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लॉकडाउन में थैलेसीमिया से पीडि़त बच्चों को नहीं मिल रहा खून

डबरा के थैलेसीमिया पीडि़त अर्जुन और जौरा के लवली को खून चढ़वाने के लिए लाए एक मां और पिता को अस्पताल प्रबंधन की बेरुखी का शिकार होना पड़ा। कोरोना संक्रमण के डर से जेएएच के स्टाफ ने बच्चों को भर्ती करने से मना कर दिया था।

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लॉकडाउन में थैलेसीमिया से पीडि़त बच्चों को नहीं मिल रहा खून

ग्वालियर. डबरा के थैलेसीमिया पीडि़त अर्जुन और जौरा के लवली को खून चढ़वाने के लिए लाए एक मां और पिता को अस्पताल प्रबंधन की बेरुखी का शिकार होना पड़ा। कोरोना संक्रमण के डर से जेएएच के स्टाफ ने बच्चों को भर्ती करने से मना कर दिया था।
यह जानकारी फैलने के बाद भी अस्पताल प्रबंधन टालमटोल करते हुए कहता रहा कि इस समय ब्लड नहीं चढ़ाया जा सकता है। बाद में अधीक्षक डॉ. अशोक मिश्रा के पास जानकारी पहुंची तो उन्होंने बाल एवं शिशु रोग विभागाध्यक्ष से बात की और बच्चों को भर्ती कराने की व्यवस्था की।
दरअसल, डबरा की लक्ष्मी के बेटे अर्जुन और जौरा के मुकेश शर्मा के पुत्र लवली को हर हफ्ते चेकअप के साथ ही ब्लड चढ़ाया जाता है। लक्ष्मी बीते दस साल से इसी तरह से लगातार अपने बेटे को थैलेसीमिया से बचाने के लिए ब्लड चढ़वा रही हैं, जबकि मुकेश भी अपने बेटे को लगातार चेकअप के लिए ला रहे हैं। गुरुवार को भी यह दोनों अपने-अपने क्षेत्र से सभी दस्तावेज लेकर रवाना हुए और चेक प्वॉइंट पर दस्तावेज दिखाते हुए जयारोग्य चिकित्सालय समूह परिसर पहुंचे थे। हॉस्पिटल पहुंचकर जब उन्होंने स्टाफ से बात की तो बाहर से आए इन लोगों से स्टाफ ने दूरी बनाते हुए कह दिया कि शासन का आदेश है कि कोरोना संक्रमण की रोकथाम के बीच बाहर से आए लोगों को ब्लड नहीं चढ़ाया जा सकता है। ब्लड चढ़वाने में मदद करने वाले समाजसेवक निर्मल संतवानी को अभिभावकों के जरिए यह जानकारी पता चली तो उन्होंने प्रबंधन से बात की।


क्या है थैलेसीमिया
खून की कमी करने वाली बीमारी थैलीसीमिया की पहचान तीन माह की आयु के बाद ही होती है। इस बीमारी में बच्चे के शरीर में खून की लगातार कमी होती है। इस वजह से बार-बार खून चढ़ाने की जरूरत होती है। संभाग में ज्यादातर जिलों के बच्चों को उनके माता-पिता ब्लड चढ़वाने के लिए ग्वालियर जेएएच ही लाते हैं। इस जानलेवा बीमारी में अगर समय पर ब्लड न मिले तो बच्चे की जान खतरे में पड़ सकती है।

बच्चों की खातिर तोड़ा लॉकडाउन
दोनों बच्चों के मां और पिता का कहना था कि सामान्य परिस्थिति में वे लॉक डाउन कभी नहीं तोड़ते, लेकिन बच्चों को ब्लड चढ़वाने और चेकअप कराने के लिए लाना जरूरी था। इसके बाद भी सभी दस्तावेज लेकर रवाना हुए। मुरैना के जौरा से आते समय डिस्ट्रिक्ट चेक पॉइंट पर सभी दस्तावेज चेक करने के बाद ही शहर में प्रवेश दिया गया था। जबकि डबरा से आने वाली लक्ष्मी भी सभी दस्तावेज साथ लेकर रास्ते में दिखाते हुए ग्वालियर तक पहुंची थीं। थैलेसीमिया से पीडि़त इन बच्चों को लेकर अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही और बेरुखी की जानकारी वायरल नहीं होती तो इनकी जान खतरे में पड़ सकती थी।