
देशभर में फेमस है यहां की रॉयल दिवाली, कुछ इस तरह होता है सेलीब्रेशन
ग्वालियर। भारत देश में 27 अक्टूबर को दिवाली का त्योहार धूमधाम के साथ मनाया जाएगा। लेकिन क्या आपको पता है कि मध्यप्रदेश के ग्वालियर में दिवाली सेलीब्रेशन का अपना एक अलग ही अंदाज है। जी हां, ग्वालियर अदब का शहर है और अपनी गंगा जमना तहजीब के लिए जाना जाता है। यहां के त्योहार भी रंंगीले हैं और अपने आप में बेहद खास भी।
ग्वालियर की इस विरासत को और भी खास बनाता है यहां का शाही परिवार। ग्वालियर में दीवाली महज दो चार दिनों का त्योहार नहीं होता, बल्कि ये तो करीब एक महीने तक चलने वाले जश्न के रूप में मनाया जाता है। आजादी से पहले तक सिंधियाओं के शासन के वक्त दशहरे से दिवाली तक यह शहर दमकता था। दशहरे पर शहरभर में जूलूस निकलता था,तो दिवाली में राजा सभी को बुलाकर त्योहार की मुबारकबाद दिया करते थे।
सिंधिया राजघराने में खास है त्योहार
ग्वालियर देश और दुनिया में अपनी ऐतिहासिक इमारतों के लिए ही नहीं जाना जाता है। यहां के कल्चर और त्योहार भी देश में अहम स्थान रखते हैं। इनमें से एक था दशहरा सेलिब्रेशन, जिसको देश में मैसूर,कुल्लू मनाली के समकक्ष ही माना जाता था। सिंधिया राजपरिवार से जुड़ा ये समारोह पूरे शहर में दर्शन का केंद्र होता है।
महाराजा की एक झलक देखने आते है हजारों लोग
दिवाली के दिन लोग सडक़ों पर अपने प्यारे महाराजा को देखने के लिए उमड़ते है। जिसमें तत्कालीन महाराजा चांदी की बग्गी में सवार होकर निकलते थे। शाही पोशाक में उनके साथ राज परिवार के सदस्य और जागीरदार व सरदार भी साथ रहते थे। दशहरे का ये जूलूस जय विलास पैलेस से शुरू होता था और महाराज बाड़े तक पहुंचता था। इस दौरान राजा प्रजा का अभिवादन करते चलते थे।
सन 1961 जीवाजी राव सिंधिया के समय तक यह पंरपरा यूं ही बनी रही। अब वैसी शान और शौकत तो सडक़ों पर नहीं दिखती,लेकिन मांढरे की माता मंदिर पर सिंधिया परिवार के ज्योतिरादित्य सिंधिया शमी के पेड़ को काटकर त्योहार को मनाते हैं। इस दौरान शहर के गणमान्य लोगों सहित उनके राज्य से जुड़े रहे सरदारों के परिजन समारोह में शामिल होते हैं और धूमधाम के साथ इस त्योहार का सेलीब्रेशन किया जाता है।
दिवाली पर मिलते थे सभी सरदार
दिवाली के मौके पर सिंधिया शासक जय विलास पैलेस में गेट टुगेदर रखते थे। जहां उनके करीबियों सहित व्यापारी वगज़् के प्रतिष्ठित लोग शिरकत करते थे और सभी त्योहार की खुशियां बांटते थे। तत्कालीन ढोलीबुआ महाराज कहते हैं कि उनके पिता बताते थे, उस वक्त शहर में खुशी का माहौल होता था। पैलेस को विशेष तरह से सजाया जाता था। दिए जलाए जाते थे। उन दिनों सडक़ों की रौनक भी देखते ही बनती थी। हमारे जमाने में उत्साह तो है। मगर चमक नहीं दिखती।
Published on:
27 Oct 2019 08:30 am
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