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इंजीनियर-डे,जानिए तिघरा में एम विश्वेश्वरैया  का योगदान  

तिघरा बांध में विश्वेश्वरैया ने खुद के ईजाद किए फ्लड गेट लगाए थे, जिन्हें बाद में विश्वेश्वरैया गेट के नाम से पेटेंट भी कराया गया। इस बांध में 100 साल पहले लगे ये गेट आज भी कारगर साबित हो रहे हैं।

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rishi jaiswal

Sep 15, 2016

tighra at gwalior

tighra dam

ग्वालियर। करीब सौ साल पहले तिघरा जलाशय बनवाया गया था । यह डैम सिंधिया राजवंश के शासक माधौ महाराज यानि माधवराव ने ग्वालियर स्टेट को विकसित करने के उद्देश्य से बनवाया। इसके लिए उन्होंने उस समय के देश के महान इंजीनियर एम. विश्वेश्वरैया की मदद ली। तब से यह डैम आज तक ग्वालियर की प्यास बुझा रहा है। दरअसल यहीं विश्वेश्वेरैया ने पहला पानी निकलने वाला आँटोमेटिक गेट लगाया था।
जानकारों के अनुसार मैसूर रियासत के चीफ इंजीनियर विश्वेश्वरैया उन दिनों बांध बनाने के मामले में दुनिया सर्वश्रेष्ठ इंजीनियर थे।


उस समय के ग्वालियर स्टेट के तत्कालीन महाराज माधौ महाराज ने उन्हें बांध बनाने की जिम्मेदारी दी। सर्वे के बाद तीन ओर से पहाड़ियों से घिरे सांक नदी के क्षेत्र को बांध के लिए चुना गया।

जिसके बाद बांध 1916 में बन कर तैयार हो गया। करीब 24 मीटर ऊंचे और 1341 मीटर लंबे इस बांध की क्षमता 4.8 मिलियन क्यूबिक फीट है।



इसमें विश्वेश्वरैया ने खुद के ईजाद किए फ्लड गेट लगाए थे, जिन्हें बाद में विश्वेश्वरैया गेट के नाम से पेटेंट भी कराया गया था। तिघरा बांध में 100 साल पहले लगे ये गेट आज भी कारगर साबित हो रहे हैं।



अकालों से मिली नसीहत
तत्कालीन ग्वालियर रियासत के लिए 19 वीं शताब्दी का उत्तरार्ध और 20 वीं शताब्दी की शुरूआत अकालों का अभिशाप लेकर आई थी।
रियासत में जंगल भी बहुत थे, नदियां भी पर्याप्त थीं, लेकिन ऐसा कोई साधन नहीं था कि रियासत के जल संसाधनों को आपातकाल के लिए संग्रहित कर रखा जा सके। लिहाजा तत्कालीन महाराजा माधवराव ने फैसला किया कि शहर की प्यास बुझाने और आपातकाल में किसानों को पानी देने लिए एक बड़ा बांध बनाया जाए। नतीजतन 1916 में तिघरा बांध बनाया गया।

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