
Gwalior ‘unfit’ bus
ग्वालियर. परिवहन विभाग का दावा है कि बसों की फिटनेस प्रक्रिया अब पूरी तरह ऑनलाइन, पारदर्शी और हाईटेक हो चुकी है। फिटनेस सेंटरों पर सेंसर लगे हैं, ब्रेक टेस्टिंग मशीनें हैं और सीसीटीवी कैमरों की डिजिटल निगरानी में जांच होती है। नियम कहते हैं कि बस में सुई के बराबर भी तकनीकी खामी हो, तो उसे फिटनेस सर्टिफिकेट जारी नहीं किया जा सकता। लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। बड़ा सवाल यह है कि यदि सिस्टम इतना ही चाक-चौबंद है, तो सड़क हादसों के बाद जब उन्हीं फिट बसों की जांच होती है, तो वे हर बार अनफिट क्यों निकलती हैं?
हाल के दिनों में हुए कई सड़क हादसों के बाद जब परिवहन विभाग ने औचक चेकिंग की, तो डरावनी तस्वीर सामने आई। फिटनेस सर्टिफिकेट जेब में लेकर दौड़ रही बसें असल में मौत के जाल जैसी थीं। कई बसों के टायर पूरी तरह घिस चुके थे, जो किसी भी वक्त फटने के लिए तैयार थे। आपातकालीन द्वार (इमरजेंसी गेट) जाम मिले और अग्निशमन यंत्र वर्षों पहले एक्सपायर हो चुके थे। कुछ बसों की बॉडी इतनी जर्जर थी कि उन्हें सड़क पर चलने की अनुमति देना भी अपराध है, फिर भी वे टेक्निकली फिट घोषित थीं।
परिवहन विभाग का एक पुराना ढर्रा है—हादसा होने पर जागना। जब भी कोई बड़ी घटना होती है, तो विभाग कुछ दिनों के लिए सड़कों पर उतरता है, दर्जनों बसें जब्त होती हैं, परमिट निरस्त होते हैं, लेकिन हफ्ता-दस दिन बीतते ही व्यवस्था फिर पुराने ढर्रे पर लौट आती है।
क्षेत्रीय परिवहन विभाग समय-समय पर बसों की चेकिंग करता है। खामियां मिलने पर जुर्माना और परमिट निरस्त करने जैसी कार्रवाई की जाती है। चूंकि फिटनेस सेंटर अब निजी संस्थाओं के पास हैं, इसलिए वे किस आधार पर फिटनेस जारी कर रहे हैं, इस पर कुछ कहना मुश्किल है।
— विक्रमजीत सिंह कंग, आरटीओ ग्वालियर
Published on:
21 May 2026 05:47 pm
बड़ी खबरें
View Allग्वालियर
मध्य प्रदेश न्यूज़
ट्रेंडिंग
