
ग्वालियर। एक ओर जहां अलाउद्दीन खिलजी और रानी पद्मावती को लेकर संजय लीला भंसली की बनाई गई फिल्म का विरोध चल रहा है वहीं दूसरी और म.प्र के दतिया जिले की हद में आने वाले एक स्थान में खिलजी कालीन सोने-चांदी के सिक्कों से भरा दफीना मिला। बच्चों को खेलते समय मिले इस खजाने को लेकर फिर जो विवाद उत्पन्न हुआ है। वह पढ़ें आगे.....
दतिया के सेंवढ़ा अनुभाग के ग्राम चिमघन स्थित पहाड़ी पर खेल रहे कुछ बच्चों को सोने-चांदी के कुल 19 सिक्के मिले हैं। इन सिक्कों पर अरबी भाषा में अलाउद्दीन खिलजी शासनकाल की इबारत अंकित है। यह सिक्के बच्चों को धनतेरस के दिन मिले थे पुलिस दबाव के बाद बच्चों के परिजन ने 30वें दिन बुधवार को यह सिक्के लांच पुलिस के सुपुर्द कर दिए।
अलाउद्दीन खिलजी का इतिहास
अलाउद्दीन खिलजी (वास्तविक नाम अली गुरशास्प 1296-1316)दिल्ली सल्तनत के खिलजी वंश का दूसरा शासक था।[1] वो एक विजेता था और उसने अपना साम्राज्य दक्षिण में मदुरै तक फैला दिया था। इसके बाद इतना बड़ा भारतीय साम्राज्य अगले तीन सौ सालों तक कोई भी शासक स्थापित नहीं कर पाया था। वह अपने मेवाड़ चित्तौड़ के विजय अभियान के बारे में भी प्रसिद्ध है। ऐसा माना जाता है कि वो चित्तौड़ की रानी पद्मावती की सुन्दरता पर मोहित था। इसका वर्णन मलिक मुहम्मद जायसी ने अपनी रचना पद्मावत में किया है।[2]
उसके समय में उत्तर पूर्व से मंगोल आक्रमण भी हुए। उसने उसका भी डटकर सामना किया। अलाउद्दीन ख़िलजी के बचपन का नाम अली 'गुरशास्प' था। जलालुद्दीन खिलजी के तख्त पर बैठने के बाद उसे 'अमीर-ए-तुजुक' का पद मिला। मलिक छज्जू के विद्रोह को दबाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने के कारण जलालुद्दीन ने उसे कड़ा-मनिकपुर की सूबेदारी सौंप दी। भिलसा, चंदेरी एवं देवगिरि के सफल अभियानों से प्राप्त अपार धन ने उसकी स्थिति और मज़बूत कर दी। इस प्रकार उत्कर्ष पर पहुँचे अलाउद्दीन खिलजी ने अपने चाचा जलालुद्दीन की हत्या धोखे से 22 अक्टूबर 1296 को खुद से गले मिलते समय अपने दो सैनिकों (मुहम्मद सलीम तथा इख़्तियारुद्दीन हूद) द्वारा करवा दी। इस प्रकार उसने अपने सगे चाचा जो उसे अपने औलाद की भांति प्रेम करता था के साथ विश्वासघात कर खुद को सुल्तान घोषित कर दिया और दिल्ली में स्थित बलबन के लालमहल में अपना राज्याभिषेक 22 अक्टूबर 1296 को सम्पन्न करवाया।
राज्याभिषेक के बाद उत्पन्न कठिनाईयों का सफलता पूर्वक सामना करते हुए अलाउद्दीन ने कठोर शासन व्यवस्था के अन्तर्गत अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार करना प्रारम्भ किया। अपनी प्रारम्भिक सफलताओं से प्रोत्साहित होकर अलाउद्दीन ने 'सिकन्दर द्वितीय' (सानी) की उपाधि ग्रहण कर इसका उल्लेख अपने सिक्कों पर करवाया। उसने विश्व-विजय एवं एक नवीन धर्म