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थाना डाकघर नहीं कि बस चिट्ठियां बांटते रहो, पुलिस जैसा एक्शन दिखाओ: कोर्ट

साइबर ठगी पर कोर्ट की तल्ख टिप्पणी, डेढ़ साल बाद भी जांच शून्य

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थाना डाकघर नहीं कि बस चिट्ठियां बांटते रहो, पुलिस जैसा एक्शन दिखाओ: कोर्ट

थाना डाकघर नहीं कि बस चिट्ठियां बांटते रहो, पुलिस जैसा एक्शन दिखाओ: कोर्ट

ग्वालियर. थाना पोस्ट ऑफिस की तरह काम कर रहा है। इसे चिट्ठी भेजी, उसे चिट्ठी भेजी… पुलिस जैसा काम तो कहीं नजर ही नहीं आ रहा। पुलिस केवल ऑफिस-ऑफिस खेल रही है। यह तल्ख टिप्पणी विशेष सत्र न्यायाधीश विवेक कुमार ने शुक्रवार को साइबर ठगी के एक मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताते हुए की। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि अपराध दर्ज होने के बावजूद न तो आरोपियों की गिरफ्तारी हुई और न ही ठगी गई राशि को फ्रीज कराने की कोई ठोस कार्रवाई की गई, जो पुलिस की गंभीर लापरवाही को दर्शाता है।पूरा मामला फरियादी बीडी जैन से हुई 7 लाख 43 हजार 500 रुपए की साइबर ठगी से जुड़ा है। इस संबंध में अपराध शाखा (क्राइम ब्रांच) में 20 जुलाई 2024 को प्रकरण दर्ज किया गया था (मामले को लगभग डेढ़ वर्ष बीत रहे हैं)। फरियादी का आरोप है कि उन्होंने उन तमाम खातों की जानकारी पुलिस को उपलब्ध करा दी थी, जिनमें ठगी की रकम ट्रांसफर हुई थी। इसके बावजूद पुलिस ने उन खातों को फ्रीज करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। कोर्ट में सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि पुलिस ने केवल पत्राचार किया, लेकिन कोई फील्ड एक्शन नहीं लिया।


जांच अधिकारी की दलील, साहब, अभी तो 15 दिन हुए हैं
कोर्ट की फटकार के बीच जांच अधिकारी ने अपनी सफाई में कहा उनकी थाने में नई पोङ्क्षस्टग हुई है, इस केस की डायरी उन्हें मात्र 15 दिन पहले ही मिली है। उन्हें मामले की ज्यादा जानकारी नहीं है, इसलिए वे स्थिति स्पष्ट नहीं कर पा रहे हैं। इस पर कोर्ट ने और भी कड़ा रुख अपनाया। अंतत: पुलिस ने मामले की पूरी जानकारी जुटाने और प्रगति दिखाने के लिए 7 दिन का समय मांगा है।


आरोपियों को अनुचित लाभ देने का संदेह
फरियादी ने अदालत में आवेदन देकर गंभीर आरोप लगाया है कि पुलिस निष्पक्ष और प्रभावी विवेचना करने के बजाय आरोपियों को अनुचित लाभ पहुंचा रही है। खातों की स्पष्ट जानकारी होने के बावजूद उन्हें फ्रीज न करना इस संदेह को पुख्ता करता है कि पुलिस की मिलीभगत से आरोपी अपनी रकम ठिकाने लगा सकते हैं।