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आधुनिक कहलाने की अंधी जिद में, रावण को राम समझना पड़ता…: अजहर

अटल के 99वें जन्मदिन पर कवि सम्मेलन

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 Kavi Sammelan on Atal's 99th birthday

आधुनिक कहलाने की अंधी जिद में, रावण को राम समझना पड़ता...: अजहर

जीवाजी विश्वविद्यालय के अटल सभागार पूर्व प्रधानमंत्री, भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेई के 99वें जन्मदिन पर मंगलवार को नामचीन कवियों ने इंसानी जज्बात रोशन किए। मानवीय संवेदनाओं और कहे अनकहे भावों को समर्पित इन कविताओं और उनके शब्दों ने अटल सभागार के रसिक श्रोताओं के हृदय को झृकंत कर दिया। मंच से दूसरी कड़ी में कबीर कैफे ने दो दिन की है जिंदगी दो दिन का है मेला जैसी प्रस्तुतियों से युवा वर्ग को भी कबीरवाणी से आलोकित कर दिया। कार्यक्रम के प्रारंभ में अटल बिहारी के चित्र पर दीप प्रज्वलित किया। इसके बाद कवियों एवं कबीर कैफे बैंड के कलाकारों का पुष्पाहार, शाल-श्रीफल पहनाकर सम्मानित किया। कवि अजहर इकबाल ने मंच संचालन किया।
अटल स्मृति मंच के संयोजक देवेंद्र प्रताप सिंह तोमर "रामू" ने कहा, ग्वालियरवासियों के उत्साह एवं प्रोत्साहन से अटल बिहारी को समर्पित हमारा यह 5वां रचनात्मक काव्य पुष्प आपके समक्ष प्रस्तुत होने जा रहा है। इस आयोजन के जरिए ग्वालियर के रसिक श्रोता देश के नामचीन कवियों की साहित्यिक रचनात्मक चेतना को महसूस कर सकें यही हमारा ध्येय है।

स्वयं श्रीवास्तव
मुश्किल थी संभलना ही पड़ा घर के वास्ते, और घर से निकलना ही पड़ा घर के वास्ते,
मजबूरियों का नाम हमने शौक रख दिया, और शौक बदलना ही पड़ा घर के वास्ते।

रमेश मुस्कान...
मेरी आशिकी की कहानी सुनकर लोगों की चीख निकल गयी
-आशिकी के साथ साथ बाल तक झड़ चुके हैं
सुनाकर, श्रोताओं को खूब हँसाया...

मुमताज नसीम-
प्यार की खुशबू का समंदर हूँ मैं बनके बादल जो मुझ पर बरस जाओगे
क्या खबर थी कि नस-नस में बस जाओगे...

अज़हर इकबाल-
गाली को प्रणाम समझना पड़ता है, मधुशाला को धाम समझना पड़ता है।
आधुनिक कहलाने की अंधी जिद में, रावण को राम समझना पड़ता...

प्रेम के गीतों की तान हमेशा की तरह कविवर विष्णु सक्सेना ने कुछ यूं छेड़ी
तू हवा है तो कर ले अपने हवाले मुझको, इससे पहले कि कोई और बहा ले मुझको
तू हवा है तो कर ले अपने हवाले मुझको, इससे पहले कि कोई और बहा ले मुझको
आईना बन के गुज़ारी है जिंदगी मैंने, टूट जाऊंगा बिखरने से बचा ले मुझको

प्यास बुझ जाए तो शबनम खऱीद सकता हूं, जख़्म मिल जाएं तो मरहम खरीद सकता हूं
ये मानता हूं मैं दौलत नहीं कमा पाया, मगर तुम्हारा हर एक ग़म खरीद सकता हूं

जब भी कहते हो आप हमसे कि अब चलते हैं, हमारी आंख से आंसू नहीं संभलते हैं
अब न कहना कि संग दिल कभी नहीं रोते, जितने दरिया हैं पहाड़ों से ही निकलते हैं

तू जो ख्वाबों में भी आ जाए तो मेला कर दे, ग़म के मरुथल में भी बरसात का रेला कर दे
याद वो है ही नहीं आए जो तन्हाई में, तेरी याद आए तो मेले में अकेला कर दे


अनामिका जैन अंबर
जो कानों तक नहीं पहुंचे वही अल्फाज मत होना जिसे दिल जान ना पाए कभी वह राज मत होना है मुमकिन गलतियों से गलतियों का भी तो हो जाना मुझे तुम कुछ भी कह देना मगर नाराज मत होना