को स्थापित करने के अपने विचार को अपने मित्र एवं दिल्ली के कोतवाल 'अलाउल मुल्क' के समझाने पर त्याग दिया। यद्यपि अलाउद्दीन ने ख़लीफ़ा की सत्ता को मान्यता प्रदान करते हुए ‘यामिन-उल-ख़िलाफ़त-नासिरी-अमीर-उल-मोमिनीन’ की उपाधि ग्रहण की, किन्तु उसने ख़लीफ़ा से अपने पद की स्वीकृत लेनी आवश्यक नहीं समझी। उलेमा वर्ग को भी अपने शासन कार्य में हस्तक्षेप नहीं करने दिया। उसने शासन में इस्लाम धर्म के सिद्धान्तों को प्रमुखता न देकर राज्यहित को सर्वोपरि माना। अलाउद्दीन ख़िलजी के समय निरंकुशता अपने चरम सीमा पर पहुँच गयी। अलाउद्दीन ख़िलजी ने शासन में न तो इस्लाम के सिद्धान्तों का सहारा लिया और न ही उलेमा वर्ग की सलाह ली।
जानकारी के अनुसार चिमघन गांव में ठाकुर बाबा का प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर से लगी जमीन पर एक महीने पहले कृषक कमलेश ने चट्टान को जेसीबी से समतल कराया। खुदाई के दौरान निकली मिट्टी में धनतेरस के दिन गांव के दर्जनभर बच्चे खेल रहे थे। इसी दौरान बच्चों को मिट्टी में 19 सिक्के (3 सोने व 16 चांदी) मिले। बच्चे सिक्के लेकर अपने घर ले गए। लेकिन धीरे-धीरे पहाड़ी पर दफीना मिलने की अफवाह गांव में फैल गई। सूचना के बाद लांच थाना प्रभारी जेपी अहिरवार फोर्स लेकर गांव पहुंचे। यहां उन्होंने मुनादी कराकर सिक्के वापस करने को कहा- तब ग्रामीणों ने 19 सिक्के पुलिस के सुपुर्द किए।
"देश में अपनी शान के लिए मशहूर ग्वालियर किले ने फिर सभी को चौंका दिया है। दररअसल किले की तलहटी के नीचे खुदाई चल रही थी, तभी वहां खजाना निकल आया। मस्जिद बनाने के लिए खुदाई की जा रही थी, तभी वहां लोगों को कुछ बक्से सा दिखाई दिया। पहले तो लोग बक्से को खोलने से डरने लगे, लेकिन जब बक्से को खोला गया तो लोगों की आंखे खुली की खुली रह गईं। मौके से मिले दफीने से 66 चांदी के सिक्केे मिले हैं और स्थानीय लोग बता रहे हैं कि यहां और भी खजाना हो सकता है।"
" भिण्ड के प्राचीन उमरेश्वर महादेव मंदिर के परिसर से जमीन में छिपे दफीने को स्थानीय ग्रामीण खुले आम खोद कर ले जा रहे हैं। गुजरे लगभग एक माह में 100 से ज्यादा चांदी के सिक्के अब तक यहां से निकाले जा चुके हैं। लोगों ने कुछ सिक्के मंदिर के वृद्ध पुजारी रामस्वरूप को भी सौंपे हैं। जबकि पुलिस और पुरातत्व विभाग को अब तक इसकी कोई जानकारी नहीं है। भिण्ड शहर से करीब 15 दूर ऊमरी कस्बे के कनावर रोड पर स्थित बड़े तालाब के पास वाले प्राचीन उमरेश्वर महादेव मंदिर के परिसर से जमीन में छिपे 100 से ज्यादा चांदी के सिक्के यहां से निकाले जा चुके हैं। साथ ही यहां पर ढुढऩे पर चादी के सिक्के निकलते है।"
Updated on:
17 Nov 2017 12:07 pm
Published on:
16 Nov 2017 02:43 pm
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