
जो व्यक्ति 5 साल सरपंच रहा, दूसरों को रोजगार दिया वह आज मजदूरी के लिए भटक रहा
गुना/फतेहगढ़ . समाज के अति पिछड़े व शोषित लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए आरक्षण प्रणाली लागू की गई है। जिसके तहत उन्हें चुनाव लड़ने के लिए विभिन्न पदों पर आरक्षण दिया जा रहा है। लेकिन इस प्रणाली का हकीकत में उन्हें कितना फायदा हो रहा है। यह जानने का प्रयास पत्रिका टीम ने किया है। इसके लिए सबसे पहले जिले की बमोरी जनपद की सबसे बड़ी पंचायतों में से एक फतेहगढ़ को चुना। जहां वर्ष 2006 में आरक्षण प्रक्रिया के तहत सीताराम सहरिया सरपंच निर्वाचित हुए। जो पूूरे 5 साल तक सरपंच रहे। इस दौरान गांव के लोगों को मनरेेगा के तहत रोजगार भी दिया गया। शासन की अन्य योजनाओं का लाभ ग्रामीणों को दिलाया गया। लेकिन आज उसी गांव के तत्कालीन सरपंच की यह हालत है कि वह स्वयं तथा उसका पूरा परिवार रोजगार के लिए इधर-उधर भटक रहा है। यहां तक कि उसके 80 वर्षीय पिता भी परिवार के पालन पोषण में मदद करने बालक आदिवासी आश्रम में चौकीदारी कर रहे हैं। कुल मिलाकर यह एक उदाहरण ही आरक्षण प्रक्रिया की जमीनी हकीकत बताने के लिए पर्याप्त है।
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5 साल सरपंच रहने वाला व्यक्ति खुद को पक्का घर तक नहीं बनाया पाया
6 हजार आबादी वाली ग्राम पंचायत फतेहगढ़ में 5 साल तक सरपंच रहे सीताराम सहरिया से पत्रिका ने बातचीत कर उनके परिवार की माली हालत की जानकारी ली। जिसमें उन्होंने बताया कि 2006-2011 तक वे सरपंच रहे। इस समय उनके परिवार में 6 सदस्य हैं। जिनमें 80 वर्षीय पिता भी शामिल हैं। आजीविका के साधन की बात करें तो उनके पास कोई जमीन नहीं है। इसलिए वे मजदूरी पर ही निर्भर हैं। उनके अलावा पत्नी तथा बेटा भी मजदूरी करता है। पिता 80 साल के होने के बावजूद बालक छात्रावास में चौकीदारी करते हैं।
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ईट भट्टे पर काम करते मिले पूर्व सरपंच
जिस वर्ग के लिए आरक्षण प्रणाली लागू की गई उसका लाभ उसे नहीं मिल पा रहा है। वास्तविक रूप से इसका लाभ पर्दे के पीछे रहकर दूसरा व्यक्ति ही उठा रहा है। जिसका जीता जागता उदाहरण है सीताराम सहरिया। जब उनसे मिलने पत्रिका टीम उनके घर पहुंची तो ताला लगा हुआ था। पता करने पर जानकारी मिली कि पूरा परिवार मजदूरी करने जाता है इसलिए वे कहीं गए होंगे। जगह-जगह पूछताछ करने पर किसी तरह सीताराम का पता चला गया। उन्हें देखा तो वह एक ईट भट्टे पर ईटें ढोते हुए नजर आए। उन्होंने बताया कि वे यहां 200 रुपए प्रतिदिन मजदूरी के हिसाब काम कर रहे हैं। मनरेगा के तहत भी मजदूरी नहीं मिल रही इसलिए रोजाना मजदूरी की तलाश में इधर उधर भटकना पड़ता है। यही नहीं उनके पास स्वयं का जॉब कार्ड है फिर भी मजदूरी नहीं मिलती।
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40 साल से पिता के बनाए झोंपड़े में रह रहा हूं
सरकार की जनहितैषी आवास योजना का पात्र और जरुरमंद हितग्राहियों को कितना मिल रहा है इसकी एक बानगी है सीताराम सहरिया। जो 5 साल तक सरपंच रहे लेकिन स्वयं को इस योजना के तहत पक्का मकान तक नहीं बना सके। सीताराम ने बताया कि वह पिछले 40 साल से अपने पिता द्वारा बनाई झोंपड़ी में रह रहे हैं। एक सप्ताह पहले ही उनकी कुटीर मंजूर होने की जानकारी पंचायात द्वारा उन्हेें दी गईर् है लेकिन अभी पैसा नहीं आया। यही नहीं पूर्व सरपंच के घर शौचालय भी नहीं है, पूरा परिवार खुले में शौच जाने को मजबूर है।
Published on:
01 Jun 2022 01:32 am
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