
कोर्ट में सरकार की हो रही फजीहत, बड़े केस भी नहीं बचा पा रहे - कुछ की स्थिति तो ऐसी है कि वह जवाब भी नहीं बना पाते हैं
हाईकोर्ट में सरकारी मामलों की मजबूत पैरवी के लिए सरकार ने अतिरिक्तमहाधिवक्ताओं और सरकारी वकीलों की फौज खड़ी कर दी, लेकिन हालात ऐसे हैं कि करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद भी न सरकारी जमीन बच पा रही है और न समय पर जवाब-दावा लग पा रहा है। अदालत में लगातार प्रमुख सचिवों की पेशी हो रही है और कई मामलों में कोर्ट की नाराजगी झेलनी पड़ रही है।
सरकार ने पैरवी मजबूत करने के नाम पर 5 अतिरिक्त महाधिवक्ता, 1 उप महाधिवक्ता, 28 सरकारी अधिवक्ता और 4 उप शासकीय अधिवक्ता नियुक्त किए हैं। इन सभी पर वेतन और सुविधाओं के रूप में हर साल लगभग 6 करोड़ 94 लाख रुपए खर्च हो रहे हैं, लेकिन कामकाज की स्थिति पर सवाल खड़े हो रहे हैं। बड़े मामलों में जहां अतिरिक्त महाधिवक्ताओं को खुद पैरवी करनी चाहिए, वहां केस सरकारी वकीलों के भरोसे छोड़ दिए जाते हैं, जबकि कई गैर-महत्वपूर्ण मामलों में अतिरिक्त महाधिवक्ता खुद उपस्थित हो रहे हैं। पत्रिका द्वारा रोजाना होने वाले कार्य-वितरण के रिकॉर्ड की पड़ताल में यही ट्रेंड सामने आया है कि जिम्मेदारी और प्राथमिकता का संतुलन बिगड़ा हुआ है। स्थिति यह है कि सरकारी जमीनों से जुड़े मामलों में समय पर जवाब दाखिल नहीं हो पा रहे, जिसके कारण अदालत को सख्त रुख अपनाना पड़ रहा है। कई मामलों में प्रमुख सचिवों को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश होना पड़ा है।
जानकारी के अनुसार वर्ष 2016-17 में सरकार ने महाधिवक्ता कार्यालय का ढांचा बड़ा करते हुए पदों की संख्या और वेतन दोनों बढ़ा दिए थे। पहले जहां सरकारी वकीलों पर सालाना करीब 76 लाख रुपए खर्च होते थे, वहीं अब यह बढक़र 6 करोड़ 94 लाख रुपए तक पहुंच गया है। दिलचस्प बात यह है कि 2016 से पहले एक अतिरिक्त महाधिवक्ता पूरी युगल पीठ संभालते थे, लेकिन अब एक ही पीठ में पांच अतिरिक्त महाधिवक्ता और एक शासकीय अधिवक्ता तक उपस्थित हो रहे हैं, फिर भी सरकार कोर्ट में मजबूत स्थिति में नजर नहीं आ रही।
पांच अतिरिक्त महाधिवक्ता पर खर्च
- महाधिवक्ता कार्यालय में पांच अतिरिक्त महाधिवक्ता पदस्थ हैं। एक अतिरिक्त महाधिवक्ता को 1.75 लाख रुपए वेतन मिलता है। 40 हजार रुपए महीना गाड़ी पर खर्च। दो सुरक्षा गार्ड, जिनके वेतन पर 1.30 लाख खर्च हो रहे हैं। 3.45 लाख रुपए प्रति महीना खर्च हो रहा है। पांच अतिरिक्त महाधिवक्ता पर हर महीने 17.25 लाख रुपए खर्च हो रहे हैं। सालभर में 2.07 करोड़ खर्च हो रहे हैं।
डीबी में उपस्थिति, अहम केसों से बनाई दूरी
- अतिरिक्त महाधिवक्ता विवेक खेडक़र प्रशासनिक कार्य संभाल रहे हैं। युगल पीठ में पैरवी के लिए उपस्थित होते हैं।
- अतिरिक्त महाधिवक्ता अंकुर मोदी युगल पीठ में लगने वाले सिविल केस में पैरवी के लिए जाते हैं।
- - अतिरिक्त महाधिवक्ता दीपेंद्र कुशवाह युगल पीठ में हैबियसकापर्स में उपस्थित होते हैं। तीन से चार हैबियसकापर्स में सुनवाई होती है।
- अतिरिक्त महाधिवक्ता राजेश शुक्ला युगल पीठ में क्रिमिनल अपीलों में पैरवी के लिए उपस्थित होते हैं।
