इंतजाम कराने की बात कही. लेकिन अफसर सुनते नहीं हैं। उन्हें इस बात का डर है कि इन गांवों में पेयजल व्यवस्था नहीं की गई तो कभी भी दूषित पानी पीने से उनके विधानसभा क्षेत्र में बड़ा हादसा न हो जाए। (MP News)

अफसरों की दलील

हर घर में पानी पहुंचे और पेयजल व्यवस्था के लिए योजना के तहत काम कराए जा रहे हैं। यदि ऐसा कहीं है तो गंभीर मसला है, इसको हम दिखवाते हैं कि वहां पानी का इंतजाम अभी तक क्यों नहीं हो पाया। कार्रवाई भी करेंगे। -किशोर कन्याल, कलेक्टर

यदि वे राजस्व गांव नहीं होंगे तो हो सकता है, क्योंकि वहां रहने वाले लोग कुछ दिन यहां रहते हैं बाकी दिनों में वे रोजगार के लिए दूसरी जगह चले जाते होंगे। फिर भी मैं एक बार चेक करा लेता हूं।- अभिषेक दुबे, सीईओ, जिपं