
kamakhya mata temple photo
राजीव कुमार की रिपोर्ट...
(गुवाहाटी): असम के गुवाहाटी के नीलाचल पहाड़ी पर स्थित मा कामाख्य़ा के मंदिर परिसर में प्रसिद्ध अंबुवासी मेला 22 जून से शुरु होगा। कामाख्या मंदिर प्रबंधन के अनुसार 22 जून की रात 9 बजकर 27 मिनट और 54 सेकेंड पर प्रवृति शुरु होगी और 26 जून की सुबह 7बजकर 51 मिनट 58 सेकेंड पर निवृति होगी। 22 जून के अपराह्न 4 बजे से कामाख्या मंदिर का द्वार बंद हो जाएंगे।
26 जून को देवी के पूजा स्नान के बाद द्वार खुलेंगे। मेले के लिए राज्य के पर्यटन विभाग और कामरुप मेट्रो जिला प्रशासन ने व्यापक इंतजाम किए हैं। कामाख्या देवालय के आस-पास अस्थाई शिविर लगाए जाएंगे। मेले के दौरान 150 स्थाई सुरक्षा कर्मी,400 स्काउट गाइड,50 एनसीसी,400 स्वेच्छा सेवक और 150 अस्थाई सुरक्षा कर्मी काम पर लगाए जाएंगे। सुरक्षा के लिए सीसीटीवी और अतिरिक्त सुरक्षा बल का इंतजाम किया गया है।
कामाख्या माता के इस धाम को शक्तिपीठ भी कहा जाता है। माता की शक्ति में जो लोग विश्वास करते हैं वह यहां आकर अपने को धन्य मानते हैं। जिन्हें ईश्वरीय सत्ता पर यकीन नहीं है वह भी यहां आकर माता के चरणों में शीश झुका देते हैं और देवी के भक्त बन जाते हैं।
51 शक्तिपीठों में से एक है यह धाम, यह है दिव्य इतिहास
देवी के 51 शक्तिपीठों में से यह भी एक है। माना जाता है कि भगवान विष्णु ने जब देवी सती के शव को चक्र से काटा तब इस स्थान पर उनकी योनी कट कर गिर गयी। इसी मान्यता के कारण इस स्थान पर देवी की योनी की पूजा होती है। प्रत्येक वर्ष तीन दिनों के लिए यह मंदिर पूरी तरह से बंद रहता है। माना जाता है कि माँ कामाख्या इस बीच रजस्वला होती हैं। और उनके शरीर से रक्त निकलता है। इस दौरान शक्तिपीठ की अध्यात्मिक शक्ति बढ़ जाती है। इसलिए देश के विभिन्न भागों से यहां तंत्रिक और साधक जुटते हैं। आस-पास की गुफाओं में रहकर वह साधना करते हैं।
चौथे दिन माता के मंदिर का द्वार खुलता है। माता के भक्त और साधक दिव्य प्रसाद पाने के लिए बेचैन हो उठते हैं। यह दिव्य प्रसाद होता है लाल रंग का वस्त्र जिसे माता रजस्वला होने के दौरान धारण करती हैं। माना जाता है वस्त्र का टुकड़ा जिसे मिल जाता है उसके सारे कष्ट और विघ्न बाधाएं दूर हो जाती हैं।
Published on:
16 Jun 2018 01:08 pm
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