-अतिरिक्त महाधिवक्ता रोहित मिश्रा 1 से 10 नंबर तक जमानत के केस लेते हैं। ये सिंगल बैंच में जाते हैं।
- सरकार ने ग्वालियर में पांच अतिरिक्त महाधिवक्ताओं की नियुक्ति की है, लेकिन सरकारी जमीन या बड़े केसों में शासकीय अधिवक्ता उपस्थित हो रहे हैं। सबसे ज्यादा सरकार की फजीहत कोर्ट नंबर-3 में हो रही है। इस कोर्ट से अतिरिक्त महाधिवक्ताओं ने दूरी बना ली है।
28 शासकीय अधिवक्ता 4.20 करोड़ का खर्च
- सरकार ने 28 शासकीय अधिवक्ता नियुक्ति किए हैं। इनके वेतन पर एक महीने में 35 लाख रुपए का खर्च है। 12 महीने में 4.20 करोड़ का खर्च आ रहा है। इसमें कुछ ऐसे शासकीय अधिवक्ता हैं, जो ठीक से अंग्रेजी भी नहीं पढ़ पाते हैं और कानून का ज्ञान भी नहीं है। इसको लेकर हाईकोर्ट से नाराजगी का भी सामना करना पड़ा है।
- 4 उप शासकीय अधिवक्ता हैं। इनके वेतन पर 4 लाख रुपए खर्च हो रहे हैं। सालभर में 48 लाख रुपए खर्च हैं।
- एक पद उप महाधिवक्ता का है।
अतिरिक्त महाधिवक्ता व शासकीय अधिवक्ताओं को मिलने वाला वेतन
पद वेतन
अतिरिक्त महाधिवक्ता 175000
उप महाधिवक्ता 160000
शासकीय अधिवक्ता 125000
उप अधिवक्ता 100000
(वेतन राशि प्रतिमाह की है)
दो अहम केस में हार
केस-1: जड़ेरुआ खुर्द (गोले के मंदिर के पास) में पुलिस की 14 बीघा जमीन मौजूद है। इस जमीन को बचाने के लिए शासन ने हाईकोर्ट में रिट पिटीशन दायर की थी, लेकिन प्रतिवादी का निधन होने के चलते उसके वारिसानों को पक्षकार बनाना था, लेकिन शासकीय अधिवक्ता को दो बार कोर्ट ने मौका दिया, लेकिन सूचना आगे नहीं बढ़ाई। पिटीशन खारिज हो गई। पिटीशन खारिज होने के बाद अन्य अधिवक्ता इसकी जानकारी मिल गई, लेकिन उस अधिवक्ता के पास फाइल दबी रही। देर से री स्टोर का आवेदन लगाने का ठीकरा अधिकारियों के ऊपर फोड़ा गया। इस कारण पुलिस बिना लड़े ही हाईकोर्ट से 14 बीघा जमीन हार गई। यह शासकीय अधिवक्ता के भरोसे छोड़ दिया।
केस-2: बेला की बावड़ी के पास 180 बीघा जमीन का मामला हाईकोर्ट में चला। इस मामले पैरवी के लिए शासकीय अधिवक्ता उपस्थित हुए, लेकिन विधिवत जवाब नहीं दिया। इस जमीन का फैसला निजी पक्षों के पक्ष में गया। जबकि जमीन पट्टे की थी। अखबारों में खबर प्रकाशित होने के बाद शासन को जानकारी मिली तो रिट अपील दायर की है।
केस-3: जगनापुरा में माफी औकाफ की जमीन है। इस जमीन की कीमत करोड़ों में है। संभागायुक्त ने इस जमीन को माफी औकाफ के नाम से दर्ज करने का आदेश दिया था, लेकिन संभागायुक्त के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। पहली सुनवाई में सरकार केस हार गई। सरकारी वकील को पैरवी के लिए भेजा गया। आदेश की पुनर्विचार याचिका तैयार करने के लिए कोई तैयार नहीं था। न पैरवी के लिए।
एक्सपर्ट
- कोर्ट में पैरवी के लिए राजनीतिक नियुक्तियां हो रही हैं। इन नियुक्तियों में योग्यता का ध्यान नहीं रखा गया है। वैसे सरकार के महत्वपूर्ण मामलों में अतिरिक्त महाधिवक्ता को उपस्थित होना चाहिए, लेकिन इससे बच रहे हैं। इस कारण सरकारी केस की स्थिति गंभीर हो रही है। इसकी मोनीटरिंग जरूरी है।
राजीव शर्मा, पूर्व अतिरिक्त महाधिवक्ता
Published on:
20 Mar 2026 11:10 am
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