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9 साल बाद घर लौटा भोपाल का बद्रीनाथ, छात्राओं ने की काउंसलिंग तो खुला यादों का पिटारा

ग्वालियर

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Pravendra Singh Tomar

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Updated: 17 Feb 2026, 8:02 PM IST

दुआओं, तकनीक और संवेदनशील युवाओं ने मिलाया बिछड़ा परिवार

ग्वालियर. कहते हैं, सच्ची दुआ और उम्मीद कभी बेकार नहीं जाती। भोपाल के कोलार निवासी बद्रीनाथ की कहानी इसका जीवंत उदाहरण है, जहां नौ वर्षों का इंतजार आखिरकार एक सुकून भरी सुबह में बदल गया। यह सिर्फ एक गुमशुदा व्यक्ति की घर वापसी नहीं, बल्कि मानवता, तकनीक और युवाओं की संवेदनशीलता की जीत की कहानी है।
जनवरी में कड़ाके की ठंड भरी सुबह, जब ग्वालियर का हजीरा इलाका कोहरे में डूबा था। सुबह करीब चार बजे सेवा साथी आयुष गोस्वामी की नजर एक शख्स पर पड़ी, जो महज दो कपड़ों में ठंड से कांप रहा था। वह बद्रीनाथ थे—सुध-बुध खो चुके, असहाय और अकेले। आयुष ने बिना समय गंवाए उन्हें सहारा दिया और आश्रम स्वर्ग सदन पहुंचाया, जहां से बद्रीनाथ के जीवन को नई दिशा मिली।

काउंसलिंग से खुली यादों की परतें
आश्रम में इलाज के साथ काउंसलिंग शुरू हुई। एमिटी यूनिवर्सिटी की इंटर्न छात्राएं शांभवी किशोर और श्रेया कोकिवार ने धैर्य और संवेदना के साथ बातचीत की। नौ साल की मानसिक पीड़ा के बीच, बद्रीनाथ के शब्दों में धीरे-धीरे भोपाल, कोलार रोड और संस्कार स्कूल जैसे संकेत उभरने लगे।

गूगल ने निभाई अहम भूमिका
छात्राओं ने तुरंत गूगल की मदद से स्कूल का संपर्क तलाशा। पुराने रिकॉर्ड खंगाले गए और आखिरकार बद्रीनाथ की पहचान पुख्ता हो गई। सूचना मिलते ही भोपाल में परिवार की वर्षों की तपस्या रंग ले आई। बद्रीनाथ को लेने उनकी बहनें सुंदरी और ज्योति ग्वालियर पहुंचीं। उन्होंने बताया कि 2017 में बद्री गांव से गेहूं लेने निकले थे और लौटकर नहीं आए। इस सदमे में पिता का देहांत हो गया, लेकिन उम्मीद नहीं टूटी। आज भाई को सामने देखकर वह क्षण उनके लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था।

मानवता की सच्ची जीत
नौ साल बाद बद्रीनाथ सुरक्षित अपने परिवार के साथ घर लौट गए। यह कहानी बताती है कि तकनीक और युवा संवेदनशीलता मिलकर बिखरे रिश्तों को फिर से जोड़ सकती है—और यही मानवता की सबसे बड़ी जीत है।