
बलिदान दिवस : झांसी की रानी की जिंदगी से जुड़ी वो बातें जो शायद नहीं जानते आप, जानिए
ग्वालियर। 1857 की क्रांति की सबसे बड़ी नायिका और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का नाम वीरता की श्रेणी में सबसे उपर रखा जाता है। रानी लक्ष्मी बाई का व्यक्तित्व आज सिर्फ महिलाओं के लिए नहीं बल्कि पूरे देश के युवाओं के लिए प्रेरणा स्त्रोत है। 18 जून 1858 को इस महान नायिका का बलिदान दिवस है। रानी लक्ष्मी बाई ग्वालियर में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ती हुई शहीद हुईं थी। उनके इस बलिदान दिवस पर हम आपको उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ पहलू बताने जा रहे हैं।
बनारस के पास हुआ था रानी लक्ष्मीबाई का जन्म
रानी लक्ष्मीबाई का जन्म बनारस के पास एक गांव के ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम मणिज़्निज़्का था। रानी को प्यार से लोग मनु कहते थे। मनु जब 4 साल की ही थी कि उनकी मां का निधन हो गया। उनकी शिक्षा और शस्त्र का ज्ञान उन्होंने यहीं से प्राप्त किया।
पेशवा कहते थे इन्हें छबीली
रानी लक्ष्मी बाई के पिता बिठ्ठूर में पेशवा ऑफिस में काम करते थे और मनु अपने पिता के साथ पेशवा के यहां जाया करती थी। पेशवा भी मनु को अपनी बेटी जैसी ही मानते थे और उनके बचपन का एक भाग यहां भी बीता। रानी लक्ष्मीबाई बचपन से ही बहुत तेज तराज़्र और ऊजाज़् से भरी थी। उनकी इन्ही विशेषताओं के कारण ही पेशवा उन्हें छबीली कहकर पुकारा करते थे।
18 साल की उम्र में थामी झांसी की बागडोर
रानी लक्ष्मीबाई बेहद कम उम्र में ही झांसी की शासिका बन गई। जब उनके हाथों में झांसी राज्य की कमान आई तब उनकी उम्र महज 18 साल ही थी। उनकी शादी 14 साल से भी कम उम्र में झांसी के मराठा शासक गंगाधर राव से हुई।
ब्रिटिश आर्मी के इस अफसर ने उन्हें कहा था सुंदर और चतुर
ब्रिटिश आर्मी के एक सीनियर ऑफिसर कैप्टन ह्यूरोज ने रानी लक्ष्मी के अतुल्य साहस को देखकर उन्हें सुंदर और चतुर महिला कहा है। बता दें कि ये वही कैप्टन हैं जिनकी तलवार से रानी की मौत हुई थी। ह्यूरोज ने रानी की मौत के बाद उन्हें सेल्यूट भी किया था।
इनकी गोली से हुई थी रानी की मौत
ग्वालियर में अंग्रेजों के साथ युद्ध करते हुए रानी लक्ष्मी बाई की मौत गोली लगने से हुई थी, मगर ये गोली किसकी थी, इस पर भी थोड़ा विवाद है। अंग्रेजों के इतिहास की मानें तो रानी लक्ष्मी बाई की मौत कैप्टन ह्यूरोज की तलवार से हुई थी, लेकिन कुछ इतिहासकारों का मत है कि उनकी मौत ब्रिटिश सैनिक की गोली से हुई थी। हालांकि ये केवल मत ही है।
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रानी की सहायता पर इनको मिली मौत
1858 में सिंधिया राजवंश के खजांची अमरचन्द्र बाठिया का नाम उन अमर शहीदों में लिया जाता है, जिन्होंने अपनी जांन की परवाह न करते हुए भी रानी की मदद की। इतिहासकार बताते हैं कि अमरचन्द्र बाठिया ने सबसे बगावत करते हुए सिंधिया राजकोष का धन रानी को मदद के रूप में दिया था। जिसके कारण उनके उपर एक अंग्रेजों द्वारा मुकदमा भी चलाया गया था और उन्हें एक पेड़ पर लटकाकर फांसी दे दी गई। शहर के सराफा बाजार में स्थित ये पेड़ आज भी अमरचंद्र बांठिया और रानी की शहादत का प्रतीक है।
लक्ष्मीबाई को बचाने 370 साधु शहीद
मुरार में उनकी सेना ब्रिटिश कंपनी से हार गई, तब वे ग्वालियर किले पर थीं। सूचना मिली तो अंगरक्षकों और पठान सैनिकों के साथ उरवाई गेट से निकलीं। एक मील दूर रामबाग में जनरल ह्यूरोज की सेना से मु_ीभर सैनिकों के साथ भिड़ गईं। पठान सैनिक शहीद हो गए। आगे बढ़ते हुए वे घायल हो गईं।
अचानक सैंकड़ों साधु उनके ओर से ब्रिटिश सैनिकों से भिड़ गए। 370 साधु लड़ते हुए शहीद हो गए। इसके बाद साधुओं का एक दल घायल महारानी को गंगादास की शाला (जहां आज वीरांगना का शहीद स्मारक है) ले गए। वहीं, महारानी ने प्राण त्याग दिए। इसके बाद साधुओं ने झोपड़ी में रानी का अंतिम संस्कार किया। रानी नहीं चाहती थीं कि अंग्रेज उनके शरीर को हाथ लगा पाएं। तब से यह समाधि स्थल उनकी चिर स्मृति का केंद्र बन गया।
Updated on:
17 Jun 2019 04:30 pm
Published on:
17 Jun 2019 04:11 pm
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